वर्ष 1521 में गर्मी के दिनों की शुरुआत थी | मक्का और बगदाद की अपनी यात्रा उरी कर गुरु नानक और उनके साथी मरदाना पेशावर और रावलपिंडी होते हुए अमीनाबाद पहुचे| इससे पहले कि वे अपने घर कि और बढते वहा बाबर कि सेना का हमला हो गया | जैसे कि उन दिनों प्राय: होता था,हमलावरों ने बहुत जोर-जुल्म किया और उनके लोगो को बंदी बना लिया | गुरु नानक और मरदाना भी केद कर लिए गए |
जब बाबर को पता चला कि एक बहुत पहुचे हुए संत को बंदी बना लिया गया है तो उसने तुरंत उनकी रिहाई का आदेश दिया | लेकिन गुरु नानक ने साफ साफ कह दिया कि जब तक अन्य केदियो को नहीं छोड़ा जाएगा तब तक वे भी कारावास से बाहर नहीं निकलेगे| नके इस निर्णय से चकित हो कर बाबर ने उनसे मिलने कि इच्छा जाहिर कि | गुरु नानक ने निर्भय हो कर धर्म का मर्म समझाया और कहा कि चुकी सभी इन्सान ईश्वर या खुदा कि ही संतान है अत: किसी पर अत्याचार मत करो | बाबर उनसे इतना प्रभावित हुआ कि उनसे तत्काल सभी केदियो को
रिहा कर दिया | हालाँकि इसके बाद भी गुरु नानक ने अमीनाबाद नहीं छोड़ा | वे वहा काफी समय तक उन लोगो के बीच रहे जिन्होंने हमले के दोरान बहुत दुःख-दर्द सहा था | वे उन्हें तरह तरह से सात्वना देते रहे और होसला बंधाते रहे |

