काशी के घाट पर रात में घुटनों के बल बैठे राजा हरिश्चंद्र को अपनी साड़ी का आँचल देती रानी तारामती, ऊपर बादलों से उतरती सुनहरी रोशनी

यह राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है। यह कथा पुराणों और लोक परंपरा से आती है, इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में न पढ़ें।

अयोध्या में एक राजा थे, हरिश्चंद्र। लोग कहते थे कि उनके राज में ताले की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। वजह सीधी थी। राजा ख़ुद कभी झूठ नहीं बोलते थे, और जो वचन दे देते, उसे निभाकर ही दम लेते। रानी तारामती और नन्हा बेटा रोहिताश्व, यही उनका छोटा-सा संसार था।

उनकी यही ख्याति एक दिन ऋषि विश्वामित्र तक पहुँची। ऋषि मुस्कुराए। “सच बोलना आसान है,” उन्होंने मन ही मन कहा, “जब तक सच की कोई क़ीमत न चुकानी पड़े। देखते हैं, यह राजा कितना खरा है।”

सपने में दिया दान

एक रात हरिश्चंद्र ने अजीब सपना देखा। सपने में एक तेजस्वी ऋषि उनके सामने खड़े थे और राजा हाथ जोड़कर कह रहे थे, “महाराज, मेरा पूरा राज्य आपका हुआ।”

सुबह आँख खुली तो राजा देर तक छत की ओर देखते रहे। अभी वे सोच ही रहे थे कि यह सपना था या कुछ और, तभी द्वारपाल दौड़ता हुआ आया। “महाराज, ऋषि विश्वामित्र पधारे हैं।”

ऋषि सीधे दरबार में आए और बोले, “राजन्, कल रात आपने अपना राज्य मुझे दान दे दिया था। याद है?”

दरबार में खुसर-फुसर होने लगी। मंत्री ने धीरे से कहा, “महाराज, सपने का दान भला कौन मानता है?”

हरिश्चंद्र कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने सिर उठाया। “वचन तो वचन है, मंत्री जी। सपने में दिया हो या जागते हुए, मेरे मुँह से निकला है। आज से अयोध्या ऋषिवर की है।”

विश्वामित्र ने भौंहें चढ़ाईं। “इतना ही नहीं। दान के बाद दक्षिणा भी दी जाती है। मुझे एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ चाहिए।”

राजा ने हाथ जोड़े। “राज्य तो अब आपका है, खज़ाना भी आपका। मेरे पास अपना कुछ नहीं बचा। मुझे एक महीने का समय दीजिए, मैं दक्षिणा चुका दूँगा।”

काशी की राह

उसी दिन राजा, रानी और छोटा रोहिताश्व साधारण कपड़ों में अयोध्या से निकल पड़े। पीछे से प्रजा रो रही थी। कोई कहता, “महाराज, मत जाइए।” कोई पैरों पर गिर पड़ता। हरिश्चंद्र ने किसी की ओर मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि जानते थे कि एक बार मुड़े तो क़दम रुक जाएँगे।

रास्ते में रोहिताश्व ने पूछा, “पिताजी, हम कहाँ जा रहे हैं? हमारा महल कहाँ गया?”

तारामती ने बेटे को गोद में उठा लिया। “हम एक वचन निभाने जा रहे हैं, बेटा। और वचन निभाने वाले का घर उसका सच होता है।”

कई दिनों की थकान के बाद वे काशी पहुँचे। महीना पूरा होने को था और दक्षिणा का एक सिक्का भी हाथ में नहीं था। तभी विश्वामित्र फिर सामने आ खड़े हुए। “समय पूरा हुआ, राजन्। मेरी दक्षिणा?”

बिकता हुआ परिवार

उस दिन काशी के बाज़ार में जो हुआ, उसे देखकर पत्थर भी पिघल जाता। तारामती आगे बढ़ीं और धीमी पर दृढ़ आवाज़ में बोलीं, “स्वामी, मुझे बेच दीजिए। आपका वचन टूटना नहीं चाहिए।”

हरिश्चंद्र का गला भर आया, पर दूसरा कोई रास्ता नहीं था। एक ब्राह्मण ने रानी और बेटे को दासी और दास के रूप में ख़रीद लिया। जाते समय रोहिताश्व बार-बार पीछे मुड़कर पिता को देखता रहा। राजा वहीं खड़े रहे, आँखें सूखी, पर भीतर सब कुछ टूट रहा था।

फिर भी दक्षिणा पूरी नहीं हुई। आख़िर में हरिश्चंद्र ने ख़ुद को बेच दिया। ख़रीदार था श्मशान घाट का डोम, जो मरघट की देखभाल करता था। अयोध्या का राजा अब श्मशान का चौकीदार था। उसका काम था हर चिता से कर वसूलना, उसके बाद ही कोई अंतिम संस्कार हो सकता था।

दिन बीते, महीने बीते। हरिश्चंद्र धुएँ और राख के बीच रहते, रात-रात भर जागते। पर एक बात कभी नहीं बदली। जो नियम उन्हें सौंपा गया था, उसे वे पूरी ईमानदारी से निभाते रहे।

सबसे कठिन रात

एक दिन बगीचे में फूल तोड़ते समय रोहिताश्व को साँप ने डस लिया। नन्हा बच्चा वहीं गिर पड़ा और फिर नहीं उठा। तारामती के पास न पैसे थे, न कोई सहारा। रात के अँधेरे में, बेटे को आँचल में लपेटे, वे अकेली श्मशान पहुँचीं।

बादल गरज रहे थे। बिजली चमकी, तो चौकीदार ने आगे बढ़कर कहा, “रुको। पहले कर दो, फिर चिता जलेगी।”

तारामती ने आवाज़ पहचान ली। हरिश्चंद्र ने भी बिजली की रोशनी में वह चेहरा देख लिया, और फिर गोद में लेटा वह छोटा-सा शरीर।

कुछ देर किसी के मुँह से एक शब्द नहीं निकला। फिर तारामती फूट-फूटकर रो पड़ीं। “स्वामी, यह हमारा रोहित है। मेरे पास देने को कुछ नहीं है।”

हरिश्चंद्र घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने बेटे का माथा छुआ। हाथ काँप रहे थे। मन चीख रहा था कि नियम-विधान सब छोड़ दो, यह तुम्हारा अपना बेटा है।

पर अगले ही पल उन्होंने आँसू पोंछे और भारी आवाज़ में कहा, “तारा, यह मरघट मेरा नहीं, मेरे स्वामी का है। मैं उनका सेवक हूँ। अगर आज अपने बेटे के लिए नियम तोड़ दूँ, तो कल किसी और के लिए क्यों नहीं? कर तो देना ही होगा।”

तारामती ने कुछ नहीं कहा। उनके पास बस एक साड़ी थी, जो वे पहने हुए थीं। उन्होंने काँपते हाथों से उसका आधा हिस्सा फाड़ा और पति की ओर बढ़ा दिया। “यही है मेरे पास। इसे कर समझ लीजिए।”

जब आसमान झुक गया

जैसे ही हरिश्चंद्र ने हाथ बढ़ाया, पूरा श्मशान एक अजीब-सी रोशनी से भर गया। बादल छँट गए। सामने विश्वामित्र खड़े थे, और उनके साथ देवता भी।

विश्वामित्र की आँखें नम थीं। “बस करो, राजन्। मैंने तुम्हारी हर तरह से परीक्षा ली। राज्य छीना, परिवार छीना, सम्मान छीना। पर तुम्हारा सच नहीं छीन सका।”

कथा कहती है कि उसी पल रोहिताश्व ने आँखें खोल दीं, जैसे गहरी नींद से जागा हो। वह उठकर माँ से लिपट गया। तारामती हँस भी रही थीं और रो भी रही थीं। हरिश्चंद्र ने बेटे को सीने से लगाया तो बरसों का बोझ जैसे एक पल में उतर गया।

विश्वामित्र ने अयोध्या का राज्य लौटा दिया। देवताओं ने कहा कि जब तक धरती पर सच का नाम लिया जाएगा, हरिश्चंद्र का नाम भी लिया जाएगा। और सचमुच, आज भी किसी सच्चे इंसान की तारीफ़ करनी हो, तो लोग कहते हैं, “अरे, वह तो राजा हरिश्चंद्र है।”

कहानी से सीख

सच बोलना तब कठिन होता है, जब उसकी क़ीमत चुकानी पड़े। राजा हरिश्चंद्र की कहानी याद दिलाती है कि मुश्किल वक़्त में भी अपने वचन और ईमानदारी पर टिके रहना ही इंसान को सच में बड़ा बनाता है।

सच की ताक़त पर एक और प्यारी कहानी है ईमानदार लकड़हारा और सोने की कुल्हाड़ी, उसे भी ज़रूर पढ़िए। अगर राजाओं की रोचक कथाएँ पसंद हैं, तो विक्रम बेताल: किसका पाप बड़ा आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। और ऐसी ही कहानियों के लिए हमारी ऐतिहासिक कहानियाँ श्रेणी देखिए।

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