बुरी संगती से छुटकारा

श्याम दास का एक ही पुत्र था | उसका नाम रवि था | श्याम दास अपने बेटे को बहुत करता था | वह उसे हर अच्छी से अच्छी जीजे ला कर देते | हर वो जीज ला कर देता जो उसे चाहिए होती | उसकी हर मांग पूरी करता था |

सिर्फ वो ही नहीं बल्कि रवि की माँ भी उसे बहुत प्यार करती थी | वह उसे माखन, मलाई खिलाकर खुश करती थी | परन्तु रवि को इस सब की कदर नहीं थी क्योकि वो बुरी संगत में पड़ गया था | जुआ खेलना, दोस्तों के साथ बजारों में घूम न और बाहर का खाना पीना |

रवि के माता-पिता ने बहुत समझाया | परन्तु रवि पर कुछ असर न हुआ | तब उसके पिता ने उसे समझाने का एक उपाय सोचा |

एक दिन रामदास ने रवि को पांच रूपये का नोट दिया और कहा – “बेटा, बाजार से पांच रूपये के सेब मोल ले आओ |”

रवि बाजार जाकर पांच रूपये में सात सेब खरीद लाया | सेब ताजा और अच्छे थे | तब पिता ने पचास पैसे और देकर कहा – “जाओ बाजार से एक सडा – गला सेब खरीद लाओ |”

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कठिन प्रशन

बादशाह अकबर के शाही दरबार की कार्यवाही स्थगित हो गई थी | सभी दरबारी और महाराज जाने ही वाले थे की तभी एक सुरक्षाकर्मी भागता हुआ आया और बोला, “महाराज, दक्षिण भारत से एक विद्वान पंडित अभी अभी पधारे है वह आपसे ओर बीरबल से तुरंत मिलने के उत्सुक है | वह इसी उदेश्य से आगरा आये है |

“इस प्रकार उन्हें प्रतीक्षा कराना उचित नहीं है, उन्हें तुरंत शाही दरबार में लाया जाये |” बादशाह ने आदेश दिया |

जैसा ही सुरक्षाकर्मी पंडित को लेने के लिए चला गया तो बादशाह बोले, “बीरबल, अब बहुत देर हो चुकी है और में बहुत थक गया हु | तुम ही विद्वान पंडित से मिल लो और पता करो की वह कहना क्या चाहते है ?” बीरबल ने सर हिलाकर हामी भर दी |

पंडित के आने पर दोनों ने एक दुसरे को अभिवादन किया | उन्होंने बीरबल से कहा, “बीरबल मेने तुम्हारी बुदिमता के विषय में बहुत कुछ सुना है | में तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता हु |,” मुझे बताओ , क्या में तुमसे सो सरल प्रशन पूछु या फिर एक कठिन प्रशन?”

बीरबल ने सोचा, “महाराज थक चुके है और विश्राम के लिए जा चुके है| सो प्रशनो का जवाब देने का समय नही है|” इसलिए बीरबल ने कहा, “पंडित जी, आप सिर्फ एक कठिन प्रशन पूछिए |”

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वीर बालक

सर्दियों के दिन थे | सवेरे का समय था | उस दिन राम अकेला ही अपने स्कूल जा रहा था | उसके स्कूल के रास्ते में रेल की पटरी पड़ती थी | उस दिन उसने देखा की एक जगह से रेल की पटरी उखड़ी हुई थी |

बालक तुरंत समझ गया की यह एक बहुत बड़ी बात है जिसका भयंकर परिणाम हो सकता है | वह सोचने लगा, “अभी गाड़ी आएगी | वह यहाँ पर गिर जाएगी |

और उसी समय दूर से गाड़ी के इंजन की चीख सुनाई दी | फिर गाड़ी की धडधड की आवाज सनाई दी | बालक सुनते ही काप उठा | वह सोचने लगा की क्या करे? उसने ठान लिया था की वह उन सभी लोगो की जान बचाएगा जो उस गाड़ी में बैठे है |

अब गाड़ी और पास आ गई थी | राम तभी दोनों पटरियों के बीच में खड़ा हो गया | उसने अपनी जान की परवाह नहीं की | उसने तुरंत अपनी सफेद कमीज उतारी और जोर जोर से हिलाने लगा |

ड्राईवर की नजर उस बालक पर पड़ी | उसने झट से ब्रेक लगा दी | और इंजन थोरी सी ही पहले आ कर रुक गया | ड्राईवर ने गुस्से से उसे पूछा – “ओये लडके ये क्या कर रहा है मरना है क्या?”

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पांड्वो की गेंद

जैसा की हम सभी जानते है की पांडव पांच भाई थे | एक दिन पांचो भाई मैदान में गेंद खेल रहे थे | अचानक गेंद उछली और पास के एक कुए में जा गिरी | खेल बंद हो गया |

अभी वे बच्चे ही तो थे इसलिए वो सभी बहुत दुखी हुए | वे सोचने लगे की अब गेंद को कुए से बाहर कैसे आएगी |

पांचो पांडव कुए में झाकने लगे | गेंद पानी के ऊपर तेर रही थी परन्तु कुआ बहुत गहरा था उसमे उतरने का साहस किसी में न था | इतने में वहा से एक ऋषि जा रहे थे | बालको को उदास देखकर उनसे उनकी उदासी का कारण पूछने लगे |

तभी उनमे से एक भाई ने कहा – मुनिवर, हम लोग यहाँ पर गेंद खेल रहे थे और फिर गेंद कुए में जा गिरी | परन्तु हम उसे निकल नहीं पा रहे है | इसलिए हम सभी लोग बहुत उदास है |

ऋषि ने बोले बस इतनी सी बात – “लो में अभी तुम्हरी गेंद निकाल देता हु |”

इतना कहा कर ऋषि ने अपना धनुष निकला और बाण चढाया और कुए में छोड़ दिया | और वह बाण गेंद में लग गया और फिर ऋषि ने दूसरा बाण और फिर तीसरा बाण और फिर बाण पर बाण छोड़े |अंत में ऋषि ने ऊपर वाले बाण को पकडकर ऊपर खिंचा और गेंद को कुए के बाहर निकला |

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एक पत्र देशवासियों के नाम

16 सितंबर, 1927

फेजाबाद जेल

मेरे प्यारे देशवासियों,

भारत माता को आजाद करवाने के लिए रंगमंच पर हम सभी भूमिका अदा कर चुके है | गलत किया या सही, हमने जो भी किया, स्वंतत्रता पाने की भावना से प्रेरित होकर किया | हमारे अपने निंदा करे या प्रंशसा, लेकिन हमारे दुश्मनों तक को हमारी हिम्मत और वीरता की प्रंशसा करनी पड़ी है | कुछ लोग कहते है की हमने गुलामी को न सहा और देश में आंतकवाद फेलाना चाहा पर यह सब गलत है | हमारे कितने ही साथी आज भी आजाद है , फिर भी हमारे किसी साथी ने कभी भी किसी की नुकसान पहुचाने वाले तक पर गोली नहीं चलाई | यह हमारा उद्देश्य नहीं था | हम तो आजादी हासिल करने के लिए देशभर में क्रांति चाहते थे |

सरकार भी अंग्रेजो की और जज भी अंग्रेजो के, फिर हमे न्याय की मांग किससे करे | जजों ने हमे निदर्यी, बर्बर, मानवता पर कलंक आदि विशेषणों से पुकारा है | हमारे शासको की कोम के जनरल डायर ने निहत्थो पर गोलिया चलवाई | बच्चो, बुढो, स्त्री , पुरषों – सब पर दनादन गोलिया दागी गई | तब इंसाफ के इन ठेकेदारों ने अपने भाई-बंधुओ को किन विशेषणों से संबोधित किया था | फिर हमारे साथ ही यह सलूक क्यों?

हिंदुस्तानी भाइयो | आप चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय के मानने वाले हो, देश के काम में साथ रहो | आपस में व्यर्थ न लड़ो | रास्ते चाहे अलग हो, लेकिन उद्देश्य तो सबका एक है | सभी कार्य एक ही उद्देश्य की पूर्ति के साधन है | एक होकर देश की नोकरशाही का मुकाबला करो | अपने देश को आजाद कराओ |

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समय की कीमत

अभी समय है, अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है

देखो अभीसुयोग तुम्हारे पास खड़ा है

करना है जो काम उसी ने अपना चित्त लगा दो

अपने पर विश्वास करो, और संदेह भगा दो |

 

पूर्ण तुम्हारा मनोमिष्ट क्या कभी न होगा?

होगा तो बस अभी, नहीं तो कभी न होगा,

देख रहे हो श्रेष्ट समय के क्किस सपने को

छलते हो यो हाय ! स्वयं ही क्यों अपने को|

 

तुच्छ कभी तुम न समझो एक पल को भी

पल – पल से ही बना हुआ जीवन को मानो तुम

इसके सद्व्यय रूप नीर सिंचन के द्ववारा

हो सकता है सफल जन्मतरु यहाँ तुम्हारा|

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बरसात की आती लहराती हवा

बरसात की आती लहराती हवा

वर्षा धुले आकाश से

या चन्द्रमा के पास से

या बादलो की साँस से

मंद मदमाती ये हवा

बरसात की आती लहराती हवा

 

यह खेलती है ढाल से

ऊँचे शिखर के भाल से

पाताल से लेकर आकाश तक

यह खेलती हर जगह

बरसात की आती लहराती हवा

 

यह खेलती बूढ़े, बच्चो के साथ

यह खेलती प्रेमियों के साथ

यह खेलती हरी लता के साथ

अठखेलती इठलाती लहराती हवा

बरसात की आती लहराती हवा

 

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अकबर का आधा भाई

बाल्य अवस्था में अकबर की देखभाल एक दाई करती थी | वह उन्हें अपना दूध भी पिलाती थी | एक महान राजा बन जाने के बावजूद भी वह अपने आया की, जिसे वो दाई माँ कहते थे, बहुत सम्मान करते थे | दाई माँ का भी एक पुत्र था | बादशाह अकबर उसे अपने भाई के समान समझते थे | जब उनका यह आधा भाई उनसे मिलने आता, बादशाह उसका बड़ा आदर-सत्कार करते थे | कभी-कभी उसकी आवभगत में बादशाह अकबर इतने व्यस्त हो जाते थे की वह दरबार भी नहीं जाते थे | उनकी यह आदत दरबारियों तथा बीरबल को पसंद नहीं थी क्योकि इस तरह बादशाह का दरबार में उपसिथत न होना उन्हें हितकर नहीं लगता था |

राज-काज संबंधी कई विषयों पर विचार-विमर्श करना होता था | देश-विदेश से आने वाले अतिथियों से भी बातचीत करनी होती थी | जब बादशाह दरबार में आयगे ही नहीं तो काम कैसे चलेगा | इस सब बातो को सोचकर दरबरीगण बहुत चन्तित थे | इसलिए उनका हालचाल लेने कुछ दरबारियों के साथ बीरबल उनके महल में गए |

बादशाह ने बीरबल से पूछा –“मेरे प्यारे आधे भाई के समान तुम्हारा भी कोई आधा भाई है?”

बीरबल ने कहा – “जी, महाराज! मेरा भी एक आधा भाई है |”

“अच्छा, तुम उसे कभी दरबार में क्यों नहीं लाए?” हम भी तुम्हारे भाई से मिलना चाहेगे|” बादशाह ने इच्छा व्यक्त की |

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रमेश की कहानी मेरी जुबानी

आज की कहानी एक सच्ची कहानी है | रमेश जो बहुत ही मेहनती लड़का है | और उसके भी वही सपने है जो हर इन्सान के और हर नोजवान के सपने होते है | एक अच्छी सी नौकरी, घर और अपने परिवार वालो को हर ख़ुशी देना | पर जैसा की आप सभी लोग जानते है, ये सब सिर्फ सपने ही होते है और वो भी उन लोगो के लिए जिनके पीछे कोई नहीं होता है | रमेश के भी पीछे कोई नहीं था, वो पिछले ही साल अपने पिता को खो चूका है और बड़े भाई की भी नौकरी का कुछ पता नहीं है | बस भगवान की कृपा से उनका घर चल रहा है | एक और है जिसको वो अपने पिता समान और पिता से भी बड कर मानता था पर पता नहीं वो भी नराज है रमेश से |

मानो ज़िन्दगी जैसे रुक सी गई हो | अरमान बहुत थे करने को पर कोई रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं  था | रमेश वैसे तो सुलझा हुआ इन्सान है पर ज़िन्दगी के इस दोर में पता नहीं क्या हुआ उसे, मानो वो गुम सा गया हो अपने में | पिता के जाने के बाद वो बिल्कुल चुप हो गया था शायद अब उसे ज़िन्दगी का समना करना था या कुछ और | रमेश अक्सर मुझसे कहा करता था की कुशनसीब होते है वो लोग जिनके पास उनके पिता होते है जो उन्हें ज़िन्दगी का सामना करना सिखाते है | रमेशा का भी सही वक़्त था पर अब उसके साथ उसके पिता न थे | अब वो बिल्कुल अकेला जिसको घर भी चलाना था और कुछ करना भी था ज़िन्दगी में | रमेश को अब पता चल गया था की ज़िन्दगी जीना इतना आसन नहीं है जितना उसे लगता था |

आज रमेश बहुत उदास, गुमसुम सा था और बहुत ही चिंता में था मेरे पूछने पर भी उसने मुझे नहीं बताया, पर में समझा गया था उसकी खामोशी को देख कर की आज फिर से उसके मालिक ने सुनाया है और डराया होगा नौकरी के लिए | उसे चिंता थी तो अपनी नौकरी की क्योकि उसका मालिक उसे पिछले एक महीने से कभी कुछ सुना रहा था | रमेश अपनी नौकरी छोड़ना तो चाहता था पर उसे घर की भी चिंता थी की कही उसने नौकरी छोड़ दी तो घर कैसे चलेगा | आज कुछ समझ नहीं आ रहा की क्या करे वो, एक तरफ घर की चिंता है और दूसरी तरफ नौकरी की | और इस उलझन से बहार निकालने वाला भी कोई नहीं है उसे, आज वो अंधरे में बैठा, मायूस सा अकेला बैठा था | वह यह बात अपनी बीवी को भी नहीं बता सकता था क्योकि वह अपनी चिन्ताओ को किसी और को नहीं देना चाहता था वो बस अपने मन ही मन में रख रहा था और अपने आप से ही बात कर रहा था |

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श्रम ही पूण्य

एक सेठजी थे | जितना कमाते थे, उससे ज्यादा दान देते थे | इसलिए उन्हें लोग “दानी सेठ“ कहने लगे  थे | दानी सेठ दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लोटा था |

किन्तु समय बदला | दानी सेठ को अपने व्यापार में भारी घाटा हुआ | धीरे – धीरे सारा व्यापार चोपट हो गया | दानी सेठ की साडी संपति बिक गई | दानी सेठ अपनी लाज छिपाने के लिए नगर छोडकर चल दिए |

एक नगर में आकर दानी सेठ मजदूरी करने लगे | वह बहुत ही मुश्किल से अपना और अपना परिवार का पेट भर पाता था |

एक दिन पत्नी ने कहा – “इस नगर का नगर सेठ तो आपका परिचित है | उसने आपसे लाखो रुपए कमाए है | क्या वह मुसीबत के इन दिनों में हमारी मदद नहीं करेगा? आप उसके पास जाकर तो देखिए?

पर पता नहीं क्यों सेठ नगर के पास जाने से संकोच कर रहा था इस हालत में भी वे दान देने से पीछे नहीं हटते थे | अभी भी जो कुछ होता वो जरूरत मंद को दे देते चाहे वो भूखे ही क्यों न रहे |

और एक दिन सेठ सेठानी के कहने पर नगर चले गए | उस नगर के लोगो ने सेठ को तुरंत पहचान लिया और उन्हें बड़े आदर सहित बैठाया और उनकी पूरी कहानी सुनी |

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