जंगल में नाले के पास ज़मीन पर आँखें बंद किए लेटे भोला को सूँघता काला भालू, और ऊपर पेड़ की डाल पर छिपकर देखता हरिया

यह दोस्ती पर एक पुरानी, दुनिया भर में सुनाई जाने वाली सीख-कथा का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है। पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं।

सोनपुर गाँव में दो लड़के रहते थे, हरिया और भोला। दोनों की उम्र लगभग एक जैसी थी, दोनों एक ही पेड़ के नीचे गिल्ली-डंडा खेलकर बड़े हुए थे, और गाँव वाले मज़ाक में कहते थे कि इन दोनों की परछाईं भी साथ-साथ चलती है।

हरिया बातों का धनी था। ज़ोर-ज़ोर से हँसता, हर बात पर क़सम खाता और हर दूसरे दिन कहता, “भोला, तेरे लिए तो मैं जान भी दे दूँ।” भोला थोड़ा चुप रहने वाला था। वह ज़्यादा बोलता नहीं था, बस सुनता और मुस्कुरा देता।

मेले की तैयारी

उस साल कार्तिक में पास के क़स्बे रामगढ़ में बड़ा मेला लगने वाला था। मेले तक पहुँचने के दो रास्ते थे। एक पक्की सड़क, जो पूरे दिन का सफ़र थी, और दूसरा जंगल वाला कच्चा रास्ता, जिससे आधे दिन में पहुँचा जा सकता था।

“जंगल से चलेंगे,” हरिया ने सीना फुलाकर कहा। “सुबह निकलेंगे, दोपहर तक मेले में जलेबी खा रहे होंगे।”

भोला ने थोड़ा हिचकते हुए पूछा, “सुना है उस जंगल में भालू घूमते हैं। अम्मा मना करेगी।”

हरिया ठहाका मारकर हँसा। “अरे डरपोक! मैं हूँ न तेरे साथ। कोई जानवर आया तो पहले मुझसे निपटेगा। दोस्त किसलिए होते हैं?”

भोला को यह बात अच्छी लगी। उसने अम्मा से कहा कि हरिया साथ है, फ़िक्र मत करो। अम्मा ने पोटली में चार रोटियाँ, थोड़ा गुड़ और एक प्याज़ बाँध दिया, और माथे पर हाथ फेरकर विदा कर दिया।

जंगल का रास्ता

सुबह की हवा ठंडी थी। पगडंडी के दोनों ओर साल और महुए के ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। कहीं-कहीं से मोर की आवाज़ आती, तो कहीं सूखे पत्तों में कुछ सरसराता। हरिया आगे-आगे गाना गाता चल रहा था और बीच-बीच में डंडी से झाड़ियाँ हिलाता जाता।

“देख भोला,” उसने कहा, “कुछ नहीं है यहाँ। लोग बेकार में डराते हैं।”

भोला ने हाँ में सिर हिलाया, पर उसकी नज़र बार-बार झाड़ियों की ओर चली जाती थी।

करीब दो घंटे चलने के बाद वे एक छोटे-से नाले के पास पहुँचे। पानी साफ़ था। दोनों ने हाथ-मुँह धोया और एक पत्थर पर बैठकर गुड़ के साथ एक-एक रोटी खाई। धूप अब पेड़ों से छनकर ज़मीन पर गोल-गोल चकत्ते बना रही थी।

तभी पीछे की झाड़ियों में ज़ोर की खड़खड़ाहट हुई।

दोनों ने एक साथ मुड़कर देखा। सामने, कोई बीस क़दम दूर, एक बड़ा काला भालू खड़ा था। उसकी नाक हवा में ऊपर उठी हुई थी, जैसे वह गुड़ की ख़ुशबू सूँघ रहा हो।

जब मुसीबत आई

भोला का गला सूख गया। उसके मुँह से बस इतना निकला, “ह… हरिया…”

पर हरिया वहाँ था ही नहीं। जिस लड़के ने सुबह जान देने की बात कही थी, वह बिना एक शब्द कहे पोटली फेंककर पास के ऊँचे पेड़ की ओर भागा और बंदर की तरह फुर्ती से ऊपर चढ़ गया। एक मोटी डाल पर पहुँचकर उसने पत्तों के बीच ख़ुद को छिपा लिया।

भोला को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। उसने एक बार पेड़ की ओर देखा, फिर हरिया की ओर। “हरिया, हाथ दे दे!” उसने धीमे से पुकारा।

ऊपर से कोई जवाब नहीं आया। पत्ते तक नहीं हिले।

भालू अब धीरे-धीरे पास आ रहा था। भोला के पैर काँप रहे थे। भागता तो भालू पकड़ लेता, यह वह जानता था। तभी उसे दादी की एक बात याद आई। दादी कहा करती थीं कि कई जंगली जानवर बिना हिले-डुले पड़े शरीर में दिलचस्पी नहीं लेते। यह बात कितनी सच थी, भोला नहीं जानता था, पर उस पल उसके पास और कोई रास्ता भी नहीं था।

वह चुपचाप ज़मीन पर पेट के बल लेट गया। आँखें बंद कीं और साँस इतनी धीमी कर ली कि सीना भी न उठे।

भालू के कान में क्या कहा?

भालू पास आया। उसकी भारी साँसें भोला की गर्दन पर पड़ रही थीं। उसने भोला का सिर सूँघा, फिर पीठ, फिर हाथ। एक पल को अपना गीला थूथन भोला के कान के बिल्कुल पास ले आया और वहीं रुका रहा।

भोला को लगा जैसे वक़्त थम गया हो। उसने दाँत भींच लिए और मन ही मन भगवान का नाम लेता रहा।

फिर भालू हटा। उसने पास पड़ी पोटली को पंजे से उलटा, गुड़ की डली मुँह में दबाई, और धीरे-धीरे झूमता हुआ वापस झाड़ियों में ओझल हो गया।

काफ़ी देर तक भोला वैसे ही पड़ा रहा। जब चारों ओर पूरी तरह सन्नाटा छा गया, तब जाकर उसने आँखें खोलीं।

ऊपर पेड़ पर खड़खड़ हुई और हरिया नीचे उतर आया। कपड़े झाड़ते हुए वह ऐसे मुस्कुराया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

“बाप रे, बाल-बाल बचा तू!” उसने कहा। फिर आँख मारते हुए पूछा, “अच्छा सुन, मैंने ऊपर से देखा, भालू तेरे कान के पास बड़ी देर तक मुँह लगाए रहा। क्या कह रहा था तुझसे?”

भोला का जवाब

भोला धीरे से उठकर बैठा। उसने अपने घुटनों से मिट्टी झाड़ी, बिखरी हुई रोटियाँ उठाकर पोटली में रखीं और कुछ देर हरिया की ओर देखता रहा। उसकी आँखों में ग़ुस्सा नहीं था, बस एक अजीब-सी थकान थी।

“भालू ने कहा,” भोला बोला, “कि ऐसे दोस्त के साथ दोबारा जंगल में मत आना, जो मुसीबत देखते ही तुझे अकेला छोड़कर भाग जाए।”

हरिया की हँसी बीच में ही अटक गई। उसने कुछ कहने को मुँह खोला, “वो… मैं तो… मुझे लगा तू भी…”

“रहने दे,” भोला ने उसकी बात काटी, पर आवाज़ में कड़वाहट नहीं थी। “मैंने तुझे पुकारा था, हरिया। तूने सुना भी, मैं जानता हूँ।”

हरिया चुप हो गया। उस दिन पहली बार उसके पास कोई क़सम नहीं थी।

लौटते क़दम

दोनों मेले तक पहुँचे ज़रूर, पर जलेबी का स्वाद वैसा नहीं था। रास्ते भर हरिया कोई न कोई बात छेड़ने की कोशिश करता रहा, और भोला छोटे-छोटे जवाब देता रहा।

शाम को गाँव लौटकर भोला ने अम्मा को सब बताया। अम्मा ने उसे गले लगाया और बस इतना कहा, “बेटा, जो सुख में साथ हँसे, वो साथी है। जो दुख में साथ खड़ा रहे, वही दोस्त है।”

कुछ दिनों बाद हरिया भोला के घर आया। हाथ में एक पीतल की छोटी-सी सीटी थी। “जंगल में काम आएगी,” उसने नज़रें झुकाकर कहा। “और अगली बार… अगली बार मैं भागूँगा नहीं।”

भोला ने सीटी ले ली। उसने हरिया को माफ़ कर दिया था, पर उस दिन से उसने बातों से नहीं, काम से लोगों को परखना सीख लिया।

कहानी से सीख

सच्चा दोस्त वही है, जो मुश्किल घड़ी में साथ खड़ा रहे। बड़ी-बड़ी बातें और क़समें आसान हैं, असली पहचान तब होती है जब मुसीबत सामने आती है। और जब ख़तरा हो, तो घबराने के बजाय ठंडे दिमाग़ से सोचना ही सबसे बड़ा सहारा बनता है।

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