वीर बालक

सर्दियों के दिन थे | सवेरे का समय था | उस दिन राम अकेला ही अपने स्कूल जा रहा था | उसके स्कूल के रास्ते में रेल की पटरी पड़ती थी | उस दिन उसने देखा की एक जगह से रेल की पटरी उखड़ी हुई थी |

बालक तुरंत समझ गया की यह एक बहुत बड़ी बात है जिसका भयंकर परिणाम हो सकता है | वह सोचने लगा, “अभी गाड़ी आएगी | वह यहाँ पर गिर जाएगी |

और उसी समय दूर से गाड़ी के इंजन की चीख सुनाई दी | फिर गाड़ी की धडधड की आवाज सनाई दी | बालक सुनते ही काप उठा | वह सोचने लगा की क्या करे? उसने ठान लिया था की वह उन सभी लोगो की जान बचाएगा जो उस गाड़ी में बैठे है |

अब गाड़ी और पास आ गई थी | राम तभी दोनों पटरियों के बीच में खड़ा हो गया | उसने अपनी जान की परवाह नहीं की | उसने तुरंत अपनी सफेद कमीज उतारी और जोर जोर से हिलाने लगा |

ड्राईवर की नजर उस बालक पर पड़ी | उसने झट से ब्रेक लगा दी | और इंजन थोरी सी ही पहले आ कर रुक गया | ड्राईवर ने गुस्से से उसे पूछा – “ओये लडके ये क्या कर रहा है मरना है क्या?”

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एक पत्र देशवासियों के नाम

16 सितंबर, 1927

फेजाबाद जेल

मेरे प्यारे देशवासियों,

भारत माता को आजाद करवाने के लिए रंगमंच पर हम सभी भूमिका अदा कर चुके है | गलत किया या सही, हमने जो भी किया, स्वंतत्रता पाने की भावना से प्रेरित होकर किया | हमारे अपने निंदा करे या प्रंशसा, लेकिन हमारे दुश्मनों तक को हमारी हिम्मत और वीरता की प्रंशसा करनी पड़ी है | कुछ लोग कहते है की हमने गुलामी को न सहा और देश में आंतकवाद फेलाना चाहा पर यह सब गलत है | हमारे कितने ही साथी आज भी आजाद है , फिर भी हमारे किसी साथी ने कभी भी किसी की नुकसान पहुचाने वाले तक पर गोली नहीं चलाई | यह हमारा उद्देश्य नहीं था | हम तो आजादी हासिल करने के लिए देशभर में क्रांति चाहते थे |

सरकार भी अंग्रेजो की और जज भी अंग्रेजो के, फिर हमे न्याय की मांग किससे करे | जजों ने हमे निदर्यी, बर्बर, मानवता पर कलंक आदि विशेषणों से पुकारा है | हमारे शासको की कोम के जनरल डायर ने निहत्थो पर गोलिया चलवाई | बच्चो, बुढो, स्त्री , पुरषों – सब पर दनादन गोलिया दागी गई | तब इंसाफ के इन ठेकेदारों ने अपने भाई-बंधुओ को किन विशेषणों से संबोधित किया था | फिर हमारे साथ ही यह सलूक क्यों?

हिंदुस्तानी भाइयो | आप चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय के मानने वाले हो, देश के काम में साथ रहो | आपस में व्यर्थ न लड़ो | रास्ते चाहे अलग हो, लेकिन उद्देश्य तो सबका एक है | सभी कार्य एक ही उद्देश्य की पूर्ति के साधन है | एक होकर देश की नोकरशाही का मुकाबला करो | अपने देश को आजाद कराओ |

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अकबर का आधा भाई

बाल्य अवस्था में अकबर की देखभाल एक दाई करती थी | वह उन्हें अपना दूध भी पिलाती थी | एक महान राजा बन जाने के बावजूद भी वह अपने आया की, जिसे वो दाई माँ कहते थे, बहुत सम्मान करते थे | दाई माँ का भी एक पुत्र था | बादशाह अकबर उसे अपने भाई के समान समझते थे | जब उनका यह आधा भाई उनसे मिलने आता, बादशाह उसका बड़ा आदर-सत्कार करते थे | कभी-कभी उसकी आवभगत में बादशाह अकबर इतने व्यस्त हो जाते थे की वह दरबार भी नहीं जाते थे | उनकी यह आदत दरबारियों तथा बीरबल को पसंद नहीं थी क्योकि इस तरह बादशाह का दरबार में उपसिथत न होना उन्हें हितकर नहीं लगता था |

राज-काज संबंधी कई विषयों पर विचार-विमर्श करना होता था | देश-विदेश से आने वाले अतिथियों से भी बातचीत करनी होती थी | जब बादशाह दरबार में आयगे ही नहीं तो काम कैसे चलेगा | इस सब बातो को सोचकर दरबरीगण बहुत चन्तित थे | इसलिए उनका हालचाल लेने कुछ दरबारियों के साथ बीरबल उनके महल में गए |

बादशाह ने बीरबल से पूछा –“मेरे प्यारे आधे भाई के समान तुम्हारा भी कोई आधा भाई है?”

बीरबल ने कहा – “जी, महाराज! मेरा भी एक आधा भाई है |”

“अच्छा, तुम उसे कभी दरबार में क्यों नहीं लाए?” हम भी तुम्हारे भाई से मिलना चाहेगे|” बादशाह ने इच्छा व्यक्त की |

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रमेश की कहानी मेरी जुबानी

आज की कहानी एक सच्ची कहानी है | रमेश जो बहुत ही मेहनती लड़का है | और उसके भी वही सपने है जो हर इन्सान के और हर नोजवान के सपने होते है | एक अच्छी सी नौकरी, घर और अपने परिवार वालो को हर ख़ुशी देना | पर जैसा की आप सभी लोग जानते है, ये सब सिर्फ सपने ही होते है और वो भी उन लोगो के लिए जिनके पीछे कोई नहीं होता है | रमेश के भी पीछे कोई नहीं था, वो पिछले ही साल अपने पिता को खो चूका है और बड़े भाई की भी नौकरी का कुछ पता नहीं है | बस भगवान की कृपा से उनका घर चल रहा है | एक और है जिसको वो अपने पिता समान और पिता से भी बड कर मानता था पर पता नहीं वो भी नराज है रमेश से |

मानो ज़िन्दगी जैसे रुक सी गई हो | अरमान बहुत थे करने को पर कोई रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं  था | रमेश वैसे तो सुलझा हुआ इन्सान है पर ज़िन्दगी के इस दोर में पता नहीं क्या हुआ उसे, मानो वो गुम सा गया हो अपने में | पिता के जाने के बाद वो बिल्कुल चुप हो गया था शायद अब उसे ज़िन्दगी का समना करना था या कुछ और | रमेश अक्सर मुझसे कहा करता था की कुशनसीब होते है वो लोग जिनके पास उनके पिता होते है जो उन्हें ज़िन्दगी का सामना करना सिखाते है | रमेशा का भी सही वक़्त था पर अब उसके साथ उसके पिता न थे | अब वो बिल्कुल अकेला जिसको घर भी चलाना था और कुछ करना भी था ज़िन्दगी में | रमेश को अब पता चल गया था की ज़िन्दगी जीना इतना आसन नहीं है जितना उसे लगता था |

आज रमेश बहुत उदास, गुमसुम सा था और बहुत ही चिंता में था मेरे पूछने पर भी उसने मुझे नहीं बताया, पर में समझा गया था उसकी खामोशी को देख कर की आज फिर से उसके मालिक ने सुनाया है और डराया होगा नौकरी के लिए | उसे चिंता थी तो अपनी नौकरी की क्योकि उसका मालिक उसे पिछले एक महीने से कभी कुछ सुना रहा था | रमेश अपनी नौकरी छोड़ना तो चाहता था पर उसे घर की भी चिंता थी की कही उसने नौकरी छोड़ दी तो घर कैसे चलेगा | आज कुछ समझ नहीं आ रहा की क्या करे वो, एक तरफ घर की चिंता है और दूसरी तरफ नौकरी की | और इस उलझन से बहार निकालने वाला भी कोई नहीं है उसे, आज वो अंधरे में बैठा, मायूस सा अकेला बैठा था | वह यह बात अपनी बीवी को भी नहीं बता सकता था क्योकि वह अपनी चिन्ताओ को किसी और को नहीं देना चाहता था वो बस अपने मन ही मन में रख रहा था और अपने आप से ही बात कर रहा था |

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श्रम ही पूण्य

एक सेठजी थे | जितना कमाते थे, उससे ज्यादा दान देते थे | इसलिए उन्हें लोग “दानी सेठ“ कहने लगे  थे | दानी सेठ दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लोटा था |

किन्तु समय बदला | दानी सेठ को अपने व्यापार में भारी घाटा हुआ | धीरे – धीरे सारा व्यापार चोपट हो गया | दानी सेठ की साडी संपति बिक गई | दानी सेठ अपनी लाज छिपाने के लिए नगर छोडकर चल दिए |

एक नगर में आकर दानी सेठ मजदूरी करने लगे | वह बहुत ही मुश्किल से अपना और अपना परिवार का पेट भर पाता था |

एक दिन पत्नी ने कहा – “इस नगर का नगर सेठ तो आपका परिचित है | उसने आपसे लाखो रुपए कमाए है | क्या वह मुसीबत के इन दिनों में हमारी मदद नहीं करेगा? आप उसके पास जाकर तो देखिए?

पर पता नहीं क्यों सेठ नगर के पास जाने से संकोच कर रहा था इस हालत में भी वे दान देने से पीछे नहीं हटते थे | अभी भी जो कुछ होता वो जरूरत मंद को दे देते चाहे वो भूखे ही क्यों न रहे |

और एक दिन सेठ सेठानी के कहने पर नगर चले गए | उस नगर के लोगो ने सेठ को तुरंत पहचान लिया और उन्हें बड़े आदर सहित बैठाया और उनकी पूरी कहानी सुनी |

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पालतू कुता

एक व्यक्ति के पास एक समझदार तथा वफादार कुता था | वह उस कुते को बहुत प्यार करता था | वह दिन रात मुस्तेदी से अपने मालिक के कारखाने की देखभाल किया करता था |

एक दिन सड़क पार करते हुए वह तेजी से जाती हुई कर के नीचे आ गया | उसकी दोनों पिछली टागे बुरी तरह जख्मी हो गई | डॉक्टरों ने उसका बहुत इलाज किया परन्तु वे उसकी टागों को ठीक नहीं कर पाए | अब बाकि की जिन्दगी उसे घसीटते हुए कटनी थी क्योकि अब वह कारखाने की ठीक ढंग से देखभाल करने में असमर्थ था |

कुछ दिनों बाद, एक दिन उसे कारखाने के अहाते में उगे अदरक की महक आई | अदरक उजाड़ स्थान पर लगा था जहा कोई नहीं जाता था किसी तरह वो कुता वहा गया और अपने पंजो से जमीन कुरेदने लगा |

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कथनी और करनी

एक गरीब बुढा था | उसके कोई सन्तान नहीं थी | बुढ़ापे में उसकी देखभाल करती | अत: उसे स्वंय मेहनत – मजदूरी करके अपना पेट पालना पड़ता था |इसलिए वह रोज जंगल से लकडिया काटकर लाता तथा उन्हें शहर में बेचता था |

अक्सर परेशानी में वह बुढा एक ही बात कहता, “इससे तो अच्छा है की यमराज मुझे उठा ले |” एक दिन बुढा बीमार पड़ गया | परन्तु लकडिया काटने के किए जैसे-तेसे लकडिया काटकर उनका गट्ठर बनाया और उसे उठाकर गाँव की तरफ चल दिया और जल्दी ही वह थक गया | उसने लकडियो का गट्ठर जमीन पर पटकते हुए कहा, “ इससे तो अच्छा हो यमराज उठा ही ले मुझे |”

ठीक उसी समय यमराज वंहा से गुजरे | बूढ़े के दर्द भरे शब्द सुनकर उन्हें दया आ गई | उन्होंने सोचा क्यों न इस बूढ़े को अपने साथ ले ही जाऊ | इसे इसके दर्दो से भी मुक्ति मिल जायगी | यमराज बूढ़े के समक्ष प्रकट हुए और साथ चलने को कहा | बुढा अपनी बात से तुरंत मुकर गया और कहने लगा  “मेने तो गट्ठर उठाने के लिए मदद मांगी थी |”

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क्या बदल रहा है देश

सब कहते है देश बदल रहा है जाग रहा है देश

सब कहते है देश बदल रहा है जाग रहा है देश

पर कोई तो बताए कहा बदल रहा है देश

कल भी अत्याचारी थे आज भी है और कल भी होगे

पहले भी बलत्कार होते थे, आज भी होते है और कल का पता नहीं

तो कहा बदल रहा है देश

और कोन बदलेगा ये देश,

आप, में, या फिर वही नेता लोग जो

पहले भी लुटते थे, आज भी और कल भी लुटेगे

तो कहा बदल रहा है देश ||

 

बड़ा अजब है ये देश,

एक लडकी के साथ बलत्कार होता है और लोग तमाशा देखते है उस समय,

एक लडकी के साथ बलत्कार होता है और लोग तमाशा देखते है उस समय,

और अगले ही दिन प्रदशन करते है,

और फिर वही लोग उसी रात किसी और के साथ करते है बलत्कार

और फिर कहते है देश जाग रहा है, बदल रहा है देश ||

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पछतावे के आँसू

संजय बहुत अच्छा बच्चा था पर उसको चोरी करने की बहुत बुरी आदत थी अध्यापक महोदय उसे कई बार दंड भी दे चुके थे और कई बार धमकी भी दे चुके थे | परंतु फिर भी वो बच्चो के बस्तों से उनकी चीजे खो जाती थी | सभी का शक संजय पर ही था की उनके बस्तों से वही चीजे चुराता है | और एक दिन आखिर एक दिन अध्यापक ने संजय को तेज आवाज में डांटते हुए कहा, यदि अब किसी भी बच्चे का सामान चोरी हुआ, तो तुम्हे में पाठशाला से निकाल दुगा |

इस बात को कुछ दिन बीत गए और एक दिन एक बच्चा अचानक रोने लगा | अध्यापक के पूछने पर उसने बताया की उसकी गणित की किताब खो गई है | यह सुन अध्यापक महोदय बहुत नराज हुए और उन्होंने उस बच्चे को सबके बसते में अपनी किताब ढूंढने को कहा | सभी के बस्तों में देखने के बाद आखिर किताब पंकज के बसते में से मिली | यह देख कर अध्यापक को बहुत आश्चर्य हुआ की पंकज जैसा ईमानदार और मेहनती बालक भी चोरी क्र सकता है | पूरी कक्षा में सन्नाटा सा छा गया हो, सब एकदम चुप होकर इधर-उधर देखने लगे, क्योकि किसी को भी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था की पंकज जैसा बच्चा ऐसा कर सकता है | इसलिए अध्यापक ने भी उसे कुछ नहीं कहा सिर्फ आगे से ऐसा न करने को कहकर बेठा दिया |

कुछ देर बाद अध्यापक के बाहर जाते ही संजय ने पंकज से पूछने लगा –“अरे | किताब तो मेने चुराई थी, लेकिन वह तुम्हारे बस्ते में कैसे चली गई?”

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भगवान सबको देखता है |

एक किसान था | उसका एक बेटा था रामू | एक दिन को बात है, किसान अपने खेत में काम कर रहा था | रामू भी वही था | पड़ोंसी के खेत में गाजर उगी हुई थी | रामू ने वहा जाकर एक गाजर खींचकर निकल ली | गाजर खींचते देख किसान अपने बेटे से बोला – “बेटा | वह खेत दुसरे किसान का है | तुमने उसके खेत से गाजर क्यों निकाली ??

रामू बोला – “में जानता हु, यह हमारा नहीं है | यह खेत राधे काका का है, परंतु काका इस समय नहीं नहीं |” बेटे की बात सुन किसान बोला – “बेटा, राधे ने तुम्हे नहीं देखा, परंतु भगवान तो देख रहा है | वह सबको देखता है |” रामू को अपने पिता की कही बात समझ आ गई |

एक बार की बात है, बरसात नहीं हुई | बरसात न होने से सभी किसानो के खेत सुख गए | खाने के लिए भी किसी के घर में अनाज नहीं था | सभी किसान बहुत परेशान थे |

भूख से बेचेन ही रामू को पिता सोचने लगा – “क्या करू? अनाज कंहा से लाऊ?” गाँव में केवल पड़ोसी राधे के खलियान में ही अनाज था | पिछले साल उसके खेत में गेहू की खूब पैदावार हुई थी | रामू के पिता ने राधे के खलियान से अनाज चोरी करने जी योजना बनाई |

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