यह देव दीपावली से जुड़ी पौराणिक मान्यता पर आधारित एक काल्पनिक कहानी है। पात्र और संवाद कल्पना हैं, और कथा का पौराणिक हिस्सा परंपरा में सुनी-सुनाई जाने वाली मान्यता को अपने शब्दों में कहा गया है।
कार्तिक की पूर्णिमा थी और बनारस में शाम कुछ जल्दी उतर आई थी। गंगा के ऊपर हल्की धुंध तैर रही थी, और घाटों की सीढ़ियों पर लोग मिट्टी के दीये कतार में जमा रहे थे। हवा में घी, गेंदे और भीगी मिट्टी की मिली-जुली ख़ुशबू थी।
दस साल की गौरी अपने बाबा रामेसर की नाव के किनारे बैठी थी। उसके हाथ में एक छोटा-सा दीया था, जिसकी बत्ती उसने ख़ुद बटी थी। अब तक तीन बार जला चुकी थी, और तीनों बार हवा ने उसे बुझा दिया था।
“बाबा, ये फिर बुझ गया!” उसने मुँह फुलाकर कहा।
रामेसर ने चप्पू नाव में रखा और हँस पड़े। “दीया है बिटिया, ज़िद्दी तो होगा ही। तेरी तरह।”
“मज़ाक मत करो। बाकी सबके दीये जल रहे हैं। देखो, पूरा घाट चमक रहा है।”
सच में, दशाश्वमेध से लेकर दूर तक घाटों पर रोशनी की लड़ियाँ बिछ चुकी थीं। पानी में उनकी परछाईं ऐसी काँप रही थी, जैसे गंगा ने ख़ुद हज़ारों दीये ओढ़ लिए हों।
आज की रात इतनी ख़ास क्यों है?
गौरी ने दीया गोद में रखा और पूछा, “बाबा, दिवाली तो कब की निकल गई। फिर आज इतने दीये क्यों?”
रामेसर ने गमछे से हाथ पोंछे और नाव की पटरी पर आराम से बैठ गए। ये वही अंदाज़ था, जिसमें वो हर साल कोई न कोई कहानी शुरू करते थे।
“आज देवताओं की दिवाली है,” उन्होंने धीमे से कहा। “हमारे बुज़ुर्ग कहते आए हैं कि आज की रात देवता ख़ुद काशी के घाटों पर उतरते हैं।”
गौरी की आँखें फैल गईं। “सच में? पर क्यों?”
“सुन। बहुत पुराने समय की बात है। तारकासुर नाम के एक असुर के तीन बेटे थे। उन्होंने बरसों कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से वरदान माँगा। उन्हें तीन ऐसे नगर मिले, जो आकाश में उड़ते रहते थे। एक सोने का, एक चाँदी का और एक लोहे का। लोग उन्हें त्रिपुर कहने लगे।”
“उड़ने वाले शहर?” गौरी हँसी। “जैसे हवाई जहाज़?”
“उससे भी बड़े,” रामेसर मुस्कुराए। “पर वरदान के साथ एक शर्त थी। ये तीनों नगर हज़ार बरस में बस एक बार एक सीध में आते थे, और उन्हें तभी, एक ही बाण से नष्ट किया जा सकता था। बस, इसी घमंड में तीनों भाइयों ने ऋषियों को सताना शुरू कर दिया, देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया। किसी की पूजा नहीं होने दी, किसी का यज्ञ पूरा नहीं होने दिया।”
“फिर?”
“फिर सारे देवता घबराकर भगवान शिव के पास कैलास पहुँचे। बोले, प्रभु, अब आप ही कुछ कीजिए।”
एक बाण, तीन नगर
पास के घाट से शंख की आवाज़ उठी। आरती की तैयारी हो रही थी। रामेसर ने एक पल उधर देखा, फिर बात आगे बढ़ाई।
“कथा कहती है कि शिव जी के लिए एक अनोखा रथ बना। धरती रथ बनी, सूरज और चाँद उसके पहिये, मेरु पर्वत धनुष, और भगवान विष्णु ख़ुद बाण बने। फिर शिव जी ने बड़े धीरज से इंतज़ार किया। जिस पल तीनों नगर एक सीध में आए, उन्होंने एक ही बाण छोड़ा।”
गौरी ने साँस रोक ली। “और?”
“और तीनों नगर एक साथ जलकर राख हो गए। उस दिन कार्तिक की पूर्णिमा थी। तभी से शिव जी को त्रिपुरारी कहा जाता है, यानी त्रिपुर के शत्रु।”
“तो देवता ख़ुश हुए होंगे!”
“इतने ख़ुश कि उन्होंने उसी रात दीये जलाकर उत्सव मनाया। और कहते हैं, उत्सव के लिए उन्होंने शिव जी की सबसे प्यारी नगरी चुनी। हमारी काशी। इसलिए आज के दिन लोग मानते हैं कि देवता गंगा में डुबकी लगाने और दीये जलाने यहाँ उतरते हैं। हम उनके स्वागत में घाट सजाते हैं।”
गौरी कुछ देर चुपचाप घाटों की तरफ़ देखती रही। फिर उसने धीरे से पूछा, “बाबा, क्या देवता सच में दिखते हैं?”
रामेसर ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “ये तो आस्था की बात है बिटिया। मैंने किसी देवता को सीढ़ियाँ उतरते नहीं देखा। पर इतने बरसों में इतना ज़रूर देखा है कि आज की रात लोग अपने झगड़े भूलकर एक-दूसरे के दीये जलाने में मदद करते हैं। अगर देवता कहीं होते होंगे, तो ऐसी ही जगह होते होंगे।”
गौरी का ज़िद्दी दीया
तभी पास की नाव से एक बूढ़ी अम्मा की आवाज़ आई। “अरे रामेसर, ज़रा माचिस देना। मेरी तीली सब सील गई है।”
रामेसर ने माचिस उछाल दी। अम्मा ने पकड़ ली, पर उनके हाथ काँप रहे थे। दो तीलियाँ बुझ गईं। गौरी ने देखा कि अम्मा के सामने पत्तों के दोने में सात दीये रखे थे, और एक भी नहीं जला था।
गौरी अपना दीया भूल गई। वो कूदकर उनकी नाव के पास पहुँची। “अम्मा, लाओ मैं जला दूँ। आप हथेली से हवा रोको।”
अम्मा ने हथेलियों की ओट बनाई। गौरी ने तीली जलाई, बत्ती तक ले गई, और इस बार लौ टिक गई। एक, दो, तीन… देखते-देखते सातों दीये जल उठे।
अम्मा की आँखें भर आईं। “जुग-जुग जियो बिटिया। मेरे पोते-पोती परदेस में हैं। हर साल वही जलाते थे। इस बार सोचा था, अकेले कैसे होगा।”
गौरी को समझ नहीं आया कि क्या कहे। उसने बस मुस्कुराकर अम्मा का हाथ पकड़ लिया।
जब वो लौटी, तो रामेसर उसका वही ज़िद्दी दीया हाथ में लिए बैठे थे। “चल, अब इसे भी जलाते हैं। इस बार मैं ओट बनाता हूँ।”
बाबा की खुरदुरी हथेलियों के बीच गौरी ने तीली छुआई। लौ पहले थोड़ा लड़खड़ाई, फिर सीधी खड़ी हो गई। गौरी ख़ुशी से उछल पड़ी।
गंगा में बहता दीया
रामेसर ने नाव धीरे-धीरे घाट से थोड़ा दूर खेई। “अब इसे गंगा मइया को सौंप दे। और मन में जो माँगना हो, माँग ले।”
गौरी ने दोने में दीया रखा और झुककर पानी पर छोड़ दिया। दीया हल्के-हल्के बहने लगा, और जल्द ही हज़ारों दूसरे दीयों के बीच खो गया।
“क्या माँगा?” रामेसर ने पूछा।
“बताऊँगी नहीं,” गौरी बोली, फिर ख़ुद ही रुक न सकी। “मैंने माँगा कि अम्मा के पोते-पोती अगले साल घर आ जाएँ। और… कि अगले साल भी मैं किसी का दीया जला सकूँ।”
रामेसर कुछ नहीं बोले। उन्होंने बस चप्पू उठाया और नाव को घाट की ओर मोड़ दिया। घाट पर आरती शुरू हो चुकी थी। घंटियों की आवाज़ पानी पर दूर तक तैर रही थी, और गंगा पर बिछी रोशनी में एक छोटा-सा दीया शायद अब भी कहीं बह रहा था।
उस रात घर लौटते हुए गौरी ने बाबा से कहा, “बाबा, मुझे लगता है देवता आए थे।”
“अच्छा? कहाँ?”
“अम्मा की नाव पर,” गौरी ने कहा। “जब उनके सातों दीये जल गए, तो उनकी आँखों में जो चमक थी न, वो किसी देवता की ही रही होगी।”
रामेसर ठहरकर उसे देखते रहे। फिर हँसते हुए बोले, “बिटिया, तूने तो आज मुझे कहानी सुना दी।”
कहानी की सीख
उत्सव की असली रोशनी तब फैलती है, जब हम अपने दीये के साथ किसी और का दीया भी जलाने में हाथ बढ़ाते हैं। आस्था मंदिरों और घाटों में ही नहीं, छोटी-छोटी भलाई में भी बसती है।
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