चिंपू और चींची

किसी जंगल में एक बहुत बड़ा पेड़ था | उस पेड़ पर एक बंदर रहता था | उसका नाम चिंपू था | वह हमेशा सबसे लड़ता और उनका नुकसान करता था | उसी पेड़ पर एक चिड़िया भी रहती थी | उसका नाम चींची था | वह एक समय मीठे मीठे गीत गाती थी | गरमी का मोसम चला गया और बरसात का मोसम आ गया | चींची ने बरसात आने से पहले ही अपना घोंसला बला लिया था |

आकाश में काले – काले बादल आकर गरजने लगे | मोर नाचने लगे | देखते – ही – देखते बरसात होने लगी | बारिश के जल से जंगल की मिटटी महक उठी | धीरे – धीरे बारिश और तेज हो गई | चींची अपने घोसले में दुबककर बेठ गई | चिंपू बेचारा पेड़ पर बेठा – बेठा भीगता रहा | चिंपू को भीगता देख चींची हसने लगी |

हँसते – हँसते उसने चिंपू से कहा – अरे, मामा जी | आपसे मेने पहले ही कहा था, अपने लिए घर बना लो, लेकिन मेरी बात नहीं सुनी | अब भीगते रहिए | भगवान ने आपको दो हाथ दिए है | मुझे देखो मेरे पास तो हाथ भी नहीं है | फिर भी मेने अपनी चोंच से यह घोंसला बनाया | चाहते तो आप भी अपने लिए एक घर बना सकते थे |

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मेरा प्यारा सपना

देखा मेने ये सपना कैसा?

यह तुमको बतलाती हु

सपनो की गजब दिनिया में

तुमको सेर कराती हु ||

 

कल रात देखा मधुर सपना मेने,

परियो के से परिधान पहने थे मेने,

था बच्चो का झुंड मेरे चारो और

नहीं थामे थमता था बच्चो का शोर||

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जाओ और आओ

 

एक गाँव में एक धनी किसान रहता था | उसके पास बहुत सी जमीन थी | उसके यहाँ बहुत –से आदमी काम करते थे | उस किसान के दो लडके थे |

जब दोनों लडके बड़े हो गये, तो किसान ने उन्हें आधी – आधी जमीन बाँट दी | साथ ही उसने काम करने वाले आदमी भी बराबर – बराबर संख्या में बाँट दिये |

बड़ा लड़का बहुत सुस्त और लालची था | वह कभी अपने खेतो को देखने तक नहीं जाता था | वह अपने आदमियों से कहा करता था  “जाओ, खेतो पर जाकर काम करो |”

उसके आदमी मनमाना काम करते थे | काम कम करते थे, बाते अधिक | वे चिलम पिटे हुए इघर उघर की गप्पे उड़ाया करते थे | न समय पर हल चलते थे | न बीच बोते थे | न ठीक वक्त पर खाद डालते थे, न सिंचाई करते थे | धीरे – धीरे उपज घटने लगी और बहुत कम हो गई | किसान का बड़ा लड़का गरीब हो गया |

उघर छोटा लड़का बहुत मेहनती था | वह सवेरा होते ही कंधे पर हल रखकर अपने आग्मियो को पुकारता था – “आओ, खेतो पर चलकर काम करे |”

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अपनी शक्ति को जानो

 

एक गीदड़ बहुत भूखा था कई दिन से ठीक भोजन न मिलने के कारण वह कमजोर हो गया था | इतनी ताकत भी न थी की स्वंय शिकार करके खा सके |

थोड़ी देर में उसने एक शेर को आते देखा | शेर ने एक भेंसे का शिकार किया था | वह खा पीकर अपनी गुफा की और लोट रहा था | गीदड़ भूख और कमजोरी के कारण शेर को देखकर कापंने लगा | जेसे ही शेर निकट आया, गीदड़ पेट के बल लेट गया |

शेर ने गीदड़ को इस तरह लेटा देखा तो उसे हंसी आई और दया भी | शेर ने पूछा -”तुझे क्या कष्ट है जो इस तरह पेट के सहारे लेटा है?”

“हजूर ! में कई दिन से भूखा हु | यदि आप आज्ञा दे तो में आपकी सेवा करना चाहता है |”

“ठीक है, चल चल मेरा साथ|” शेर के कहा |

गीदड़ शेर के साथ चल दिया | गुफा में जो कुछ मांस पड़ा था, उसे देकर शेर ने कहा – “आज इतने से ही काम चला | कल से तेरे हिस्से का भी लेकर आउगा |”

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शाही शिकार

एक बार गरीब गाँव वाले मिलकर बीरबल के पास गए | उन्होंने अपनी समस्या उसे बताई “ श्रीमान, हमारे गाँव को रेगिस्तान होने से बचाने के लिए कुछ कीजिए |

“मित्रो, तुम्हारे गाँव के साथ क्या गलत हो रहा है?” बीरबल ने पूछा |

श्रीमान| बादशाह अकबर अपने राज्य में अधिक – से – अधिक जगल चाहते है | उन्होंने अपने सेवको को आदेश दिया है की जितनी जमीन पर गाँव बसे हुए है, उतनी जमीन की जंगल में परिवर्तित कर दो | अधिक जंगलो का अर्थ है अधिक जानवर, जो रजा के शिकार के शोक को पूरा करेंगे |” एक बुजुर्ग ने बीरबल को बताया |

“मित्रो! तुम्हारी समस्या को सुलझाने का में अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न करुगा| आप लोग निशिन्चत होकर अपने घर जाइए|” बीरबल के कहा |

अगली बार जब बादशाह अकबर शिकार के लिए गए, तब बीरबल उनके साथ था | वे एक पेड़ के समीप से गुजरे, जहा कुछ उल्लू जोर जोर से आवाजे निकल रहे थे |

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व्यापार लोभ का

किसी जन्म में भगवान बुद्ध एक व्यापारी के घर पैदा हुए | वह व्यापारी नगर में फेरी लगाकर अपनी चीजे बेचता था | उसी नगर में सेरिव नाम का व्यापारी भी था | जब भगवान बुद्ध बड़े हुए तब उनके व्यापारी पिता ने सृवे के साथ उन्हें व्यापार के लिए भेजा |

सेरिव बहुत ही चतुर और कपटी व्यापारी था | बुद्ध जी अत्यंत दयालु और सरल ह्रदय थे | वे दोनों एक नगर  में पहुचे | उस नगर में एक सेठ था | उसके परिवार में केवल उसकी बीवी इर बेटी थी | उनके पास धन-दोलत न थी | घर में जो कुछ सामान था उसे भी धीरे – धीरे बेचकर अपना गुजारा कर रही थी |

सेरिव और बुद्ध उस नगर में फेरी लगाने लगे | उस सेठ परिवार के घर के समाने से पहले सेरिव गुजरा | वह आवाज दे रहा था –“ मनके – मोती की माला ले लो“ |

सेठ की बेटी ने माँ से कहा – “अगर तुम कहो तो इस फेरीवाले से एक मोती माला ले लू|”

“माँ, तुम्हे यद् है, हमारे पास पीतल की एक पुरानी थाली पड़ी है| उसे  ही बेचकर माला ले लू?”

माँ ने सोचा – “चलो बेटी की इतनी सी इच्छा तो पूरी कर ही सकती हु | इसलिए उसने उसकी बात मान ली |”

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ध्यान मग्न तोता

एक सुबह अकबर का एक सेवक बीरबल के घर पहुंचा | वह दुखी और प्रेशान था |

“क्या बात है अली |” बीरबल ने पुछा |

“श्रीमान मेरा जीवन खतरे में है | केवल आप ही मुझे खतरे से बाहर निकाल सकते है |” अली ने जवाब दिया |

“में अपनी तरह से पूरा प्रयास करुगा परन्तु पहले यह तो बताओ की बात क्या है?” बीरबल ने खा |

अली ने बताया, “श्रीमान, कुछ महीने पहले एक फकीर ने महाराज को एक तोता दिया था | महाराज ने वह तोतो मुझे दिया और उसकी अच्छी तरह से देखभाल करने को का निदेश दिया और साथ ही उन्होंने या निर्देश भी दिया की यदि कोई भी व्यक्ति इसकी मुर्त्यु की सुचना उनके पास ले जायगा तो उसे मुत्यु दंड दिया जायगा | श्रीमान अच्छी से अच्छी देखभाल करने और विशेष ध्यान रखने के बावजूद भी आज सुभ मेने उसे पिंजरे में मर हुआ पाया | अब मुझे अपने जीवन का भय हो रहा है |”

बस इतनी सी बात है| घबराओ नहीं | तुम अपने घर जाओ और सब कुछ मुझ पैर छोड दो | यह सुचना महाराज तक में पहुचा दुगा |” बीरबल ने अली से कहा |

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होगा परिवर्तन एक दिन

आज नहीं तो कल

होगा परिवर्तन

चंहु और फेले होगे पुष्प

और मंद – मंद पुष्पों की खुशबु

उमड रहे होगे भवरे

तितलिय भी होगी

और होगी चिड़िया की चु – चु

चंहु और फेली होगी

रंगो की बोछार

आज नहीं तो कल

होगा परिवर्तन

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बोल का मोल

एक आदमी बूढा हो चला था | उसके चार बेटे थे | बेटे यो तो सभी कम जानते थे | किन्तु बोलचाल और आचरण में चारो एक जैसे न थे | पिता ने कई बार उनसे कहा – “यदि तुमने अपनी बोलचाल और आचरण नहीं सुधारा तो जीवन में कभी सफल नहीं हो सकते |” किन्तु पिता की बात को कोरा उपदेश समझकर बेटो ने कभी ध्यान नहीं दिया |

एक बार को बात है | चारो बेटे और पिता लंबी यात्रा पैर जा रहे थे | इस यात्रा के बिच उनके पास खाने  पिने को कुछ भी न बचा था | जो धन था वह भी ख़त्म हो चूका था | वे लोग कई दिन से भूखे थे | बस यही चाहते थे की किसी तरज ज़ल्दी से ज़ल्दी अपने घर पहुच जाये|

पांचो एक जगह सडक के किनारे विश्राम कर रहे थे | तभी एक व्यापारी अपनी बेलगाडी को हांकता हुआ निकला | वह व्यापारी किसी मेले में जा रहा था | उसने बेलगाडी में तरह-तरह के पकवान और मिठाई भर रखी थी वह उन्हें बेचने के लिए जा रहा था |

पकवाने और मिठाईयो की महक से पांचो में मुंह में पानी आने लगा | बूढे ने कहा – “जाओ व्यापारी से मागो | शायद कुछ खाने को दे दे |”

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मनुष्य की इच्छाएँ

मनुष्य की इच्छाएँ कभी खतम  नही होती | मानव की इछाये कुछ देर के लिये तो सुख देती पर मन की शांती नही दे सकती | मन एक प्रकार का रथ है जिसमे कामन, करोध, लोभ, मोह, अंहकर, ओर घृणा नाम के साथ अश्व जुटे है | कामना इन सब से प्रमुख है |

मन के तीन विकार होते है:- तामसिक, राजसिक व् सात्विक | तामसिक मन हमेशा दुसरो को नुकसान पहुचाने में आनंद प्राप्त करता है और राजसिक मन अहंकार व् शासन की बात सोचता है और सात्विक हमेशा प्रेम और शांति ही चाहता है| विवेक से ही मन को शांत और काबू में किया जा सकता है | मनुष्य के भीतर कामना, मोह, व् अंहकार जेसी जो व्रतिया है उनके सकारात्मक रूप भी है | माता पिता अपने बच्चो को कभी दुख नहीं दे सकते इसलिए कामना करते है की उनके बच्चे हमेशा सुखी रहे | मन का प्रेम ही उन्हें सन्तान के लिए बलिदान करने को भी तत्पर करता है | उनका इसमें कोई स्वार्थ नहीं होता है बस होती है तो कामना और आशीर्वाद | इसी तरह मोह का भी उदारण भी है | जब कोई युवक किसी युवती के प्रति आकर्षित होता है तो वह उसके अवगुण नहीं देखता और उसकी तरह खिंचा चला जाता है | पहले तो येन केन प्रकारेण वह उसे पाना चाहता है और पा लिया तो खोना नहीं चाहता है | उसका अंह जब जगता है तो वह खुद को उसकी नजरो में उठाने के लिए तरह-तरह से हाथ पैर मरता है | इस तरह वह अपने प्यार को पाने में सफल होता है |

नकारात्मक रूप में अंह मानव का दुश्मन भी है क्योकि यह दुसरो से बेमतलब मुकाबला करवाता है | इससे ग्रस्त व्यक्ति तरह-तरह की इच्छाएँ पलता है  और जब उससे नहीं मिलती तो बेमतलब दुखी भी हो जाता है | परन्तु अगर अंह सकारत्मक हो तो मानव का जीवन आनंद मय हो जाता है | मन को किस दिशा में ले जाना है वो इन्सान के हाथो में होता है | चाहे तो अच्छी जगह पर लगा दे या बुरी जगह पर | संतो ने कहा है: कामनाओ का अंत विनाश है | तो सवाल उठता है की क्या इनका त्याग कर देना चाहिए? क्या इन्सान को बड़ा बनने का सपना नहीं देखना चाहिए?

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