राजस्थान की लोक कथा: ढोला मारू
राजस्थान में जब रात को ठंडी हवा चलती है और रेत के टीलों पर चाँदनी बिछ जाती है, तब गाँवों में अक्सर किसी ढाढ़ी की सारंगी से एक पुरानी धुन…
राजस्थान में जब रात को ठंडी हवा चलती है और रेत के टीलों पर चाँदनी बिछ जाती है, तब गाँवों में अक्सर किसी ढाढ़ी की सारंगी से एक पुरानी धुन…
शादी वाले घर में शोर कभी थमता नहीं। ढोलक, हलवाई की कड़ाही की छनछन, बच्चों की भाग-दौड़ और हर दो मिनट में किसी की आवाज़, “अरे, कैंची किसने ली?” बारह…
पंपा सरोवर के किनारे, घने जंगल के बीच, मतंग ऋषि का आश्रम था। आश्रम छोटा-सा था। मिट्टी की कुटियाँ, तुलसी के चौरे, और चारों ओर ऐसी शांति कि हवा भी…
काशी की गलियों में सुबह हमेशा घंटियों की आवाज़ से होती थी। गंगा के घाटों पर दीये तैरते, पंडितों के मंत्र गूँजते, और इन्हीं गलियों में एक छोटी-सी लड़की नंगे…
पौष की वह शाम कुछ ज़्यादा ही जल्दी ढल गई थी। सूरज अभी ठीक से डूबा भी नहीं था कि खेतों पर धुंध की चादर बिछने लगी। सिरसा गाँव के…
यह “प्यासा कौआ” की जानी-पहचानी बाल-कथा से प्रेरित एक नई कहानी है, जिसे अपने शब्दों में लिखा गया है। इसके पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं। जेठ का महीना था। दोपहर…
यह एक काल्पनिक कहानी है। इसके पात्र और गाँव लेखक की कल्पना हैं। सोनपुर गाँव के पश्चिमी छोर पर, पीपल के बूढ़े पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक पुराना…
यह सिंहासन बत्तीसी की एक पारंपरिक लोक कथा का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है। धारा नगरी के पास एक छोटा-सा गाँव था। गाँव के बाहर खेतों के बीच…
रामगढ़ के स्कूल मैदान में उस दिन धूल कुछ ज़्यादा ही उड़ रही थी। ज़िला स्तर की दौड़ का ट्रायल था, और पूरे गाँव की नज़रें एक ही लड़के पर…
यह देव दीपावली से जुड़ी पौराणिक मान्यता पर आधारित एक काल्पनिक कहानी है। पात्र और संवाद कल्पना हैं, और कथा का पौराणिक हिस्सा परंपरा में सुनी-सुनाई जाने वाली मान्यता को…