गाँव के आँगन में चूल्हे पर रोटियाँ सेंकती धन्नो अम्मा थके राहगीर को रोटी की थाली देती हुईं और पास बैठा गोलू अपनी रोटी बाँटता हुआ

पौष की वह शाम कुछ ज़्यादा ही जल्दी ढल गई थी। सूरज अभी ठीक से डूबा भी नहीं था कि खेतों पर धुंध की चादर बिछने लगी। सिरसा गाँव के आख़िरी छोर पर, कच्ची सड़क के किनारे, धन्नो अम्मा की छोटी-सी झोपड़ी थी। छप्पर पुराना था, दीवारें गोबर से लिपी हुईं, और आँगन में एक मिट्टी का चूल्हा, जिसकी आग में अम्मा की पूरी दुनिया गरम रहती थी।

अम्मा अकेली नहीं थीं। उनके साथ रहता था दस साल का गोलू, उनका पोता। गोलू के माँ-बाप शहर में मज़दूरी करते थे और साल में एक-दो बार ही आ पाते थे। अम्मा दूसरों के खेतों में निराई करके, कभी किसी के यहाँ अनाज फटककर, जैसे-तैसे घर चलाती थीं।

उस दिन आटे का डिब्बा लगभग ख़ाली था। अम्मा ने कटोरी से आख़िरी आटा निकाला, पानी डालकर गूँधा और गिनकर चार लोइयाँ बनाईं।

“दो तेरी, दो मेरी,” उन्होंने गोलू से कहा, “और साथ में गुड़ की डली। आज इतने में ही काम चलाना पड़ेगा, लल्ला।”

गोलू ने मुँह बनाया। “अम्मा, सिर्फ़ दो? मुझे तो चार चाहिए। पेट में चूहे कूद रहे हैं।”

अम्मा हँस दीं। “चूहों से कह, कल गेहूँ आएगा। आज सब्र कर ले।”

पहली रोटी तवे पर फूली ही थी कि बाहर से किसी के खाँसने की आवाज़ आई। अम्मा ने सिर उठाकर देखा। सड़क पर एक आदमी खड़ा था। कंधे पर एक भारी थैला, पैरों में धूल से सनी चप्पलें, और चेहरे पर ऐसी थकान, जैसे वह सुबह से चल रहा हो।

“माँजी,” उसने झिझकते हुए कहा, “रामगढ़ यहाँ से कितनी दूर है?”

“अरे बेटा, अभी तो छह-सात कोस है,” अम्मा बोलीं। “इस धुंध में रात को कहाँ जाओगे? आओ, पहले आग ताप लो।”

आदमी पहले तो ठिठका, फिर धीरे से आँगन में आकर चूल्हे के पास बैठ गया। उसने अपने ठंडे हाथ आग की ओर बढ़ाए। तभी तवे से उठती रोटी की सोंधी ख़ुशबू उसकी नाक तक पहुँची, और उसकी आँखें एक पल को रोटी पर टिक गईं। फिर उसने झट से नज़रें फेर लीं, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो।

अम्मा ने वह नज़र देख ली थी। उम्र ने उन्हें बहुत कुछ पढ़ना सिखा दिया था, ख़ासकर भूख।

“कुछ खाया है सुबह से?” उन्होंने सीधे पूछ लिया।

“जी… बस चल रहा हूँ,” आदमी ने बात टाल दी। “बस ख़राब हो गई थी कस्बे के पास। सोचा पैदल ही निकल जाऊँ।”

गोलू ने अम्मा की ओर देखा, फिर गिनी-चुनी लोइयों की ओर। उसका दिल धक से रह गया। वह समझ गया था कि अब क्या होने वाला है।

अम्मा ने चुपचाप दूसरी रोटी तवे पर डाली, फिर तीसरी। जब चारों रोटियाँ सिक गईं, तो उन्होंने अपनी दोनों रोटियाँ एक थाली में रखीं, ऊपर गुड़ की डली और एक हरी मिर्च रखी, और थाली उस आदमी के आगे सरका दी।

“लो बेटा, खा लो। गरम है।”

“नहीं-नहीं माँजी, आप लोग…” आदमी हड़बड़ा गया।

“हम तो घर पर हैं,” अम्मा ने बात काटी, “तुम सड़क पर हो। सड़क वाले का हक़ पहले बनता है।”

गोलू से रहा नहीं गया। वह अम्मा के कान के पास फुसफुसाया, “अम्मा, फिर तुम क्या खाओगी?”

“मैं? मुझे आज भूख ही कहाँ है,” अम्मा ने आँख मारी। “बुढ़ापे में पेट भी छोटा हो जाता है।”

गोलू जानता था कि यह सच नहीं है। सुबह से अम्मा ने बस दो घूँट छाछ पी थी। वह कुछ देर अपनी थाली को घूरता रहा। फिर उसने एक लंबी साँस ली, अपनी एक रोटी के दो टुकड़े किए और आधी रोटी अम्मा की हथेली पर रख दी।

“तो मैं भी आज छोटा पेट वाला बन जाता हूँ,” उसने कहा।

अम्मा की आँखें भर आईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस गोलू के सिर पर हाथ फेर दिया।

वह आदमी यह सब देख रहा था। उसने रोटी का पहला कौर तोड़ा, और उसका गला जैसे भर आया। उसने धीरे-धीरे खाया, हर कौर को ऐसे, जैसे कोई क़ीमती चीज़ हो।

“माँजी,” खाते-खाते उसने पूछा, “आपने बिना जाने-पहचाने मुझे अपने हिस्से की रोटी क्यों दे दी?”

अम्मा ने चूल्हे में एक लकड़ी सरकाई। “बेटा, बहुत साल पहले जब गोलू के दादा जवान थे, एक बार वे भी परदेस में ऐसे ही भटक गए थे। किसी अनजान घर ने उन्हें खाना खिलाया था। वे कहते थे कि उस रोटी का कर्ज़ किसी एक को लौटाया नहीं जाता, आगे बढ़ाया जाता है।” वे मुस्कुराईं। “आज वह कर्ज़ थोड़ा-सा उतर गया।”

रात आदमी ने आँगन के कोने में बोरी बिछाकर काटी। सुबह जब गोलू की आँख खुली, तो वह जा चुका था। चूल्हे के पास एक कागज़ दबा था, जिस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था: “रोटी के लिए धन्यवाद। मैं याद रखूँगा।” साथ में एक पुरानी पेंसिल रखी थी, जो शायद उसके थैले से निकली थी।

गोलू ने वह पेंसिल अपने बस्ते में रख ली।

दिन बीते। जनवरी की ठंड ढली, फरवरी की धूप आई। एक सुबह गाँव के सरकारी स्कूल में हलचल मची। पता चला कि नए मास्टरजी आए हैं, क्योंकि पुराने मास्टरजी का तबादला हो गया था।

प्रार्थना के बाद जब नए मास्टरजी कक्षा में आए, तो गोलू की पेंसिल हाथ से छूटते-छूटते बची। वही चेहरा था। वही आदमी, जो उस धुंधली शाम अम्मा के चूल्हे के पास बैठा था। बस आज उसके कपड़े साफ़ थे और चेहरे पर थकान की जगह मुस्कान थी।

मास्टरजी ने हाज़िरी ली। “गोलू?”

“जी… हाज़िर,” गोलू ने धीरे से कहा।

मास्टरजी एक पल को रुके। उन्होंने चश्मा ठीक किया और गोलू को ग़ौर से देखा। फिर उनकी आँखों में पहचान चमक उठी।

छुट्टी के बाद वे गोलू के साथ झोपड़ी तक आए। अम्मा उन्हें देखकर पहले तो चौंकीं, फिर पहचानकर हँस पड़ीं। “अरे, तुम तो रामगढ़ जा रहे थे!”

“गया था, माँजी,” मास्टरजी बोले, “पर नौकरी यहीं लिखी थी। उस दिन मैं इसी स्कूल में अपनी नियुक्ति की चिट्ठी लेकर रामगढ़ के दफ़्तर जा रहा था। रास्ते भर डर लग रहा था कि अनजान गाँव में कैसे रहूँगा। उस रात आपकी रोटी ने बता दिया कि यह गाँव अनजान नहीं है।”

उस दिन के बाद मास्टरजी अक्सर शाम को अम्मा के आँगन में आ बैठते। कभी अपने साथ आटे का थैला ले आते, कभी सब्ज़ियाँ। अम्मा मना करतीं, तो वे हँसकर कहते, “माँजी, कर्ज़ आगे बढ़ाया जाता है न? तो मैं भी बढ़ा रहा हूँ।”

और गोलू? उसे पढ़ाई में जो मुश्किल आती, मास्टरजी शाम को चूल्हे की रोशनी में समझा देते। धीरे-धीरे वह कक्षा के सबसे अच्छे बच्चों में गिना जाने लगा।

एक दिन गोलू ने स्कूल से लौटते हुए देखा कि सड़क पर एक छोटा लड़का रो रहा है। उसका टिफ़िन गिरकर मिट्टी में बिखर गया था। गोलू ने बिना सोचे अपना टिफ़िन खोला, उसकी आधी रोटी उस लड़के को थमाई और कहा, “ले, खा ले। अम्मा कहती हैं, बाँटने से पेट छोटा नहीं होता, दिल बड़ा हो जाता है।”

घर पहुँचकर उसने अम्मा को यह बात बताई। अम्मा ने उसे गले से लगा लिया। चूल्हे की आग चटक रही थी, और उस छोटी-सी झोपड़ी में, उस दिन फिर से, सबसे गरम चीज़ आग नहीं थी।

सीख: दया करने के लिए भरा हुआ भंडार नहीं, बस बड़ा दिल चाहिए। जो रोटी हम किसी भूखे को देते हैं, वह किसी न किसी रूप में लौटकर हमारे ही आँगन को रोशन करती है।

दया और भलाई की ऐसी ही और कहानियाँ पढ़नी हों, तो ईमानदार लकड़हारा और सोने की कुल्हाड़ी ज़रूर पढ़िए। मुश्किल वक़्त में साथ निभाने पर दो दोस्त और जंगल का भालू भी आपको पसंद आएगी। ऐसी और कहानियाँ नैतिक कहानियाँ में मिलेंगी।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *