गाँव के आँगन में मिट्टी के मटके में कंकड़ डालता कालू कौआ, कंकड़ लाती गौरैया और मैना, ठीकरा लुढ़काती गिलहरी और दरवाज़े पर बैठी मुस्कुराती छुटकी

यह “प्यासा कौआ” की जानी-पहचानी बाल-कथा से प्रेरित एक नई कहानी है, जिसे अपने शब्दों में लिखा गया है। इसके पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं।

जेठ का महीना था। दोपहर ऐसी तप रही थी जैसे आसमान से किसी ने गरम राख उड़ेल दी हो। रामपुर गाँव के तालाब में अब पानी कम, दरारें ज़्यादा थीं। नीम के पेड़ पर बैठा कालू कौआ अपनी चोंच खोले हाँफ रहा था।

कालू कोई बूढ़ा, समझदार कौआ नहीं था। वह अभी-अभी बड़ा हुआ था और ख़ुद को बहुत होशियार समझता था। सुबह से वह खेतों, छतों और गलियों के ऊपर चक्कर लगा चुका था, पर कहीं एक बूँद पानी नहीं मिला।

“बस, अब और नहीं उड़ा जाता,” उसने अपने आप से कहा और पंख समेट लिए।

आँगन में रखा पुराना मटका

तभी उसकी नज़र नीचे एक कच्चे घर के आँगन पर पड़ी। दीवार के पास मिट्टी का एक पुराना मटका रखा था। कालू झट से नीचे उतरा और मटके के किनारे पर बैठकर अंदर झाँका।

पानी था! पर बहुत नीचे, तली के पास। उसने गर्दन लंबी की, चोंच अंदर डाली, फिर और झुका। चोंच पानी तक पहुँची ही नहीं। एक बार तो वह फिसलते-फिसलते बचा।

“अरे वाह, पानी सामने है और पी नहीं सकता,” वह झुँझलाया।

फिर अचानक उसे दादी की बात याद आई। बचपन में दादी कौवी शाम को घोंसले में बैठकर एक कहानी सुनाती थी। एक प्यासा कौआ था, जिसने मटके में एक-एक कंकड़ डाला और पानी ऊपर आ गया।

कालू की आँखें चमक उठीं। “हाँ! यही तो करना है।”

जब पुराना उपाय भी कम पड़ गया

वह आँगन में इधर-उधर कंकड़ ढूँढने लगा। दो-चार छोटे कंकड़ मिले। उसने एक उठाया, मटके में डाला। “टप्प!” फिर दूसरा। फिर तीसरा।

पर यह आँगन लिपा-पुता था, गोबर से चिकना किया हुआ। यहाँ कंकड़ थे ही कितने? दसवाँ कंकड़ डालते-डालते आँगन ख़ाली हो गया। कालू ने अंदर देखा। पानी थोड़ा ऊपर आया था, बस इतना कि उसकी हिम्मत न टूटे, पर प्यास भी न बुझे।

अब कंकड़ लाने के लिए उसे गाँव के बाहर वाली कच्ची सड़क तक जाना पड़ता। एक बार में एक कंकड़, और धूप ऐसी कि दो चक्कर में ही पंख जवाब देने लगे।

तीसरे चक्कर के बाद कालू मटके के पास धम्म से बैठ गया। उसका गला सूख रहा था और आँखों के आगे अँधेरा-सा छाने लगा था।

“दादी, तुम्हारी कहानी में तो सब आसान था,” वह बुदबुदाया। “उस कौए के पास कंकड़ों का ढेर था क्या?”

चिंकी गौरैया का सवाल

पास की खपरैल पर बैठी एक छोटी गौरैया यह सब देख रही थी। उसका नाम चिंकी था। वह फुदकती हुई नीचे आई।

“क्या कर रहे हो, कालू भैया? कब से देख रही हूँ, पत्थर ढो-ढोकर मटके में डाल रहे हो।”

कालू ने थकी आवाज़ में सब बता दिया।

चिंकी ने भी मटके में झाँका। “पानी तो है,” उसने धीरे से कहा। “प्यासी तो मैं भी हूँ। और वो देखो, आम की डाल पर मैना दीदी भी सुबह से बैठी हैं। गिलहरी भी इधर-उधर भाग रही है। सबको पानी चाहिए।”

कालू कुछ पल चुप रहा। फिर जैसे उसके मन में कोई खिड़की खुल गई।

“चिंकी,” उसने कहा, “मैं अकेला दस चक्कर में भी इसे नहीं भर पाऊँगा। पर अगर हम सब एक-एक कंकड़ भी लाएँ तो?”

चिंकी की छोटी-सी आँखें गोल हो गईं। “मेरी चोंच तो बहुत छोटी है। मैं बड़ा कंकड़ नहीं उठा पाऊँगी।”

“तो छोटा लाना,” कालू हँसा। “कंकड़ छोटा हो या बड़ा, पानी तो दोनों से ऊपर आता है।”

सबने मिलकर ढूँढा नया उपाय

चिंकी ने ज़ोर से चहचहाकर मैना दीदी को बुलाया। मैना आई, फिर उसकी सहेली आई। पीछे-पीछे पूँछ फुलाए चुनमुन गिलहरी भी आ गई।

“मैं उड़ तो नहीं सकती,” चुनमुन ने कहा, “पर दीवार के पीछे टूटे घड़े के ठीकरे पड़े हैं। उन्हें लुढ़काकर ला सकती हूँ।”

“बहुत बढ़िया!” कालू बोला। “मैं सड़क से बड़े कंकड़ लाऊँगा, मैना दीदी खेत की मेड़ से, और चिंकी पास वाले छोटे-छोटे दाने जैसे पत्थर।”

फिर जो काम शुरू हुआ, वह देखने लायक था। कोई उड़ता हुआ आता, “टप्प!” कोई फुदकता हुआ, “टिप्प!” चुनमुन ठीकरे को धक्का देकर मटके तक लाती और कालू उसे चोंच से उठाकर अंदर डाल देता।

धूप वही थी, गर्मी वही थी। पर अब कोई अकेला नहीं था, इसलिए थकान भी बँट गई थी। बीच-बीच में चिंकी कोई चुटकुला सुना देती और सब हँस पड़ते।

थोड़ी देर बाद कालू ने झाँककर देखा। पानी मटके के मुँह के पास तक आ गया था, ठंडा और साफ़।

“पहले चिंकी पिएगी,” उसने कहा। “सबसे छोटी है, और सबसे पहले मदद के लिए वही आई थी।”

चिंकी ने दो घूँट पिए, फिर मैना ने, फिर गिलहरी ने, और आख़िर में कालू ने। उस दिन उसे लगा कि पानी का स्वाद कभी इतना मीठा नहीं था।

छुटकी ने जो देखा

यह सब घर की चौखट पर बैठी एक छोटी बच्ची देख रही थी। उसका नाम छुटकी था। उसने माँ को आवाज़ दी, “अम्मा, देखो! चिड़ियाँ और कौआ मिलकर मटके में पत्थर डाल रहे थे।”

माँ बाहर आईं और मुस्कुरा दीं। “बेचारे प्यासे होंगे। इतनी गर्मी में पंछी कहाँ जाएँ?”

उसी शाम छुटकी ने एक मिट्टी का चौड़ा सकोरा लिया, उसमें पानी भरा और छत की मुँडेर पर रख दिया। अगले दिन उसकी सहेली ने भी अपनी छत पर एक कटोरा रखा। फिर पड़ोस की दादी ने भी।

कुछ ही दिनों में रामपुर की कई छतों पर पंछियों के लिए पानी रखा जाने लगा।

दादी की कहानी, नया अंत

उस रात कालू अपने घोंसले में लौटा तो दादी कौवी ने पूछा, “आज बड़ी देर कर दी?”

कालू ने पूरा किस्सा सुनाया। दादी बड़े ध्यान से सुनती रहीं, फिर हँसकर बोलीं, “तो तुमने मेरी कहानी आगे बढ़ा दी।”

“कैसे दादी?”

“मेरी कहानी का कौआ समझदार था, पर अकेला था। तुमने समझा कि जब काम बड़ा हो, तो अक़्ल के साथ दोस्तों का साथ भी चाहिए। और देखो, तुम्हारी वजह से आज पूरे गाँव ने पंछियों के लिए पानी रखना सीख लिया।”

कालू ने पंख फुलाए, थोड़ा शरमाया और फिर बोला, “दादी, कल से मैं रोज़ छुटकी की छत पर जाऊँगा। उसे धन्यवाद तो कहना पड़ेगा न… काँव-काँव करके!”

दादी ज़ोर से हँस पड़ीं, और नीम की डालियाँ भी जैसे उनके साथ हँस दीं।

कहानी की सीख

पुरानी सीख बहुत काम की होती है, पर हर बार वही तरीका पूरा नहीं पड़ता। जब अकेले मुश्किल बड़ी लगे, तो मिल-जुलकर नया उपाय ढूँढना चाहिए। और गर्मी के दिनों में पंछियों के लिए छत पर थोड़ा पानी रख देना, सबसे छोटी पर सबसे सुंदर मदद है।

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