वाराणसी में एक सेठ था | एक दिन वह दुकान कि और जा रहा था | रास्ते में एक मरा हुआ चूहा पड़ा था | उसे देखकर वह एक क्षण के लिए रुक गया | वह उस चूहे को देखते हुए कुछ सोचने लगा |
नगर सेठ, क्या सोच रहे हो?” किसीने पूछा |
यही सोच रहा हू कि यदि कोई समझदारी से काम करे तो इस चूहे को बेचकर भी लखपती बन सकता हे|
नगर सेठ की बात एक गरीब बनिये ने सुन ली | नगर सेठ के जाते ही उसने वह चूहा उठा लिया और बाजार में घूमने लगा | तभी एक महाजन ने अपनी बिल्ली के भोजन के लिए वह चूहा खरीद लिया |
बनिये ने उन पैसो से थोडा गुड और घडा खरीदा | घड़े में पानी भरकर वह एक मार्ग पैर बेठ गया | जंगल से लोटनेवाले लकडहारे और माली उसी मार्ग से आते थे | थके हुए लकडहारे तथा माली गुड खाकर और पानी पीकर बहुँत प्रसन्न हुए | उन्होंने उसे बदले में लकडिया और फूल दिए | बनिये ने लकडिया और फूल बेचकर फिर पैसे कमाए |
उसी मार्ग पर प्रत्येक दिन नियमित रूप से जा बेठता | कुछ दिनों बाद उसने घास काटनेवालो को भी पानी पिलाना शुरु कर दिया | बदले में वह उनसे घास का एक – एक पूरा लेने लगा |

