बेटी के विदाई का दुःख

कन्यादान हुआ जब पूरा, तब आया समय विदाई का
हँसी ख़ुशी सब काम हुआ पूरा, सारी रस्म अदाई का
तब पूछा सवाल बेटी ने पिता से
पापा क्या सचमुच में छोड़ दिया साथ तुमने मेरा ।।

तुमने कहा मुझे सदा पारी अपने आंगन की,
मेरा रोना न होता था बर्दाश तुमसे,
अब क्या इसी आंगन में कोई नहीं है स्थान मेरा,
अब मेरे रोने का पापा, तुमको बिल्कुल ध्यान नहीं ।।

अब चली सुसराल में अपने. जंहा न कोई है अपने.
न जाने कैसे होगा पति आ आंगन,
पर इतना में कहती हु, न होगा बाबुल आंगन जैसे ||

पापा ले चले मुझे ये अपने साथ, आकर क्यों नहीं धमकाते इन्हें,
नहीं रोकते चाचा ताऊ, भैया से भी आस नहीं,
ऐसी भी क्या गलती हुई मुझसे, कोई आता नहीं पास मेरे,
क्या इतना ही था प्यार मुझसे, रोके न कोई मुझे ||

पिता की बेबसी

Read more

मेरी प्ररेणा

प्रक्रति है मेरी प्रेरणा

हम सबको देती यह धारणा ||

धारण करो शिष्टाचार,

बंद करो यह अत्याचार ||

 

हम सबको एक बात सिखाती

शीशा झुकाए दे दो फल

मत करो लालच उस पर ||

 

समय पर काम करना सीखो,

वरना तुम रहोगे मुरझाए फूलो जैसे ||

Read more

कैसे मिला सोनू का नया जीवन

एक गाँव में एक लड़का रहता था जिसका नाम सोनू था उसे जरा भी मेहनत करने की आदत नहीं थी | वह सारा दिन मन्दिर के बाहर बेठ कर भीख ही मांगता रहता था और मन्दिर में आने जाने वालो से भीख मांग का अपना जीवन व्यतीत करता था |

सर्दियों के दिन थे सुबह का समय था और ठंडी हवा चल रही थी | उस दिन मंदिर में लोगो का आना जाना बहुत कम था सोनू ने सोचा आज ठंड बहुत लोग भी काम आ रहे है क्यों न कही और जा कर बेठ जाऊ जहा में ठंड से बच सकू | सही सोच कर वह मंदिर के पास एक छज्जे था वहा जा कर बेठ गया |

सोनू को बहुत ज्यादा ठंड लग रही थी और जोर से जोर चिल्लाकर – चिल्लाकर राहगीरों से कहा रहा था, “भगवान के नाम पर कुछ दे दो, दो दिनों से मेने कुछ नहीं खाया | कोई कुछ तो दे दो, मेरे बढ़े माँ-पाप भेखे है |

जो थोड़े बहुत लोग थे वो कुछ न कुछ उसे दे देते | वही दूर खड़े एक महात्मा उसे देख रहे थे | वह सोनू के पास आए और बोले, “क्या नाम है तुम्हारा और तुम भीख क्यों मांग रहे हो?”

सोनू बोला, “मेरा नाम सोनू है और में बहुत ज्यादा गरीब हु | मेरे पास कुछ भी नहीं है | अगर में भीख नहीं मागुगा तो क्या खाउगा |”

महात्मा बोले “सोनू क्या सच में तुम्हारे पास कुछ नहीं है |”

यह सुनकर सोनू, “जी सच में मेरे पास कुछ नहीं है |”

महात्मा बोले, “तुम झूठ क्यों बोल रहे हो” |

सोनू बोला, “महाराज में झूठ क्यों बोलू गा, सच में मेरे पास कुछ भी नहीं है |”

यह सुनते ही महात्मा बोले, “तो ठीक है, में तुम्हे १०० रुपे देता हु और इसके बदले तुम मुझे अपने दोनों हाथ दे दो, बोलो ठीक है |”

Read more

तीन मूर्तिया का राज

बीरबल बहुत दिनों से दरबार नहीं गए थे और इसी मोके को देख कर बाकि दरबारियों ने बादशाह अकबर के कान भरना शुरू कर दिया जैसे बीरबल ने बादशाह के साथ बगावद की है, बीरबल गद्दार है, और बहुत कुछ कहा |

जब बीरबल वापिस दरबार आए तो बादशाह अकबर ने बीरबल से इस आरोपों के बारे में कोई बात नहीं की | लेकिन बीरबल ने महसूस कर लिया था की कोई न कोई बात तो है क्योकि बादशाह अकबर उनसे सही से बात नहीं कर रहे थे और उनके दिमाग में उसके प्रति अविश्वास और संदेह पैदा हो रहा था और इसी के चलते वब दरबार भी काम आने लगा था |

समय बीतता गया | अकबर को अपने चतुर और समझदार सलाहकार की याद आने लगी | एक दिन की बात है एक कारीगर बादशाह के लिए बहुत ही खास सोने से बनी तीन एक जैसी मूर्तिया लाया |

बादशाह अबकर को बहुत पसंद आई तीनो मूर्तिया परन्तु तभी कारीगर बोला, बादशाह, ये पूरी तरह एक जैसी नहीं है | इनमे से एक बाकि दोनों से बहतर है | लेकिन इनमे फर्क्र जानने के लिए बहुत तेज और पेनी नजर और दिमाग जाहिए |

तीनो मूर्तिया सभी दरबारियों को दिखाई गई | लेकिन न तो कोई दरबारी और न ही बादशाह अकबर उनमे कोई फर्क बता न सके |

बादशाह अकबर बोले, “अब सिर्फ्र एक ही आदमी इसमें फर्क बता सकता है जाओ जा कर बबीरबल को बुलाओ |”

कुछ देर बाद बरिबल दरबार में आए और बादशाह को सलाम किया | अकबर ने मन ही मन सोचा, “यह आदमी धोखेबाज कैसे हो सकता है क्योकि इसे देखते ही हमारा मन खुश हो जाता है |”

अकबर ने बीरबल से कहा, “बीरबल इन मूर्तियों को देखो और बताओ की इन तीनो मूर्तियों में क्या फर्क है या है भी नहीं |”

Read more

काला पानी – एक कहानी क्रांतिकारियों की

गूंजती है आज भी इन दीवारों में
चीत्कार उन केदियो की
भारत माता को मुक्त करने की कसम ले
चढ़ गए जो फँसी पर बिना किसी शिकन के |

उर्म केद हुई उन काली कोठरियों में
हंस का खा गए वो गोलिया सीने में
इन्ही सलाखों के पीछे
काट दी उन्होंने अपनी जिंदगानी बिना किसी परेशानी के
जिए थे वे एक ही माँ के लिए
और मरे भी थे एक माँ के लिए
उस माँ के लिए मरना था सोभाग्य की नोशानी |

लिख गए अपने रक्त से वो
इस काला पानी की काली कहानी
होंसले न कभी डगमगाए
बेत और कोड़े खा कर भी
आंसू न आए आँखों ने जिनकी

Read more

नारी के रूप अनेक

तुम्हे तम्हारा अस्तित्व देने वाली नारी है |

तुम्हारा परिवार शुरू करने वाली नारी है |

निस्वार्थ सेवा करने वाली भी नारी है |

मन्दिरों की मूर्तियों में भी नारी है |

 

बचपन में यही तुम्हारा घर सजाती है |

तुम्हारे आगन की रोनक बढ़ाती है |

तुम्हे अभिमान करना सिखाती है |

फिर उम्र का नया पड़ाव आता है |

पराये धन होने का उसे मतलब बताता है |

 

फिर वो ही नारी शादी का बंधन बनाती है |

वो ही नारी पत्नी का भी कर्तव्य निभाती है |

जिन्दगी के नए अनुभव सिखाती है |

माँ बन नई जिन्दगी को जन्म देती है |

फिर जिन्दगी ने ली करवट |

Read more

सिखों के पहले गुरु – नानक देव जी – Part 3

सुन 1497 सन 28 वर्षीय गुरु नानक अपनी पहली लम्बी यात्रा पर निकल पड़े | इस दोरान उन्होंने सत करतार का प्रचार किया और संपूर्ण उतर भारत में भुमते रहे | इस दोरान उन्होंने लाहोर, सेयदपुर करनाल, पानीपत, हरिद्वार, म्हनू का टीला (दिली), मथुरा, बनारस, पटना जैसे स्थानों में जाकर लोगो को सच्चे मार्ग पर चलने का उपदेश दिया |

एक बार की बात है नानक जी हरिद्वार में कुछ पडितो को गंगा जी की धारा में खड़े होकर सूर्य को जम अर्पित कर रहे थे | यह देख कर गुरु नानक ने उनसे पूछा, “अप्प लोग यह क्या कर रहे हो?”

तब उन्होंने उतर दिया, “हम लोग अपने पूर्वजो को जल अर्पित कर रहे है | सूर्य को दिया हुआ जल सीधा हमारे पूर्वजो को लगता है | और यह सुनते ही नानक जी अपने सारे कपड़े उतार दिए और गंगा जी में कूद पड़े और पशिचम दिशा में खड़े होकर जल देने लगे | वहा खड़े लोगो ने पूछा महाराज सूर्य इधर है आप गलत जगह पत जल अर्पित कर रहे हो | नानक जी बोले में अपने खेतो को जल दे रहा हु अभी आप ने ही तो कहा है की ऐसा जल देने से उनको जल पहुच जाता है जिसको आप देना चाहते हो इसलिए में अपने खेतो को दे रहा हु | यह सुनकर सभी हंस पड़े और बोले ऐसा थोड़ी न होता है | ऐसा जल कैसे पहुच सकता है | यह सुनकर गुरु नानक जी हस पड़े बोले, “तुम भी तो यही कर रहे हो, सूर्य को जल देने से यह जल कैसे उन तक पहुच सकता है |”

यह बात सुनकर उन सभी लोगो को अपनी गलती का अहसास हुआ और गुरु नानक जी के शिष्य बन गए |

जो गुरु नानक को अपना अंत समय निकट आया तो उन्होंने सारी सिख संगत को बुलाया और फिर उन्होंने भाई लहना के हाथ ने पांच पैसे और एक नारियल रखा और उनके माथे पर तिलक लगाकर उने अपनी गद्दी सोंप दी | फिर वे संत संगत को सबोधित करके बोले, “आज से भाई लहना आप सबके गुरु है | आज से ये गुरु आनंद देव कहलायेगे |”

Read more

कैसी बचाई सुरेश ने अपनी बहन की जान

मुंबई शहर में जो भी आता है वो बड़े बड़े सपने ले कर आता है | उनमे से एक नाम सुरेश का भी है जो मंबई में रहता था | वो भी बड़े बड़े सपने लेता था परन्तु उन्हें पूरा करने का साहस भी था उसमे | वह पढने में बहुत होशियार था और साथ ही साथ वह बहुत बहादुर भी था |

जुलाई का महिना था पर मुंबई में बहुत ज्यादा बारिश हो रही थी सुरेश अपनी बहन को स्कुल से घर लोट रहा था | पानी इतना भरा हुआ था की सडक पर क्या पड़ा हुआ है और क्या नहीं कुछ पता नहीं चल रहा था | इतने मी अचानक उसकी बहन गिर गई और डूबने लगी | सुरेश ने अपनी बहन को कस कर पकड़ लिया और उसे उपर की और खींचने लगा |

परन्तु बारिश बहुत हो रही थी और दोनों भाई बहनों के कंधे पर पड़े बसते बहुत ज्यादा भारी हो गए थे जिसकी वजह से सुरेश को उपर लाना बहुत मुश्किल हो रहा था | वह नीचे भी गिर पड़ा पर चोट भी लग गई थी | सुरेश पानी में कुछ मजबूत वस्तु ढूड रहा था की अचानक उसे गटर का ढकन मिल गया और उसे बहुत जोर से उसे पकड़ लिया और अपनी बहन को उपर लाने में कामयाब हो गया | परन्तु दोनों को बहुत ज्यादा छोटे लग गई थी | यह देख कर स्थनीय लोगो ने उन्हें अस्पताल ले गए |

Read more

कैसे हुई पहली मुलाकात बीरबल की अकबर से

अकबर की गिनती महान बादशाहों में होती है | वो बहतु बड़े योधा, बुदिमान और दूरद्रष्ट थे | बादशाह अकबर में कोई कमी न थी एक को छोड़ कर और वो था उनका अंहकार |

बादशाह सभी धर्मो को मानते थे | इसी के चलते, एक दिन रामायण की चर्चा हो रही थी की अचानक बादशाह अकबर खड़े हो गए और बोले में ही राजा राम का अवतार | यह सुनकर सभी हिन्दू विद्वान डर गए | सभी हिन्दू कानाफूसी करने लगे की बादशाह अकबर एक नश्वर मनुष्य और वह भी एक मुसलमान | वो ऐसी बात कैसे कह सकते है | पपरन्तु सब डरते थे की उनसे यह कहे कोन, पर बताना भी जरूरी था पर कहे तो कहे कैसे और क्यों कहे ? सभी हिन्दुओ के मनो में सब सही चल रहा था |

उनमे एक ऋषि महेश दास भी था | उसने सभी हिन्दुओ को बाते सुनी और उन से कहा, “तुम लोग चिंता मत करो, कल तुम मुझे दरबार ले चलना | हो सकता है की में बादशाह को बटा सकू वे भगवान राम नहीं है|”

यह सुनकर सभी हिन्दू उन पर हसने लगे | अगले दिन वैसा ही हुआ | महेश दास बादशाह के दरबार में पहुचे | उन्हें देख कर बादशाह ने पूछा, “तुम क्यों हो नोजवान, और ये आप विद्वानो के बिच में क्या कर रहा है |”

यह सुनकर महेश दास बोला, “महाराज गुस्ताखी माफ, परन्तु अगर आप बुद्धिमानी का अंदाजा उसकी उम्र, और सफेद बालो से करते है तो में अभो जा कर एक ऐसी जीज लाता हु | और वो दरबार से चले गए | कुछ देर बीतने के बाद महेश दरबार में एक बकरा ले कर आ गए | “

यह देखर कर सभी दरबारी डर गए और सोचने लगे की अब बादशाह अकबर क्या करेगे, परन्तु बादशाह अकबर यह देखकर मुस्करा पड़े और बोले, “तुम्ह्रारी हाजिर जवाबी का जवाब नहीं”

महेश दास के पास एक जग और कुछ पत्थर थे बादशाह अकबर ने पूछा, यह क्या है और किसलिए यहाँ लाये हो तुम इसे”

Read more

भगवान सब देखता है

बहुत पुरानी बात है | एक बहुत प्रसिद गुरुकुल था | दूर दूर के गाँवो से बच्चे वहा पड़ने आते थे | आश्रम में जो गुरु थे वो भी बहुत विद्वान और यशस्वी थे |

एक दिन की बात है आचर्य ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और कहा, “प्रिये शिष्यों, मेने तुम्हे आज एक विशेष कार्य ले लिए यहाँ पर बुलाया है | शिष्यों मेरे सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ पड़ी है | मेरी पुत्री विवहा योग्य हो गई है और मेरे पास उसके विवहा करने के लिए घन नहीं है | मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है की में क्या करू?”

उन सभी शिष्यों में से कुछ शिष्य धनि परिवार में से थे और वो आगे बढ़ के बोले, “गुरुदेव अगर आप की आज्ञा हो तो हम अपने घर में से ले आते है धन और फिर आप अपनी पुत्री का विवहा कर देना |

आचर्य बोले,” अरे नहीं अरे नही वत्स, ऐसा नहीं हो सकता है |”

शिष्य बोले, “गुरुदेव ऐसा क्यों नहीं हो सकता, आप उसे हमारी तरफ से गुरु दक्षिणा समझ लेना”

इस पर गुरुदेव बोल, “नहीं वस्त, तुम्हारे घर वाले सोचेगे की तुम्हारे गुरु लालची हो गए है | वो धन ले कर विध्या देते है |”

सभी शिष्यों ने पूछा,” फिर क्या किया जाए गुरुदेव, जिस से आप की पुत्री का विवहा हो सके” | गुरुदेव कुछ देर सोचने के बाद बोले, “हा एक तरीका है | ऐसा करो तुम धन ले कर तो आओ परन्तु मांग कर नहीं | इस तरह से लाओ की किसी को पता न चल सके |”

उनमे से कुछ शिष्य बोले, “गुरुदेव परन्तु हमारे माता-पिता के पास तो नहीं है |”

“कुछ भी ले कर आओ अपने घरो में से परन्तु ध्यान रहे की किसी को पता न चले वरना मेरे श्रम से मर जाऊगा |”

यह सुन कर सही शिष्य अपने अपने घर की तरफ चल पड़े | अगले दिन से ही सभी शिष्य अपने अपने घरो में से कुछ न कुछ लाना सुरु कर दिया | और कुछ ही दिनों में आश्रम में बहुत सारी सामग्री इकठी हो गई |

Read more