यह एक काल्पनिक कहानी है। इसके पात्र और गाँव लेखक की कल्पना हैं।
सोनपुर गाँव के पश्चिमी छोर पर, पीपल के बूढ़े पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक पुराना कुआँ था। किसी ज़माने में पूरा गाँव इसी कुएँ का पानी पीता था। फिर गाँव में हैंडपंप लगे, नल आए, और कुआँ धीरे-धीरे अकेला पड़ गया। पिछली गर्मियों में तो उसका पानी भी लगभग सूख गया था।
सब ठीक चल रहा था, जब तक कार्तिक की उस ठंडी रात को रामू चौकीदार हाँफता हुआ चौपाल पर नहीं पहुँचा।
“कुएँ में कोई है!” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मैंने अपने कानों से सुना। कोई धीमे-धीमे बुला रहा था… पानी… बेटा… आ जा…“
चौपाल पर बैठे लोग एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। किसी ने हँसकर कहा, “रामू, आज फिर भाँग चढ़ा ली क्या?” पर अगली रात दो और लोगों ने वही आवाज़ सुनी। तीसरी रात तक तो पूरे गाँव में बात फैल चुकी थी। औरतों ने शाम होते ही उस रास्ते से जाना बंद कर दिया। किसी ने कहा, किसी भटकती आत्मा का वास है। किसी ने कहा, ओझा बुलाओ।
ग्यारह साल की मुन्नी को ये सब बातें बिल्कुल हज़म नहीं हो रही थीं। वह अपने दादाजी, मास्टर दीनदयाल के पास बैठी थी, जो चालीस साल गाँव के स्कूल में बच्चों को विज्ञान पढ़ा चुके थे।
“दादाजी, भूत सच में होते हैं?”
दादाजी ने चश्मा उतारा, धोती के कोने से पोंछा और मुस्कुराए। “मुन्नी, जिस चीज़ को हम समझ नहीं पाते, उसी को डर का नाम दे देते हैं। डरना बुरा नहीं, पर बिना देखे मान लेना ठीक नहीं।”
“तो चलिए न, देखते हैं!”
दादाजी कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “ठीक है। पर अकेले नहीं, और लालटेन लेकर।”
लालटेन की रोशनी में
मुन्नी अपने पक्के दोस्त राघव को भी साथ ले आई। राघव बहादुरी की बातें तो ख़ूब करता था, पर उस रात पीपल के पास पहुँचते ही उसने मुन्नी की चुन्नी का कोना कसकर पकड़ लिया।
चाँद पूरा निकला हुआ था। पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे। तीनों कुएँ की मुँडेर से कुछ दूरी पर चुपचाप बैठ गए। आधा घंटा बीता। राघव फुसफुसाया, “शायद आज भूत छुट्टी पर है।”
तभी कुएँ के भीतर से वही आवाज़ उठी। धीमी, थकी हुई, जैसे कोई बूढ़ी औरत बोल रही हो।
“पानी… बेटा… आ जा…”
राघव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। मुन्नी के रोंगटे भी खड़े हो गए, पर उसने ग़ौर किया कि आवाज़ हर बार बिल्कुल एक जैसी थी। वही ठहराव, वही सुर, जैसे कोई रिकॉर्डिंग बार-बार बज रही हो।
दादाजी ने धीरे से लालटेन उठाई और कुएँ की मुँडेर पर झुके। मुन्नी भी उनके बग़ल में आ गई। लालटेन की पीली रोशनी पत्थर की दीवार पर नीचे तक फैल गई।
और वहाँ, दीवार की एक दरार में, एक छोटी-सी काली चिड़िया बैठी थी। पीली चोंच, पीली आँखों के घेरे। उसने गर्दन टेढ़ी करके रोशनी की तरफ़ देखा और फिर बोली, “पानी… बेटा… आ जा…”
राघव का मुँह खुला का खुला रह गया। “ये… ये तो मैना है!”
दादाजी हँस पड़े। “हाँ बेटा, पहाड़ी मैना। ये चिड़िया इंसानों की बोली हूबहू नक़ल कर लेती है। पर सवाल ये है कि इसने ये शब्द सीखे किससे?”
रामदेई अम्मा
अगली सुबह मुन्नी के दिमाग़ में बस यही सवाल घूम रहा था। कुएँ पर रोज़ आने वाला कौन था? किसकी आवाज़ थी वो?
उसने गाँव की सबसे पुरानी पनिहारिन, बिमला चाची से पूछा। चाची ने पानी का घड़ा नीचे रखा और कुछ याद करती हुई बोलीं, “अरे, वो तो रामदेई अम्मा होंगी। बरसों से रोज़ सुबह उसी कुएँ पर आती थीं। उनका बेटा किशन शहर कमाने गया, फिर लौटा ही नहीं। अम्मा कुएँ से पानी खींचतीं और बड़बड़ाती रहतीं, ‘पानी भर लिया बेटा, अब तू भी आ जा।’ हम लोग सोचते थे, बुढ़ापे में दिमाग़ थोड़ा फिर गया है।”
“अब वो कहाँ हैं?” मुन्नी ने पूछा।
चाची का चेहरा उतर गया। “दो महीने से तो दिखी नहीं। सुना है बीमार हैं। गाँव के उस पार अकेली रहती हैं।”
मुन्नी के गले में कुछ अटक गया। दो महीने। और इन दो महीनों में किसी ने एक बार भी नहीं पूछा। सब कुएँ की आवाज़ से डर रहे थे, पर जिसकी आवाज़ थी, उसकी किसी को याद तक नहीं आई।
उस दोपहर मुन्नी, राघव और दादाजी रामदेई अम्मा के घर पहुँचे। मिट्टी की छोटी-सी कोठरी थी। अंदर खाट पर एक दुबली-पतली बुढ़िया लेटी थीं, कमज़ोर आँखें दरवाज़े पर टिकी हुईं।
“कौन है? किशन?”
मुन्नी उनके पास जाकर बैठ गई। “नहीं अम्मा, मैं मुन्नी हूँ। मास्टरजी की पोती।”
अम्मा ने काँपता हाथ उसके सिर पर रखा। “आ गई बिटिया… कोई तो आया।”
बातों-बातों में पता चला कि अम्मा को बुखार था, घुटनों में दर्द था, और कई दिन से ठीक से खाना भी नहीं बना था। जब मुन्नी ने उन्हें कुएँ वाली मैना के बारे में बताया, तो अम्मा की आँखें भर आईं।
“वो मेरी सहेली है री,” उन्होंने धीरे से कहा। “रोज़ सुबह मुँडेर पर बैठी रहती थी। मैं उसे रोटी के टुकड़े डालती थी और उससे बातें करती थी। किशन से जो कहना होता, उसी से कह देती थी।” वे हल्का-सा हँसीं, “अब देखो, मैं नहीं जा पाई तो वो मुझे बुला रही है।”
कुआँ फिर से बोला
बात जब गाँव में पहुँची, तो जो लोग ओझा बुलाने की तैयारी कर रहे थे, वही अब शर्मिंदा होकर नज़रें चुराने लगे। रामू चौकीदार तो सीधा अम्मा के घर दूध लेकर पहुँच गया। बिमला चाची ने रोज़ का खाना अपने ज़िम्मे ले लिया। सरपंच जी ने गाँव के डॉक्टर को भेजा।
दादाजी ने एक और बात कही, जो सबको जँची। “कुआँ भी हमारी ही लापरवाही से सूखा है। इसकी सफ़ाई करवाओ, बरसात का पानी इसमें मोड़ो। अपनी पुरानी चीज़ों और अपने बुज़ुर्गों को ऐसे ही भूल जाना ठीक नहीं।”
अगले कुछ हफ़्तों में गाँव के लड़कों ने मिलकर कुएँ की गाद निकाली, मुँडेर की टूटी ईंटें जोड़ीं। मैना की दरार को किसी ने नहीं छुआ।
और फिर एक दिन डाकिया एक चिट्ठी लेकर आया। सरपंच जी ने अम्मा के बेटे किशन का पुराना पता ढूँढकर उसे ख़त भिजवाया था। जवाब आया था। किशन आ रहा था, अपनी पत्नी और छोटे बेटे के साथ।
जिस सुबह किशन गाँव पहुँचा, अम्मा मुन्नी का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे कुएँ तक गईं। बरसों बाद। मैना मुँडेर पर बैठी थी। अम्मा ने रोटी का एक टुकड़ा उसकी तरफ़ बढ़ाया और मुस्कुराकर बोलीं, “देख, आ गया मेरा बेटा।”
मैना ने गर्दन घुमाई, पंख फैलाए, और बोली, “पानी… बेटा… आ जा…”
इस बार कोई नहीं डरा। सब हँस पड़े। किशन की आँखों से आँसू बह रहे थे।
उस रात मुन्नी ने दादाजी से कहा, “दादाजी, कुएँ में भूत नहीं था। पर फिर भी वो किसी को बुला तो रहा था, है न?”
दादाजी ने उसका माथा चूमा। “हाँ बिटिया। कभी-कभी सबसे डरावनी आवाज़ें बस किसी अकेले इंसान की पुकार होती हैं। उसे सुनने के लिए हिम्मत चाहिए, और थोड़ा-सा दिल भी।”
कहानी से सीख
हर रहस्य के पीछे भूत नहीं होता। कई बार डर के पीछे एक ऐसा सच छिपा होता है जो हमारी नज़रों के सामने होते हुए भी अनदेखा रह जाता है। अगर आपको ऐसी कहानियाँ पसंद हैं, तो पुरानी हवेली की तीसरी मंज़िल भी ज़रूर पढ़िए, और एक दूसरे कुएँ की मज़ेदार चाल के लिए तेनालीराम और चोरों का कुआँ देखिए। ऐसी और रहस्य और डरावनी कहानियाँ यहाँ पढ़ें।
