सोनधारा नदी के किनारे बसे छोटे-से गाँव पलाशपुर में माधो नाम का एक लकड़हारा रहता था। घर क्या था, मिट्टी की दो कोठरियाँ और ऊपर खपरैल की छत। घर में थी उसकी पत्नी सुखिया, सात साल की बेटी चुनिया, और एक पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी, जो माधो को अपने बाबा से मिली थी। धार उसकी कई बार घिस चुकी थी, बेंत पर पसीने के दाग़ जम गए थे, पर माधो उसे ऐसे सँभालकर रखता जैसे कोई गहना हो।
“यही तो हमारी रोटी है,” वह हँसकर कहता। “इसी से चूल्हा जलता है, इसी से चुनिया की स्लेट आती है।”
नदी किनारे की वह दोपहर
उस साल कार्तिक की धूप कुछ ज़्यादा ही चुभ रही थी। माधो सुबह-सुबह जंगल निकल गया था। नदी के ऊपर झुका हुआ एक सूखा पेड़ उसने कई दिन पहले देख रखा था। सोचा, आज उसी की मोटी डालें काट लूँगा, तो हफ़्ते भर की लकड़ी हो जाएगी।
वह डाल पर चढ़ा, पैर जमाए और कुल्हाड़ी चलानी शुरू की। ठक… ठक… ठक। माथे से पसीना टपक रहा था, हाथ थक चुके थे। अचानक हथेली ज़रा-सी फिसली और कुल्हाड़ी उछलकर सीधे नदी में जा गिरी। छप्प! पानी में बस कुछ गोल-गोल लहरें उठीं और फिर सब शांत।
माधो जल्दी से नीचे उतरा। किनारे पर घुटनों के बल बैठकर उसने पानी में झाँका। नदी वहाँ गहरी थी, तल दिखता ही नहीं था। उसने हाथ डालकर टटोला, एक लंबी डंडी से कोशिश की, पर कुछ हाथ न आया।
वह वहीं बैठ गया। गला भर आया। “अब क्या करूँगा? नई कुल्हाड़ी के पैसे कहाँ से लाऊँगा? घर जाकर सुखिया से क्या कहूँगा?” उसकी आँखों से आँसू चुपचाप बहने लगे।
पानी से उठी रोशनी
तभी नदी के बीच से एक हल्की-सी चमक उठी। पानी में भँवर-सा बना और उसमें से एक बूढ़े बाबा प्रकट हुए। लंबी सफ़ेद दाढ़ी, चेहरे पर मुस्कान, और पूरा शरीर जैसे धूप और पानी से मिलकर बना हो।
माधो डर के मारे पीछे खिसक गया। बाबा ने नरमी से कहा, “डरो मत, बेटा। मैं इस नदी का रखवाला हूँ। बहुत देर से तुम्हें रोते देख रहा हूँ। क्या हुआ?”
माधो ने हाथ जोड़कर सारी बात बता दी। बाबा ने सिर हिलाया और बिना कुछ कहे पानी में डुबकी लगा दी।
कुछ ही पल में वे बाहर आए। उनके हाथ में एक कुल्हाड़ी थी, जो धूप में ऐसे चमक रही थी कि आँखें चौंधिया जाएँ। पूरी की पूरी सोने की।
“यह लो, क्या यही तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”
माधो एक पल को उसे देखता रह गया। मन में आया, यह मिल जाए तो ज़िंदगी बदल जाए। चुनिया का स्कूल, सुखिया की नई साड़ी, बरसात में न टपकने वाली छत… पर अगले ही पल उसने सिर झुका लिया।
“नहीं बाबा, यह मेरी नहीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी, पुरानी-सी।”
बाबा की आँखों में कुछ चमका। वे फिर डुबकी लगाकर लौटे, इस बार चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर। उसकी धार पर चाँदनी जैसी सफ़ेदी थी।
“तो फिर यह होगी?”
माधो ने इस बार ज़रा भी देर नहीं की। “नहीं बाबा, यह भी मेरी नहीं है।”
तीसरी बार बाबा पानी से निकले तो उनके हाथ में वही घिसी हुई, पसीने के दागों वाली लोहे की कुल्हाड़ी थी। माधो का चेहरा खिल उठा। “हाँ, हाँ! यही है मेरी कुल्हाड़ी!” उसने लपककर उसे थाम लिया और सीने से लगा लिया, जैसे कोई बिछड़ा हुआ दोस्त मिल गया हो।
बाबा ज़ोर से हँस पड़े। “आज बहुत दिनों बाद किसी ने मुझे ख़ुश किया है, माधो। सोना देखकर तो बड़े-बड़ों का मन डोल जाता है। तुम्हारा नहीं डोला। तुम्हारी सच्चाई का इनाम यह है।” और उन्होंने सोने और चाँदी की दोनों कुल्हाड़ियाँ भी उसके हाथ में रख दीं। माधो कुछ कह पाता, उससे पहले ही बाबा पानी में समा गए।
गाँव में फैली ख़बर
उस शाम माधो घर पहुँचा तो सुखिया ने चमकती कुल्हाड़ियाँ देखकर पहले तो डर के मारे दरवाज़ा ही बंद कर दिया। “कहाँ से लाए? किसी का कुछ उठा तो नहीं लाए?”
माधो ने पूरी कहानी सुनाई। चुनिया ताली बजाकर नाचने लगी। सुखिया की आँखें भर आईं। “मुझे पता था, तुम्हारी नीयत कभी खोटी नहीं होगी।”
पर गाँव में बातें छुपती कहाँ हैं! अगली सुबह तक पूरे पलाशपुर में ख़बर फैल चुकी थी। सबसे ज़्यादा बेचैन था माधो का पड़ोसी कल्लू। कल्लू भी लकड़ी काटता था, पर उसका ध्यान काम से ज़्यादा दूसरों की थाली पर रहता था।
“अरे, इतना आसान है?” वह मन ही मन बुदबुदाया। “कुल्हाड़ी गिराओ, थोड़ा रोओ, सोना ले आओ!”
लालच की डुबकी
दोपहर होते ही कल्लू उसी पेड़ के पास पहुँचा। उसने इधर-उधर देखा, फिर जान-बूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी। फिर किनारे बैठकर ज़ोर-ज़ोर से रोने का नाटक करने लगा। “हाय मेरी कुल्हाड़ी! हाय मैं लुट गया!”
पानी में फिर वही चमक उठी। बाबा प्रकट हुए। “क्या बात है, भाई?”
“बाबा, मेरी कुल्हाड़ी गिर गई। बहुत क़ीमती थी,” कल्लू ने आँखें मलते हुए कहा।
बाबा ने डुबकी लगाई और सोने की कुल्हाड़ी लेकर निकले। “क्या यह तुम्हारी है?”
कल्लू की आँखें फैल गईं। उसने बिना एक पल सोचे हाथ बढ़ा दिए। “हाँ बाबा, हाँ! यही है! बिल्कुल यही!”
बाबा का चेहरा गंभीर हो गया। “झूठ बोलकर पाई हुई चीज़ किसी की नहीं होती, कल्लू। न यह सोना तुम्हारा है, और जिस कुल्हाड़ी को तुमने ख़ुद फेंका, अब वह भी नदी की हुई।” इतना कहकर वे पानी में लौट गए और लहरें फिर शांत हो गईं।
कल्लू बहुत देर तक चिल्लाता रहा, पानी में हाथ मारता रहा। पर इस बार कोई नहीं आया। शाम को वह ख़ाली हाथ, झुके कंधों के साथ गाँव लौटा।
माधो का बड़ा दिल
अगली सुबह माधो को सब पता चल गया। वह सीधे कल्लू के घर गया। कल्लू शर्म से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
माधो ने अपनी पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी उसकी ओर बढ़ाई। “ले भाई, जब तक नई न आए, इसी से काम चला। रोटी का सवाल है।”
कल्लू का गला रुँध गया। “तू मुझे यह क्यों दे रहा है? मैंने तो तुझसे जलन की थी।”
माधो मुस्कुराया। “बाबा ने मुझे सोना दिया, पर सिखाया कुछ और ही। जो सच के साथ खड़ा रहता है, उसका हाथ कभी ख़ाली नहीं रहता।”
उस दिन के बाद माधो ने सोने-चाँदी की कुल्हाड़ियाँ बेचकर घर की छत ठीक करवाई, चुनिया को स्कूल भेजा और गाँव के कुएँ की मरम्मत में भी हाथ बँटाया। और कल्लू? कहते हैं, उसने फिर कभी किसी से झूठ नहीं बोला।
कहानी की सीख
ईमानदारी का फल हमेशा उसी पल नहीं मिलता, पर जब मिलता है तो मन भी भरता है और घर भी। लालच में बोला गया एक झूठ अक्सर वह भी छीन लेता है, जो पहले से हमारे पास होता है।
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