बहुत पुरानी बात है। एक हरे-भरे जंगल के किनारे एक छोटा-सा गाँव बसा था, और गाँव के आख़िरी छोर पर था रामदीन काका का बाग़। बाग़ में आम थे, अमरूद थे, पर सबसे ख़ास थी मिट्टी की पुरानी दीवार से लिपटी अंगूर की एक बेल। गर्मियों के आख़िर में उस पर ऐसे गुच्छे लटकते कि दूर से लगता, जैसे किसी ने बैंगनी मोतियों की मालाएँ टाँग दी हों।
उसी जंगल में रहती थी चमकी — एक भूरी-लाल लोमड़ी, जिसकी पूँछ जितनी घनी थी, बातें उससे भी ज़्यादा घनी। जंगल के सब जानवर कहते थे, “चमकी से बहस मत करना, वह हारकर भी जीत जाती है।” और चमकी को यह बात सुनकर बड़ा गर्व होता था।
बेल पर लटका लालच
एक दोपहर धूप कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी। चमकी सुबह से भटक रही थी। न कोई खरगोश हाथ आया, न कोई गिरा हुआ फल। पेट में चूहे दौड़ रहे थे। तभी हवा के साथ एक मीठी-सी ख़ुशबू आई। उसने नाक ऊपर उठाई, आँखें सिकोड़ीं और ख़ुशबू के पीछे-पीछे चल पड़ी।
दीवार के पास पहुँचकर वह ठिठक गई। ऊपर, बहुत ऊपर, पके अंगूरों के गुच्छे धूप में चमक रहे थे।
“वाह!” चमकी के मुँह से निकला। “आज तो भगवान ने ख़ुद दावत भेजी है।”
बेल की एक डाल पर बैठी चिनमुनी गौरैया यह सब देख रही थी। वह हँसकर बोली, “दावत तो है, चमकी बहन, पर मेज़ ज़रा ऊँची लगी है।”
“ऊँची-नीची मेरे लिए कोई चीज़ नहीं,” चमकी ने पूँछ झटकी। “बस देखती जाओ।”
उसने दो क़दम पीछे लिए, ज़ोर लगाया और उछली। पंजे हवा में लहराए, और वह धम्म से नीचे आ गिरी। अंगूर वहीं के वहीं।
“पहली बार तो गरम होने के लिए थी,” उसने धूल झाड़ते हुए कहा।
दूसरी छलाँग। तीसरी। चौथी। हर बार गुच्छा जैसे उसे चिढ़ाता हुआ थोड़ा और ऊपर खिसक जाता — कम से कम चमकी को तो ऐसा ही लगा। पाँचवीं बार वह इतनी बुरी तरह गिरी कि पास की झाड़ी में उलझ गई। कान में एक काँटा भी चुभ गया।
चिनमुनी ने अपनी चोंच से हँसी दबाई। “थोड़ा सुस्ता लो। धूप बहुत है।”
खट्टे अंगूरों का बहाना
चमकी हाँफती हुई उठी। उसने ऊपर गुच्छों को देखा, फिर चारों तरफ़ नज़र घुमाई कि कहीं कोई और तो नहीं देख रहा। झाड़ियों के पीछे से दो गिलहरियाँ झाँक रही थीं। चमकी ने फ़ौरन अपनी गर्दन सीधी कर ली।
“हुँह,” उसने ज़ोर से कहा, ताकि सब सुन लें, “ये अंगूर तो खट्टे हैं। रंग देखो ज़रा, अभी कच्चे हैं। ऐसे अंगूर खाकर पेट ख़राब करना कौन-सी समझदारी है?”
गिलहरियाँ एक-दूसरे को देखकर खी-खी करने लगीं। चिनमुनी ने एक दाना तोड़ा, चखा और आँखें मूँद लीं।
“अरे, ये तो शहद जैसे मीठे हैं,” उसने कहा।
“तुम्हारी ज़बान छोटी है, तुम्हें क्या पता खट्टा-मीठा,” चमकी ने मुँह बिचकाया और तेज़ क़दमों से जंगल की ओर लौट गई। पर उस रात उसे नींद नहीं आई। पेट ख़ाली था, और मन उससे भी ज़्यादा।
अगली सुबह का रहस्य
अगली सुबह चमकी चुपचाप फिर बाग़ की तरफ़ आई। इस बार उसने किसी को दिखाने के लिए नहीं, बस अपने मन के लिए दीवार की ओर देखा। तभी उसकी नज़र नीचे ज़मीन पर पड़ी। रात की हवा में कुछ गुच्छे टूटकर गिर गए थे, और बेल की जड़ के पास गाँव का एक छोटा लड़का, मुन्ना, बैठा उन्हें टोकरी में भर रहा था।
चमकी झाड़ी के पीछे दुबक गई। मुन्ना ने एक अंगूर मुँह में डाला और मुस्कुराया। फिर उसने ऊपर डाल पर बैठी चिनमुनी को देखा और कुछ दाने दीवार पर रख दिए। “लो, तुम्हारा हिस्सा।”
चिनमुनी फुदककर नीचे आई। फिर उसकी नज़र झाड़ी की ओर गई, जहाँ से एक भूरी पूँछ का सिरा झाँक रहा था।
“चमकी बहन,” उसने धीरे से पुकारा, “बाहर आ जाओ। कल वाले खट्टे अंगूर आज मीठे हो गए हैं।”
चमकी का चेहरा शर्म से और लाल हो गया। वह धीरे-धीरे बाहर निकली। मुन्ना पहले तो डरा, फिर देखा कि लोमड़ी कुछ बोल नहीं रही, बस सिर झुकाए खड़ी है।
“तुम्हें भूख लगी है?” मुन्ना ने पूछा।
चमकी ने कुछ देर सोचा। उसके भीतर से पुरानी आदत बोली, कह दो कि नहीं, तुम्हें अंगूर पसंद ही नहीं। पर पेट ने, और शायद दिल ने भी, कुछ और कहा।
“हाँ,” उसने धीमे से कहा। “बहुत। और… कल मैंने झूठ बोला था। अंगूर खट्टे नहीं थे। बस मैं उन तक पहुँच नहीं पाई थी, और यह मानने में मुझे शर्म आ रही थी।”
चिनमुनी ने ख़ुशी से पंख फड़फड़ाए। “देखा! सच बोलने में कोई काँटा नहीं चुभा।”
मुन्ना हँस पड़ा और उसने एक छोटा गुच्छा चमकी की ओर बढ़ा दिया। चमकी ने एक दाना चखा। मीठा था — कल से भी ज़्यादा मीठा, क्योंकि आज उसके साथ कोई झूठ नहीं मिला था।
जंगल में नई बात
उस दिन के बाद जंगल में एक नई बात फैल गई। लोग अब भी कहते थे, “चमकी से बहस मत करना।” पर साथ में यह भी जोड़ते, “हाँ, अगर वह कहे कि उससे कोई काम नहीं हुआ, तो मान लेना — वह सच कह रही है।”
और चमकी? वह अब भी कभी-कभी ऊँची डालों तक उछलती है। कभी पहुँच जाती है, कभी नहीं। पर जब नहीं पहुँचती, तो किसी चीज़ को खट्टा नहीं कहती। बस हँसकर कहती है, “आज नहीं, तो कल सही। और कल भी नहीं, तो किसी दोस्त से मदद माँग लूँगी।”
सीख: जो चीज़ हमें न मिले, उसे बुरा कह देना आसान है, पर अपनी कमी को सच्चाई से मान लेना ही असली हिम्मत है। सच मानने से ही सीखने और मदद पाने का रास्ता खुलता है।
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