दो भाई

सच और झूठ जुड़वाँ भाई थे | दोनों कि एक सी शकल थी | दोनों एक ही तरह के, एक ही रंग के कपड़े पहनते थे | एक साथ खेलते, एक साथ पढ़ते | दोनों को देखकर लोग यह नहीं समझ पाते थे कि इनमे कोन सच है और कोन झूठ | पर दोनों को सभी पसंद करते थे | दोनों सुंदर थे और हसमुख भी | तब उनके नाम का मतलब वह न था जो आज है | वे तो बस ममतामयी माँ के दो प्य्रारे बेटे थे |

दोनों का बचपन तो खेल खुद में बीत गया | लेकिन किशोर होते ही दोनों अपने अपने मन कि करने लगे | दोनों में झगडा भी हो जाता | जब झूठ कोई शेतानी करके आता तो लोग शिकायत सच कि करते | जब सच कोई अच्छा काम करके आता तो प्रशंसा लुटने में झूठ बाजी मर ले जाता | झूठ भ्रम का फायदा उठाने में कभी न चुकता |

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आत्मा से बातचीत

हिन्दू धर्म को मानने वाले आज परंपरा और सचाई के बीच फसे हुए है | यह हिन्दू धर्म की एक बड़ी कमजोरी है | इसी से इसका सामाजिक विकास रुक सा गया है | हमे हमेशा सचाई का दामन पकड़े रहना चाहिए क्योकि सचाई ही हमारा मार्गदर्शन करती है | भगवान कभी भी यह नहीं कहता की में परंपरा को मानने वाला हू, वह हमेशा कहता है कि में सचाई को मानता हू |

सचाई सचाई सबसे ऊपर है, जीवन में इससे बढ़ का कुछ भी नहीं है | मानव जाती का इतिहास भी रीती – रिवाजो और प्रथाओ के इर्द गिर्द घूमता रहा है | रीती – रिवाजो और प्रथाए समय के साथ बदलती जाती है और कुछ समय बाद अपना उदेश्य खो देती है और उदेश्य खोते ही म्रतप्राय हो जाती है | हिंदुत्व हमेशा से इन पुरानी परंपराओ और रीती रिवाजो से निकलने कि चुनोती का सामना करता रहा है और इनसे मुकत होने कि कोशिश हमेशा जरी रहेगी |

आज का विधार्थी कल का नागरिक होता है और शीषक कि यह जिम्मेदारी होती है कि वह हर विधार्थी को एक अच्छा इन्सान बनाए | शीषक को अपने विधार्थीयो को या शिक्षा देनी चाहिए कि वे कुछ देर बिलकुल एकांत में बैठे और उस एकांत में अपने आप से यानि अपनी आत्मा के साथ संपर्क स्थापित करे| इस चिंतन से विधार्थीयो को अपने विचारो को एकत्र करने, उन्हें पुनर्जीवित करने और व्यकित्त्व का विकास करने में सहायता मिलती है | सबसे बड़ी बात है कि आत्मा चिंतन करने से अपने आपको पहचानने यानि अपनी आचइयो और बुराइयों का विस्लेष्ण करले में मदद मिलती है |

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मेरा मस्तक अपनी चरण – धूलि तल में

मेरा मस्तक अपनी चरण – धूलि तल में झुका दे | प्रभु | मेरे समस्त अंहकार को आँखों के पानी में डूबा दे | अपने झूठे महत्व की रक्षा करते हुए में केवल अपनी लघुता दिखता हु | अपने ही को घेर में घूमता-घूमता प्रतिपल मरता हु | प्रभु | मेरे समस्त अंहकार को आँखों … Read more

लोभ का फल

एक साधू तीर्थयात्रा पर निकले | वह मार्ग में पड़नेवाले गावो और कस्बो में ठहरते जाते थे | जहा जो भी भक्त उन्हें प्रेम और आदर से बुलाते, चले जाते |

एक गाव में एक ऐसा भक्त मिला जिसने उन्हें एक गाय दान दे दी | वह बोला – “महाराज | इसे आप साथ रखिए | रास्ते में घास – पात लेगी और आपको दूध भी देगी |”

साधू ने गाय ले ली और आगे चल पड़े | अभि कुछ देर ही गए होगे की एक व्यापारी मिला | वह भी साधू के साथ साथ चलने लगा | व्यापारी ने साधू को अपना परिचय दिया | फिर उत्सुकतावश पूछ बेठा – “ यह गाय लेकर आप तीर्थयात्रा के लिए क्यों निकले है?”

साधू ने कहा – “में तो अकेला हु चला था | परंतु एक भक्त ने इसे भी साथ कर दिया ताकि दूध मिलता रहे |”

व्यापारी ने देखा की गाय बहुत सुन्दर है | दूध भी काफी देती होगी | अगर किसी तरह इसे में खरीद लू तो इसके अछे दाम मिल जायगे | यह सोचकर बोला – महाराज | आपके लिए भला दूध की क्या कमी है ? जिस गाव में डाल देगे, वहा भकत लोग दूध –ही-दूध ले आएगे | पैर इतना ज़रूर है की जंगल का मामला है | अगर गाय को खतरा हो गया तो व्यथ ही आपको पाप लगेगा | मेरी बात मानिए, आप इसे बेच दीजिए |”

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चूहे का व्यापारी

वाराणसी में एक सेठ था | एक दिन वह दुकान कि और जा रहा था | रास्ते में एक मरा हुआ चूहा पड़ा था | उसे देखकर वह एक क्षण के लिए रुक गया | वह उस चूहे को देखते हुए कुछ सोचने लगा |

नगर सेठ, क्या सोच रहे हो?” किसीने पूछा |

यही सोच रहा हू कि यदि कोई समझदारी से काम करे तो इस चूहे को बेचकर भी लखपती बन सकता हे|

नगर सेठ की  बात एक गरीब बनिये ने सुन ली | नगर सेठ के जाते ही उसने वह चूहा उठा लिया और बाजार में घूमने लगा | तभी एक महाजन ने अपनी बिल्ली के भोजन के लिए वह चूहा खरीद लिया |

बनिये ने उन पैसो से थोडा गुड और घडा खरीदा | घड़े में पानी भरकर वह एक मार्ग पैर बेठ गया | जंगल से लोटनेवाले लकडहारे और माली उसी मार्ग से आते थे | थके हुए लकडहारे तथा माली गुड खाकर और पानी पीकर बहुँत प्रसन्न हुए | उन्होंने उसे बदले में लकडिया और फूल दिए | बनिये ने लकडिया और फूल बेचकर फिर पैसे कमाए |

उसी मार्ग पर प्रत्येक दिन नियमित रूप से जा बेठता | कुछ दिनों बाद उसने घास काटनेवालो को भी पानी पिलाना शुरु कर दिया | बदले में वह उनसे घास का एक – एक पूरा लेने लगा |

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बीरबल की बेटी

एक दिन बीरबल की बेटी ने बादशाह से मिलने के लिए बहुत जोर दिया | वह 11 वर्ष की थी | वह भी अपने लिटा के समान बुद्धिमान तथा चतुर थी | बीरबल ने उसे खुश करने के लिए महल में ले गया | महल में जाकर उसने सभी कक्ष तथा शाही उधान देखे | उसके बाद वह शाही दरबार में गई | उस समय बादशाह दरबार में बैठे थे | उन्होंने बीरबल की बेटी को देखा तथ उसका स्वागत किया | उसके बाद वह भोजन करने चली गई | भोजन के बाद बादशाह ने उससे पूछा, “बेटी क्या तुम जानती हो कि किस प्रकार बात करनी चाहिए “

“जी महाराज, न अधिक न ही बहुत काम” और यह जवाब सुनकर बादशाह हेरान हो गए, उन्हें समझ नहीं आया कि वह क्या बताना चाहती है, इसलिय उन्होंने उससे पूछा, “तुम क्या कहना चाहती हो, बेटी |”

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ज़िन्दगी का सफ़र

ज़िन्दगी गम का नाम है या ख़ुशी का, मालूम नहीं

ज़िन्दगी गम का नाम है या ख़ुशी का, मालूम नहीं

पर पता नहीं क्यों बहुत अजब सी लगती है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी गम का नाम है या ख़ुशी का, मालूम नहीं

 

इंसान की ज़िन्दगी भी एक मेला है

जिस मेले में कभी गम है तो कभी है ख़ुशी

ज़िन्दगी का मेला जब शुरु होता है तब खुश होता है इंसान

पर जो जो आगे बड़ता है मेला, तब दुखी होता है इंसान

क्योकि उस दोरान बहुत कुछ खोता है इंसान

अपनी मासूमियत, और अपना वो बचपन

जिसमें उसे डर नहीं फिकर नहीं, चिंता नहीं

है तो सिर्फ प्रेम, ख़ुशी, शरारते

इंसान की ज़िन्दगी भी एक मेला है

जिस मेले में कभी गम है तो कभी है ख़ुशी

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कुछ अन कहे से पल

कुछ अन कहे से पल

पल कुछ अन कहे से

यू तो ज़िन्दगी बीत जाती है बाते करते करते

पर फिर भी रहे जाते कुछ पल अन कहे से

करने को तो बहुत सी बाते है उनसे

पर वो पल कहा है उनके पास

रह जाते है कुछ पल अन कहे से ||

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अंधेरे से रोशिनी की और

में तो था अकेला, था में अकेला

गुमसुम सा, सिमटा सा, अंधेरे से प्यार करने वाला

में तो था अकेला, था में अकेला

उसने दी थी एक रोशिनी,  रोशिनी ही थी मेरे मन के अंधेरे में

में तो समझा जैसे मिल गई रोशिनी ज़िन्दगी की

में तो समझा जैसे मिल गई रोशिनी ज़िन्दगी की

पर हकीकत कुछ और ही थी ज़िन्दगी की |

 

कहते है ना कुछ पाने के लिया कुछ खोना पड़ता है

कहते है ना कुछ पाने के लिया कुछ खोना पड़ता है

मेंने भी रोशिनी के लिए, अँधेरे को खोया |

में तो था अकेला, था में अकेला

गुमसुम सा, सिमटा सा, अंधेरे से प्यार करने वाला ||

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समय की कीमत

एक शहर में एक परिवार रहता था | पति-पत्नी और उनकी एक प्यारी सी बेटी | पति हर रोज़ की तरह अपने दफ्तर जाता और रात में घर आता | एक दिन वो देर रात से घर आया और  दरवाज़ा खटखाया और तभी उसकी ६ वर्षीय बेटी ने दरवाज़ा खोला और या देख कर उसको आश्रय हुआ की उसकी बेटी अभी तक सोई नहीं |

जैसे बचो की आदत होती है घर आते ही अपने माँ पाप से लिपट जाते है और बाते करना शुरु कर देते है उसी तरह उसकी बेटी ने भी वही किया | अन्दर  घुसते  ही  बेटी ने  पूछा —“ पापा पापा क्या  मैं  आपसे  एक प्रशन पूछ  सकती हू |

पिता ने कहा: हा बिलकुल बेटी | तो बेटी ने पूछा की आप एक दिन में कितना कमा लेते हो |

पिता का उसका ये सवाल अच्छा नहीं लगा पर फिर भी पिता ने उसको बता दिया और फिर बेटी ने दुबारा पूछा की पापा पापा आप एक धंटे में कितना कमा लेता हो | बस यह सुन कर पिता आग बबूला हो गया और अपनी बेटी तो डानट दिया और यह कह कर वो अपने कमरे में चला गया |

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