बुढ़िया की रोटी और भूखा राहगीर
पौष की वह शाम कुछ ज़्यादा ही जल्दी ढल गई थी। सूरज अभी ठीक से डूबा भी नहीं था कि खेतों पर धुंध की चादर बिछने लगी। सिरसा गाँव के…
पौष की वह शाम कुछ ज़्यादा ही जल्दी ढल गई थी। सूरज अभी ठीक से डूबा भी नहीं था कि खेतों पर धुंध की चादर बिछने लगी। सिरसा गाँव के…