क्या सजा मिली सोनू को पेड़ – पोधे तोड़ने की

मोना, एक ११ साल की लडकी थी उसने अपने घर के आगन में एक क्यारी बनाई और उसमे तरह – तरह के पेड़ पोधे उगाये | उसकी क्यारी में हर तरह के पेड़ पोधे थे जैसे गुलाब, कमल और भी बहुत सारे | हर रोज मोना उन पोधो को देख कर खुश हुआ करती थी |

मोना के घर के आस – पास के लोग भी उन फूलो को देख कर खुश हुआ करते थे | मोना एक बड़ा भाई भी था जिसका नाम सोनू था | एक दिन की बात है की सोनू के जुलाब के फूलो तो तोड़ डाला यह देख कर मोना बहुत दुखी और रोने लगी |

मोना को रोते देख, माँ ने पूछा, “क्या हुआ बेटा, तुम रो क्यों रही हो?”

क्यारी देख कर माँ पूरी बात समझ गई और अपने बेटे को बुला कर पूछा, “सोनू, क्या तुमने गुलाब तोड़े है?”

यह सुनकर वह डर गया और धीमे से बोला, “हा माँ में ही गुलाब की टहनिय तोड़ी है|”

यह सुन कर माँ बोली, “बेटा, तुमने सच बोला है इसलिए में तुम्हे कुछ नहीं कह रही हु परन्तु यह बात समझ लो की पेड़ – पोधे तोडा पाप होता है | भगवान जी उसे कभी माफ नहीं करते | पेड़ – पोधे हमे, फल, फूल, छाया और कई पोधे से तो दवाईया भी बनती है | और सबसे जरूरी बात – पेड़ पोधे हमारी वायु को साफ करते है हमे हवा देते है और उसी से हम साँस लेते है | अगर हम सभी पेड़ – पोधो को तोड़ या काट डालेगे तो एक दिन हम सभी मर जाएगे | इसलिए कभी पेड़ – पोधो को काटना नहीं चाहिए |

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असली खजाना

बहुत साल पहले एक गाँव में एक सीताराम नाम का एक गरीब चरवाहा रहता था | वह पुरे दिन में सिर्फ अपनी भेड़ो को उन से बनी उन से बने फटे – पुराने कपड़े बस इतना ही जुटा पाता था परन्तु फिर भी वह बहुत ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन बीता रहा था |

वह बहुत इमानदार, और बुद्धिमान था | उस गाँव के सभी लोग उसका बहुत आदर करते थे | सीताराम उनकी सभी परेशानियों को मिनटों में सुलझा देता था |

धीरे धीरे उसकी बुद्धिमानी की चर्चा वहा के राजा के कानो में पहुची | उस समय वहा का राजा कुछ परेशानियों से जूझ रहा था उसने सीताराम को बुलवा भेजा और अपनी सभी परेशानियों का हल माँगा | सीताराम ने राजा की सभी परेशानियों का हल दे दिया | अब वह भी सीताराम का कायल हो गया और खुश होकर उसे अपने दरबार में स्थान दे दिया |

धीरे धीरे राजा बिना सीताराम के कोई भी काम नहीं करता था | वह हर वक़्त राजा के साथ ही रहता था | यह सब देख कर दुसरे दरबारियों के मन में उसके प्रति इर्षा पैदा हो गई और वे मोका देखकर राजा के कान भरने लगे | लेकिन सब व्यर्थ था क्योकि राजा के मन में सीताराम के लिए स्नेह और सम्मान बहुत ज़यादा था | उल्टा दरबारियों को राजा ने बहुत खरी-खोटी सुनाई |

एक दिन की बात है की राजा ने सीताराम को बुलाया और अपने उतरी प्रदेश का गवर्नर नियुक्त कर दिया और बोले, “सीताराम हमे पता है की हम तुम्हे अपने से अलग कर रहे है लेकिन क्या करे, मजबूरी है | उतरी प्रदेश का शासन सही नहीं है | वहा के लोग मनमानी कर रहे है और वहा की प्रजा को तंग कर रहे है | सिर्फ तुम ही हो जिस पर मुझे पूरा भरोसा है | तुम आज ही वहा के लिए रवाना हो जाओ और वहा का कार्य संभालो |

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एक परीक्षा

एक दिन की बात है की नोजवान दीवान-ए-खास में आया और बादशाह को सलाम किया |

उसने कहा, “जहाँपनाह, मेने फारसी, तुर्की, और संस्कृत भाषा पढ़ी है | मुझे राजनीती और दर्शनशात्र की भी जानकारी है |”

अकबर ने कहा, “तुम तो बुद्धिमान लगते हो” | उन्होंने कहा हमे तुम जैसे लायक लोगो की जरूरत हमेशा रहती है | शाही मुर्गीखाने ने लिए एक अच्छा आदमी चाहिए | उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है | अगर तुम चाहो तो यह नोकरी कर सकते हो |”

यह सुनते ही उसे निराशा हुई क्योकि उसको उमीद थी की बादशाह उसे अपने दरबारियों में शामिल करेगे, परन्तु ऐसा नहीं हुआ | उसने उस काम के लिए हा भर दी और कहा, “बादशाह, में कल से काम संभाल लुगा |”

तीन महीने बीत गए, बादशाह अकबर एक दिन मुर्गीखाने का निरक्षण करने पहुचे | उन्हें वहा साफ सुथरा लगा | मुर्गिया भी स्वस्थ और साफ-सुथरी थी |”

बादशहा बहुत खुश थे और उस नोजवान से कहा, लगता है तुम ने इन पर बहुत पैसा खर्च किया है |”

इस पर वो नोजवान ने तुंरत कहा, “बिलकुल नहीं आलमपनाह, रसोईघर के बचे-खुचे खाने से इन्हें अच्छी खुराक मिल जाती है”

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माँ की अंतिम अभिलाषा

बहुत पुरानी बात है जब मोहनगढ़ पर सेठ हरिराम का शासन हुआ करता था | उसी जगह रामू नाम का एक लड़का रहा करता था | वो बहुत ही बुद्धिमान था | बड़ा होकर उसे मोहनगढ़ का दरबारी विदूषक नियुक्त किया गया |

सेठ हरिराम की माता जी जब गंभीर रूप से बीमार पड़ी तो सेठ हरिराम को यह बात समझ आ गई की उनकी माता जी के पास ज्यादा समय नहीं है | इसलिए सेठ अपनी माताजी की हर अभिलाषा को पूरा करने की कोशिश करने लगे | एक दिन उनकी माताजी का मन आम खाने की इच्छा हुई | पुत्र ने माँ की आज्ञा का तुरंत पालन करने का आदेश दिया | मगर वे उन्हें आम खिला पते उससे पहले की उनकी माता जी का देहांत हो गया और उनकी यह इच्छा अधूरी रह गई | हरिराम हो अपनी माता जी की आखरी इच्छा पूरी न कर सकने का बहुत दुःख हुआ | वही पास खड़े एक ब्राहमण ने कहा सेठ अगर आप सोने के आम दान में देगे तो उनकी माँ की आत्मा को शांति मिल जायगी |

तभी सेठ ने सभी ब्राहमण को सोने के आम देना शुरू कर दिया | रामू यह सब देख रहा था और उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था की बार-बार ब्राहमण सेठ के घर के आस – पास चक्कर लगा रहे थे |

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कैसे मिला राजा हरिश्चंद्र को देवन्द्र का पद

प्राचीन समय की बात है एक बहुत प्रसिद राजा हरिश्चंद्र थे उन्होंने अश्वमेघ आदि अनेको यज्ञो का अनुष्ठान कर याचको को भरपूर दान दिया | प्रजा ऐसे धर्मात्मा राजा को पाकर अत्यंत प्रसन्न थी | इस प्रकार हरिश्चंद्र धर्म और कर्म दोनों में बड चड कर आगे रहते थे | पूरी जिन्दगी बहुत ही अच्छे से बिताई | फिर व्र्दावस्था में उन्होंने वैराग्य जीवन ग्रहण किया और गंगा के संगम पर घोर तपस्या करना शुरू कर दिया |

एक बार की बात है राजा हरिश्चन्द्र ने अपने शासनकाल में सम मानक एक भंयकर और शक्तिशाली देती को रणभूमि में मार भगाया था | उनके भय से वह देत्य वहा से भाग गया और चुप गया | जब उसे पता चला की राजा हरिश्चंद्र ने राज –पाठ छोड़ दिया और गंगा किनारे जा कर साधन कर रहा है तो उसके मन में बदला लेने का सोचा | वह एक सुंदर स्त्री का रूप धारण करके उसके पास गया ओ प्रेम भरे स्वर में बोला, “ हे राजन ! में देव लोक की अप्सरा हु में धरती पर आप के लिए आई हु | आप के बल – पोरुष की बहुत प्रशंसा सुनी है | आप के अतिरिक्त इस संसार में कोई नहीं है मेरे लायक | इसलिए में अपने आप को आप के चरणों में अर्पित करती हु | आप इस दासी को स्वीकार करे |”

उसकी मीठी मीठी बाते सुनकर राजा हरिश्चंद्र उस पर मोहित हो गए | उन्होंने काम कर अधीन हो कर अपना तप त्याग दिया और उसके साथ भोग में लीं हो गए | जब सम को यह अहसास हो गया की राजा हरिश्चंद्र की तपस्या भंग हो चुकी है तो अपनी सफलता का प्रसन्न होकर वह वहा से गायब हो गया |

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अमृत का छीटा

बहुत पुरानी बात है गंगा तट के किनारे ऋषि और उनकी पत्नी रहा करते थे | एक बार वे यज्ञ कर रहे थे और उनकी पत्नी देवताओ के लिए खीर बना रही थी की अचानक चुल्ले के धुएं से एक भयंकर प्रुरुष प्रकट हुआ और देखते ही देखते वह सारा खाना खा गया | यह सब देखर ऋषि को बहुत गुस्सा आया और बोले, “दुष्ट! तू कोन है जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है? शीर्घ अपना परिचय दे, वरना में तुझे अभी भस्म कर दुगा “

यह सुनकर वह डर गया और विन्रम स्वर में बोला, “हे ऋषि मेरा नाम य्ग्यधन है और में संध्या और प्राचीनबहिर्ष का पुत्र हु | पितामह ने मुझे यज्ञो का भक्षण करने का वरदान दिया है | और इसलिए में आपका यज्ञ नष्ट करने आया हु|

यह सुनकर ऋषि बोले, “य्ग्यधन | यज्ञ की रक्षा करना सभी का लोगो का धर्म है इसलिए तुम भी मेरे यज्ञ की रक्षा करो | में जनता हु की तुम यज्ञ का नाश करने वाले हो और यही तुम्हारा स्वभाव है, लेकिन फिर भी में तुम से अनुरोध करता हु की तुम मेरे यज्ञ की रक्षा करो |”

य्ग्यधन बोला, “महर्षि, प्राचीनकाल में ब्रह्मा जी ने मुझे शाप दिया था किन्तु बाद में मेरी आराधना से प्रसन्न होकर उन्होंने कहा था की जब कोई महर्षि मेरे उपर अम्रत का छीटा देगा, तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे | इसलिए हे महर्षि आप मेरा उदाहर करे |”

यह सुनकर ऋषि बोले, “य्ग्यधन! यह भला कैसे संभव हो सकता? देवताओ और देत्यो ने क्षीरसागर का मंथन कर बड़ी कठिनाई से अम्रत प्राप्त किया था | वह मुझे कैसे प्राप्त हो सकता है ? यह एक असम्भव कार्य है, इसलिए तुम कोई और वस्तु मांग लो”

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फिर भी रहा गधे का गधा ही

एक गाँव में एक पाठशाला थी उस गाँव के पंडित जी उस गाँव के बच्चो को पढ़ाया करते थे | एक दिन की बात है पंडितजी बच्चो को किसी बच्चे की शरारत करने पर गुस्सा कर रहे थे की तुम जैसे गधो को में आदमी बना दिया है | तो तुम क्या चीच हो |

उसी समय वहा से एक घोबी जा रहा था अपने गधे के साथ | उस धोबी का कोई बच्च नहीं था | उसने सोचा अगर यह सत्य है की पंडित जी गधे को आदमी बना देते है हो क्या वो मेरे इस गधे को भी आदमी बना देगे क्या? मेरे बुढ़ापे का सहारा हो जायगा |

शाम होते ही घोबी अपने गधे को साथ लेकर पंडित जी के पास ले गया और बोला, “पंडित जी मेरा कोई बच्चा नहीं है क्या आप मेरे इस गधे को आदमी बना दोगे क्या?”

यह सुनकर पंडित जी हेरान रह गए और बोले, “तुम पागल तो नहीं हो, क्या गधा भी आदमी बन सकता है | “

घोबी ने पंडित जी के पांव पकड़ लिए और बोला, “पंडित जी आप को जो चाहिए में आप को दे दुगा, परन्तु कृपा करके इस गधे को आदमी बना दो | मुझे पता है आप कर सकते हो क्योकि में अपने कानो से सुना है की आप बच्चो को कहे रहे थे की तू जैसे गधो को आदमी बना दिया है |”

पंडित जी पूरी बात समझ गए और उसे भी समझाने लगे की ऐसा नहीं हो सकता है परन्तु वो समझ ही नहीं रहा था | कुछ देर बाद पंडित जी समझ गए की इस गधे को समझाना असंभव है | कुछ देर बाद पंडित जी बोले, “अच्छा ठीक है, पर देख लो, इस काम के पांच सो रुपे लगेगे और तिन महीने का वक्त भी |”

यह सुनकर घोबी खुश हो गया और बोला, “ठीक है पंडित जी में अभी घर जा कर पैसे ले कर आता हु |”

थोड़ी देर बाद घोबी पैसे ले आ गया और पंडित को दे दिया | पंडित जी पैसे अपनी जेब में रख लिए और बोले, “अब तुम जाओ और ठीक तीन महीने बाद आ जाना |”

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कैसे मिला सोनू का नया जीवन

एक गाँव में एक लड़का रहता था जिसका नाम सोनू था उसे जरा भी मेहनत करने की आदत नहीं थी | वह सारा दिन मन्दिर के बाहर बेठ कर भीख ही मांगता रहता था और मन्दिर में आने जाने वालो से भीख मांग का अपना जीवन व्यतीत करता था |

सर्दियों के दिन थे सुबह का समय था और ठंडी हवा चल रही थी | उस दिन मंदिर में लोगो का आना जाना बहुत कम था सोनू ने सोचा आज ठंड बहुत लोग भी काम आ रहे है क्यों न कही और जा कर बेठ जाऊ जहा में ठंड से बच सकू | सही सोच कर वह मंदिर के पास एक छज्जे था वहा जा कर बेठ गया |

सोनू को बहुत ज्यादा ठंड लग रही थी और जोर से जोर चिल्लाकर – चिल्लाकर राहगीरों से कहा रहा था, “भगवान के नाम पर कुछ दे दो, दो दिनों से मेने कुछ नहीं खाया | कोई कुछ तो दे दो, मेरे बढ़े माँ-पाप भेखे है |

जो थोड़े बहुत लोग थे वो कुछ न कुछ उसे दे देते | वही दूर खड़े एक महात्मा उसे देख रहे थे | वह सोनू के पास आए और बोले, “क्या नाम है तुम्हारा और तुम भीख क्यों मांग रहे हो?”

सोनू बोला, “मेरा नाम सोनू है और में बहुत ज्यादा गरीब हु | मेरे पास कुछ भी नहीं है | अगर में भीख नहीं मागुगा तो क्या खाउगा |”

महात्मा बोले “सोनू क्या सच में तुम्हारे पास कुछ नहीं है |”

यह सुनकर सोनू, “जी सच में मेरे पास कुछ नहीं है |”

महात्मा बोले, “तुम झूठ क्यों बोल रहे हो” |

सोनू बोला, “महाराज में झूठ क्यों बोलू गा, सच में मेरे पास कुछ भी नहीं है |”

यह सुनते ही महात्मा बोले, “तो ठीक है, में तुम्हे १०० रुपे देता हु और इसके बदले तुम मुझे अपने दोनों हाथ दे दो, बोलो ठीक है |”

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समय पर विजय

एक दिन दोपहर का समय था महाराज युवराज अपने दरबारियों के साथ सभा में व्यस्त थे तभी द्वारपाल सभा में आया और बोला, महाराज, “बाहर खड़ा एक व्यक्ति आपके दर्शन करने की आज्ञा चाहता है |

महाराज ने कहा, “उन्हें अंदर ले आओ और यह कहकर अपने कार्य में व्यस्त हो गए | थोड़ी देर बाद वह व्यक्ति दरबार में आ आया और हाथ जोड़कर महाराज के सामने खड़ा हो गया | परन्तु महाराज ने उसकी तरफ नहीं देखा और प्रतीक्षा करने लगा की महाराज अपनी बात रख सके | बहुत देर हो गई पंरतु महाराज अपने काम में इतने व्यस्त थे की उन्हें समय ही नहीं मिला उस व्यक्ति से बात करने का |

उस व्यक्ति ने बहुत प्रयास किया अपनी बात महाराज को बताने की परन्तु हर बार वो असफल रहा | परन्तु वह वहा से गया नहीं | वह खड़ा रहा | महाराज को जब अपने कार्य से फुर्सत मिली तो उन्होंने उस व्यक्ति की और देखा | उसे देखते ही उसे याद आ गया की उसने ही द्र्वर्पल को कहा था उस व्यक्ति को बुलाने के लिए कहा था |

महाराज इतने व्यस्त थे अपने काम में की उन्होंने उस व्यक्ति को कल आने को कहे दिया और कहा की जो भी आपकी इच्छा होगी, पूरी की जाएगी |

यह सुनकर वो वहा से चला गया | परन्तु उनमे से एक दरबारी को महाराज का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा और सोचने लगा की कल का क्या भरोसा | कल कोई रहे या नहीं रहे | महाराज को उसकी बात सुन लेनी चाहिए थी | उन्होंने ठीक नहीं किया |

यह सब सोचते – सोचते रवि राजसभा से बाहर आ गया ओ द्वार पर रखी हुई दुंदुभी उठाकर बजाने लगे | उनके आस पास खड़े दरबारी चकित हो गए, परन्तु किसी की हिम्मत नहीं हुई उनसे पूछने की क्या हुआ | रवि ने सभी को दुंदुभी बजाने को कहा और कहा, जोर जोर से बोले, “महाराज की जय हो, महाराज की जय हो, महाराज ने समय पर विजय प्राप्त कर ली | सभी दरबारी यह बोलते बोलते राज्यसभा में आ गए |

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सोने का लोभ

एक शहर में एक सेठ मायादास रहता था और वो बहुत धनी थे | उनके पास बहुत सारा सोना चांदी भी था परन्तु फिर भी उन्हें बहुत कम लगता था | वो चारो पहल सिर्फ और सिर्फ धन कमाने ले लिए सोचता रहता था | एक दिन उसके पास एक साधु आया | मायादास ने उस साधु की खूब सेवा की | यह देखकर साधु बहुत खुश हुए और बोला, “तुम क्या चाहते हो?”

मायादास ने मोका का फायदा उठाया, “उस ने झट से बोल दिया, महाराज में जिस को भी हाथ लगाऊ जो सोने की हो जाए |”

यह संकर साधु हस पड़े और बोला ठीक है, ऐसा ही होगा | और फिर साधु वहा से चले गए | साधु के जाते ही मायादास ख़ुशी से पागल हो गया | उसने लकड़ी के दरवाजे को छुआ और वह सोने का बन गया | यह देखकर मायादस बहुत खुश हो गया | फिर उसने सभी को धीरे धीरे हाथ लगाना शुरू कर दिया और सभी कुछ सोने का होने लगा | सोने की कुर्सी, सोने का मेज, सोने का पलंग, सोने के कपड़े, सोने का रथ | यहाँ तक की उसने जानवरों को भी सोने का बना दिया |

अब वह थक चूका था उसने अपने नोकर से पानी का गिलास मंगवाया, गिलास को छुते ही वह भी सोने का हो गया | मायादास अब घबरा गया | फिर उसने खाना मंगवाया, वह भी सोने का हो गया | अब वह किसी को भी छुता वह सोने का हो जाता | वह भूखा प्यासा रह गया |

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