यह एक काल्पनिक कहानी है। इसके पात्र, जगहें और घटनाएँ लेखक की कल्पना हैं।
नानी की हवेली में घुसते ही नैना को लगा जैसे वक़्त यहाँ आकर रुक गया हो। ऊँची-ऊँची दीवारें, खिड़कियों पर रंगीन काँच, और आँगन के बीचों-बीच वही पुराना नीम, जिसके नीचे बचपन में वो घंटों खेला करती थी। इस बार वो पूरे सात साल बाद आई थी, दीवाली की छुट्टियों में, अपने ममेरे भाई आदित्य के साथ।
“दीदी, ऊपर देखो,” आदित्य ने उसकी बाँह खींची। “वो तीसरी मंज़िल वाली खिड़की। उस पर अब भी ताला है?”
नैना ने गर्दन उठाई। हवेली की दो मंज़िलें तो रोशनी से जगमगा रही थीं, पर सबसे ऊपर वाली मंज़िल अँधेरे में डूबी थी। लकड़ी के दरवाज़े पर लोहे का एक बड़ा-सा ताला लटक रहा था, जिस पर ज़ंग की मोटी परत जमी थी।
“हमेशा से है,” नैना ने धीरे से कहा। “नानी कहती थीं वहाँ बस पुराना सामान रखा है।”
“पुराना सामान रखने के लिए कोई चालीस साल ताला लगाकर रखता है क्या?” आदित्य ने भौंहें सिकोड़ीं।
रात की पहली आवाज़
उस रात खाना खाकर सब जल्दी सो गए। गाँव की रातें शहर जैसी नहीं होतीं। नौ बजते-बजते चारों तरफ़ ऐसा सन्नाटा छा जाता है कि अपनी साँस भी सुनाई देने लगे। नैना और आदित्य दूसरी मंज़िल के उस कमरे में थे, जिसकी छत ठीक तीसरी मंज़िल के फ़र्श के नीचे थी।
करीब बारह बजे नैना की आँख खुली। पहले उसे लगा कोई सपना है। फिर वो आवाज़ दोबारा आई। धीमी, रुक-रुककर, जैसे कोई बहुत दूर हारमोनियम बजा रहा हो। एक पुरानी-सी धुन, जो उसने कहीं सुनी तो थी, पर याद नहीं आ रहा था कहाँ।
“आदि,” उसने फुसफुसाकर भाई को हिलाया। “सुन रहे हो?”
आदित्य हड़बड़ाकर उठा। कुछ पल दोनों चुप रहे। धुन फिर बजी, और इस बार उसके साथ छत पर किसी के धीमे क़दमों की आहट भी थी। टक… टक… टक।
“ऊपर कोई है,” आदित्य की आवाज़ काँप रही थी।
“ऊपर कोई नहीं हो सकता। ताला लगा है।”
“तो फिर ये कौन बजा रहा है?”
नैना के पास इसका कोई जवाब नहीं था। दोनों ने चादर सिर तक खींच ली और सुबह होने का इंतज़ार करते रहे। धुन कब बंद हुई, किसी को पता नहीं चला।
चाबियों का गुच्छा
सुबह नाश्ते पर आदित्य से रहा नहीं गया। “नानी, तीसरी मंज़िल पर कौन रहता है?”
नानी के हाथ से परांठे की थाली छूटते-छूटते बची। उन्होंने आदित्य की ओर देखा, फिर नज़रें फेर लीं। “कोई नहीं रहता बेटा। वहाँ धूल और कबाड़ के सिवा कुछ नहीं।”
“पर रात को वहाँ से हारमोनियम की…”
“चूहे होंगे,” नानी ने बात काट दी। “पुरानी हवेली है, रात को लकड़ियाँ भी बोलती हैं। चलो, जल्दी खाओ, बाज़ार से दीये लाने हैं।”
नैना ने गौर किया कि नानी की आवाज़ में डर नहीं था। कुछ और था, जिसे वो पहचान नहीं पाई। शायद उदासी।
दोपहर में जब नानी सो रही थीं, आदित्य दबे पाँव उनके कमरे में गया और लौटा तो उसके हाथ में पीतल की चाबियों का एक भारी गुच्छा था। “अलमारी के ऊपर रखा था,” उसने आँख मारी। “आज रात पता करके ही रहेंगे।”
“ये ठीक नहीं है, आदि।”
“तो तुम्हें जानना नहीं है कि ऊपर कौन है?”
नैना चुप रही। सच तो ये था कि जानना वो भी चाहती थी।
तीसरी मंज़िल
रात के बारह बजे फिर वही धुन शुरू हुई। इस बार दोनों तैयार थे। आदित्य के हाथ में टॉर्च थी और नैना के हाथ में चाबियों का गुच्छा। सीढ़ियाँ पतली और घुमावदार थीं। हर क़दम पर लकड़ी चरमराती, और हर चरमराहट के साथ नैना का दिल उछलकर गले तक आ जाता।
दरवाज़े के सामने पहुँचकर धुन अचानक थम गई।
सन्नाटा इतना गहरा था कि दोनों को एक-दूसरे की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। नैना ने तीसरी चाबी आज़माई। ताला एक लंबी, थकी हुई-सी आवाज़ के साथ खुल गया।
अंदर टॉर्च की रोशनी पड़ी तो दोनों ठिठक गए। कमरे में धूल ज़रूर थी, पर वो कबाड़खाना नहीं था। एक सलीक़े से सजा कमरा था। दीवार पर पुराने ज़माने के फ़्रेम में एक लड़की की तस्वीर, कोने में लकड़ी का पलंग, और खिड़की के पास रखा एक हारमोनियम।
हारमोनियम का ढक्कन खुला था। और उसकी चाबियों पर धूल का एक कण तक नहीं था।
“दीदी,” आदित्य ने इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि नैना को मुश्किल से सुनाई दिया। “बाक़ी सब पर तो धूल जमी है…”
तभी खिड़की से हवा का एक झोंका आया और हारमोनियम का एक सुर अपने आप बज उठा। नैना ने टॉर्च घुमाई। हारमोनियम के ऊपर एक पुरानी डायरी रखी थी। पहले पन्ने पर साफ़ अक्षरों में लिखा था, “कमला। मेरा गीत, मेरी छोटी बहन सरला के लिए।”
सरला। नानी का नाम सरला था।
नानी की कहानी
“तो तुम लोग ऊपर पहुँच ही गए।”
दोनों ने चौंककर पीछे देखा। दरवाज़े पर नानी खड़ी थीं, हाथ में एक दीया लिए। उनके चेहरे पर ग़ुस्सा नहीं था। आँखें भीगी हुई थीं।
“नानी, हम… सॉरी…” आदित्य हकलाया।
नानी धीरे-धीरे अंदर आईं और हारमोनियम के पास बैठ गईं। उन्होंने उसकी चाबियों पर ऐसे हाथ फेरा जैसे किसी बच्चे के सिर पर फेर रही हों।
“ये कमरा मेरी बड़ी दीदी कमला का था,” उन्होंने कहा। “वो इतना सुंदर गाती थीं कि पूरा मोहल्ला छतों पर आकर सुनता था। हर दीवाली की रात वो मुझे यही गीत सुनाती थीं। फिर एक साल बहुत तेज़ बुखार आया, और दीवाली से पहले ही…” नानी का गला भर आया। “उसके बाद मुझसे ये कमरा खोला नहीं गया। बस ताला लगा दिया।”
नैना ने नानी का हाथ थाम लिया। “पर नानी, फिर रात को ये बजाता कौन है?”
नानी बहुत देर चुप रहीं। फिर हल्के से मुस्कुराईं। “मैं भी चालीस साल से यही सोच रही हूँ बिटिया। हर साल दीवाली के आसपास ये धुन बजती है। पहले डर लगता था। अब लगता है, दीदी हर साल मुझे अपना गीत सुनाने आती हैं।”
दीवाली की सुबह
उस रात तीनों ने मिलकर कमरे की सफ़ाई की। नानी ने पहली बार उस खिड़की पर दीया रखा। नैना ने डायरी के पन्ने पलटे तो उसमें उसी धुन के सुर लिखे मिले, जो वो दो रातों से सुन रही थी। अब याद आया कि ये धुन उसने कहाँ सुनी थी। बचपन में नानी उसे सुलाते वक़्त यही गुनगुनाती थीं।
दीवाली की सुबह जब नैना ऊपर गई, तो दरवाज़ा खुला था, जैसा वो छोड़कर आई थी। पर हारमोनियम के ऊपर ताज़े हरसिंगार के फूल रखे थे। हवेली के आँगन में हरसिंगार का कोई पेड़ नहीं था।
नैना देर तक उन फूलों को देखती रही। फिर उसने एक फूल उठाया, नीचे जाकर चुपचाप नानी की हथेली पर रख दिया। नानी ने कुछ नहीं पूछा। बस आँखें बंद करके वही धुन गुनगुनाने लगीं।
उस साल के बाद तीसरी मंज़िल पर फिर कभी ताला नहीं लगा।
कहानी के बारे में
कुछ कहानियाँ डराने के लिए नहीं, याद दिलाने के लिए होती हैं कि जिन्हें हम प्यार करते हैं, वो किसी न किसी रूप में हमारे पास रहते हैं। पुरानी हवेलियाँ, दादी-नानी की यादें और त्योहारों की रातें, इन सबमें एक अलग ही जादू होता है। अगर आपको त्योहारों से जुड़ी कथाएँ पसंद हैं, तो तुलसी विवाह और देवउठनी एकादशी की कथा भी पढ़िए, और बच्चों के लिए चालाक लोमड़ी और अंगूर की बेल वाली पंचतंत्र की कहानी भी ज़रूर देखिए। ऐसी और रहस्य और डरावनी कहानियाँ पढ़ने के लिए जुड़े रहिए।
