चापलूसी करने वाले सदा धोखा देते है

एक बार की बात है एक कबूतर एक पेड़ की शाखा पर बेठा, मजे से गाना गुण गुना रहा था | ठीक उसी समय वह पर लोमड़ी आ गई | कबूतर की अवाज सुन कर लोमड़ी ने पेड़ पर देखा और उसे वहा एक कबूतर नजर आया | कबूतर को देखते की उसके मुह में … Read more

सिखों के पहले गुरु – गुरु नानक देव जी – Part 2

अब नानक युवा हो चुके थे इसलिए उनके पिता ने सोचा की अब नानक का जनेऊ करा देना चाहिए | जनेऊ हिन्दुओ का प्रमुख संस्कार है | और यह माना जाता है इस इसके बाद व्यक्ति उच्च वर्ण में प्रवेश कर जाता है | हिन्दू धर्म के अनुसार जनेऊ केवल ब्रह्मणों, क्षत्रियो और वेश्यो को ही अधिकार था | और जैसा की हमे अभी तक पता चला है की नानक जी को इस सभी प्रकार के कर्मकांडो पर बिलकुल विश्वास न था और अपने पिता को साफ मना कर दिया जनेऊ पहनने से और अपने पिता और पुरोहित से बोमे, “क्या कोई ऐसा जनेऊ भी है जिससे व्यक्ति परलोक में ले जा सके ? और अगर है तब में वो जनेऊ जरुर धारण करुगा |

यह बात सुनकर पुरोहित ने स्वीकार किया की उनके पास ऐसा कोई जनेऊ नहीं है | उस वक्त धर्मिक कर्मकांडो को विरोध करना इतना आसन नहीं होता था | परन्तु नानक अपनी बात पर अड़े रहे और इस प्रकार के कर्मकांडो को विरोध करते रहे | उन्होंने अपने शब्दों में आदर्श जनेऊ की व्याख्या की : –

दइआ कपाह संतोखु सुनु जतु गंढी सतुवटु|

एहु जनेऊ जीउ का ह्यीता पांडे धाउ||

ना एहु न मलु लगे न एहु जले ना जाई ||

धनु सु माणस नानका जो गलि चले पाई ||

व्याख्य: इस शब्दों का अर्थ हहै की जनेऊ ऐसा हिना चाहिए, जिसमे दया की कपास लगी हो और संतोष की सूत लगी हो | ऐसा जनेऊ सत्य से बटा जाता है | मनुष्य को ऐसा ही जनेऊ धारण करना चाहिए | ऐसा जनेऊ न कभी टूटता है न कभी गन्दा होता है और न कभी जलता है | नानक कहते है की जो व्यक्ति ऐसा जनेऊ फंता है उसे सत करतार का आशीर्वाद मिलता है |

नानक जी मानते है की संसार में जन्म, विवाह, मुत्यु, आदि जीवन की सभी चीजो में कही न कही कोई न कोई रीती – रिवाज जुड़े हुए है | इस प्रकार के रीती – रिवाजो को नानक समय और धन की बर्बादी समझते थे | नानक अनुभव करते थे की पुरोहित, ब्रह्मणों अपने स्वार्थ के लिए भोली भली जनता को धर्म के नाम पर मुर्ख बनाते है |

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आलस की सजा

शीत ऋतू का दिन था और एक झींगुर मस्ती में बेठा धुप सेक रहा था वह बहुत भूखा था क्योकि उसने फिछले दो दिनों से कुछ नहीं खाया था | वह अपने घर से निकला कुछ खाने के लिए और कुछ ही देर बाद उसे एक डाली पर चींटियो का झुंड दिखाई दिया जो अपना भोजन ले कर अपने बिल में ले जा रही थी |

झींगुर चींटियो के पास जा कर बहुत ही प्यार से बोला, “क्या आप मुझे अपने खाने में कुछ खाना दे सकते हो क्या? मेने कल से कुछ नहीं खाया | तथा भूख के कारण मेरा दम निकले जा रहा है |

चीटिया छन भर के लिए रुक गई और उनमे से एक चीटी ने झींगुर से पूछा, “तुम गर्मियों की ऋतू में क्या करते रहे, क्या तुम ने अपना खाना नहीं इकठठा किया, जो तुम हम से मांग रहे हो | “

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रोटी मेहनत की कमाई की

भारत में एक बहुत छोटा सा गाँव था | उस गाँव के सभी लोग बहुत ईमानदार थे | वह सभी लोग अपना काम ईमानदारी से करते थे और सभी लोग एक साथ और मिलजुल कर रहते थे | सभी में बहुत प्रेम था | गाँव हर तरह से पूर्ण था परन्तु बाढ़ और सुखा ही उनकी परेशानी का कारण था जब भी भूखा या बाढ़ आती सभी गाँव के लोग मिलजुल कर एक दुसरे की मदद करते |

एक बार गाँव में बहुत भीषण सूखे के कारण गाँव के सभी कुओ, तलाब, खेत के साथ साथ पेड़ पोधे भी सुख गए | जैसे – जैसे महीने बीते गुए हालत और बुरी होती गई | पशु – पक्षी और इन्सान भी मरने लगे | यह देखकर गाँव के मुखिया ने अपने अनाज के भंडार खोल दिए और लोगो में मुफ्त बाटना सुरु कर दिया | गाँव के मुखिया ने सभी गाँव वालो के लिए अपने ट्यूब वेळ वाले कुए से पानी लेने से कह दिया | पूरा गाँव वाले ने मुखिया की भेंट स्वीकार पर, परन्तु सिर्फ एक किसान ने माना कर दिया | उस किसान को लगता था की किसी का एहसान लेने से तो चोरी भली है |

इसी के चलते, उसने एक दिन रात को मुखिया के घर जा चोरी करने की सोची और चोरी करने चला गया | चोरी करते समय उसका एक नाख़ून टूट कर अनाज के दोनों में गिर गया | उस वक्त यह मान्यता था की जिस भी किसी का नाख़ून किसी और के घर पर टुटा को वह घर बरबाद हो जाता था और यह बात किसान को पता था | वह बिलकुल ऐसा नहीं चाहता था की मुखिया का घर बरबाद हो जाए | इसलिए वह अपने नाख़ून को खोजने लगा और खोजते – खोजते पूरी रात लग गई और जब तक मिला तब तक सुबह हो गई थी | वहा सोया मुखिया के एक नोकर ने उसे देख लिया वहा पर और उसे पकड़कर लिया और अपने मालिक के सामने पेश किया | उसे अपना जुर्म मान लिया और उसे साडी कहानी बता दी | उसने कहा जुर्म करना बहुत बुरी बात है परन्तु दान पर जीना भी बड़ा अपराध है |

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माता – पिता के प्यार का कोई मूल्य नहीं

पांच वर्ष की गोरिका की एक सेहली जिसका नाम रिंकी था उसके पास बहुत सारे खिलोने थे | रिकी के साथ खेलते खेलते उसका मन एक गुडिया पर आ गया और उसने सोचा की उसके पास भी बिलकुल वेसी गुडिया होनी चाहिए यही सोच कर उसने अपनी में बोला, “माँ मुझे भी वेसी ही गुडिया चाहिए, परन्तु माँ में उसे डाट कर मना कर दिया और कहा नहीं बेटा अब तुम्हारी उर्म नहीं है गुडियों के साथ खेलने की | गोरिका के बार – बार निवेदन करने पर भी माँ टस से मस नहीं हुई |

गोरिका को बहुत क्रोध आया उसने उस वक्त का खाना भी नहीं खाया | उसने रात का भी खाना नहीं खाया उसकी माँ ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की परन्तु वह नहीं मानी | उसकी माँ भी हार मान के वहा से चली गई | गोरिका अपने कमरे में अकेली लेटी हुई थी तभी उसको याद आया की उसकी माँ ने कहा था की उसके पिता का बहुत अच्छा वेतन है | तो इसका मतलब उसकी माँ के पास बहुत पैसे होगे फिर भी मुझे माँ मेरी मन पसंद की किताब खरीदने नहीं दे रही है | वह पूरी रात भर सोचती रही की कैसे वह गिडिया ले, क्या करे वो | बहुत सोचने के बाद उसने अपनी माँ के पर्स में से पैसे लेने की ठान ली और खुद ही गुडिया लेने का निश्चय कर लिया | उसने अगले दिन सुबह ही अपनी माँ के कमरे में चले गई, उसे पता था की उस वक्त माँ पापा के लिए खाना बना रही होगी | बस मोका देख कर वह कमरे में प्रवेश कर गई और उसने पर्स उठा ही लिया था की अचानक उसे अपनी माँ की अवाज सुनाई दी, “काश मेरे पास इतने पैसे होते की में अपनी बेटी को वो गिडिया दिला सकती | में हमेशा अपने बच्चो को कहती थी की उसके पिता का बहुत अच्छा वेतन है परन्तु मुझे हमेशा कोई न कोई बहाना बनाना पड़ता है उन्हें मना करने के लिए | मुझे बहुत दुःख होता है अपने बच्चो का मुरझाया चहरा देख कर |

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प्रेम दो भाइयो का

हिमाचल में बहुत छोटा सा गाँव है, वहा पर दो भाई रहते थे | वे दोनों भाई एक दुसरे पर जान छिडकते थे | जो बड़ा भाई था वह शादीशुदा और बच्चे भी थे | छोटा भाई अभी क्वारा ही था उनके पिता ने अपनी मोत से पहले दोनों भाई को बराबर बराबर जमीन तथा पैसे बाँट दिए थे ताकि मरने के बाद दोनों भाइयो में लड़ाई न हो |

पिता के जाने के बाद भी दोनों भाइयो में बहुत प्रेम था और वो साथ साथ ही रहते थे और एक दुसरे के खेतो में काम भी करते थे बिना किसी लोभ के | उस साल दोनों भाइयो के खेतो में बहुत अच्छी फसल हुई और दोनों ने फसल काट कर अपने गोदान में भर लिए | और दोनों भी रोज रात को उसके बाहर सोते थे उसकी रखवाली करने के लिए |

एक दिन, छोटे भाई को सपना आया की वह कितना स्वार्थी है वह अकेला है और उसका भाई शादीशुदा और दो बच्चे भी, फिर भी हम दोनों का हिस्सा बराबर है जो की गलत है | यही सोच कर वह उठा और अपने अपने हिस्से की कुछ बोरिया अपने भाई के हिस्से में रख दिए |

और उसी रात उसके बड़े भाई को भी सपना आया, वह सोचने लगा की उसका भाई उसकी कितनी मदद करता है अपना खेत भी सभालता है और मेरा भी, और यही सोच कर उसने भी अपने हिस्से की कुछ बोरिया अपने भाई के हिस्से में रख दी | दोनों भाई सुबह उठे और अपने अपने हिस्से की बोरिया गिनने लगे और दोनों हेरान हो गए की दोनों की बोरिया बराबर कैसे हो सकती है | दोनों सोचने लगे की बोरिया तो मैंने दी थी फिर बराबर कैसे हो सकती है |

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क्या रावन अभी भी जीवित है ?

बहुत पुरानी बात है एक बार दशहरे के अवसर पर राजा हरिदेव राय ने अपने सभी दरबारियों को अलग – अलग झकिया तेयार करने के लिए कहा | और एक इनाम की रकम गोषित कर दी की जिसकी भी झाकिय सबसे अच्छी होगी उसको इनाम की रकम दी जाएगी | या सुनकर दरबारियों में उत्क्स्ता बड गई और तेनाली दास और सभी साथी भी झकिया तेयार करने में जुट गई |

दशहरे का दिन आ गया | राजा ने सभी दरबारियो की झकियो का निरक्षण किया | सभी की झकिया राज्य का इतिहास और संस्कृति को दर्शा रही थी तथा कुछ झकिया राज्य के लोगो और प्रक्रतिक सोंदर्य को दर्शा रही थी | राजा को सभी की झकिया अच्छी लग रही थी सभी दरबारियों ने बहुत मेहनत की थी अपनी अपनी झकियो को अच्छा दिखने के लिए | सभी दरबारियों ने झकिया बनाई थी परन्तु राजा को तेनाली दास की झकी नहीं दिख रही थी राजा के पूछने पर किसी इ बताया की तेनाली दास दूर एक पहाड़ी पर बेठा हुआ है |

राजा उसी समय पहाड़ी की तरफ निकल पड़ा | वहा पहुच कर राजा ने तेनाली दास को एक डरावनी और कोफ्नाक मूर्ति के पास बेठा था | राजा ने उस से पूछा, “क्या यही झकी तेयार की है तुमने “

तेनाली दास ने मूर्ति से कहा, “महाराज को जवाब दो मृति, महाराज कुछ पूछ रहे है | तभी मूर्ति में से अवाज आई | हे महाराज में उसी रावन की आत्मा हु जिसको हर साल आप लोगो जलाते है | आप लोग जलाते तो है परन्तु में कभी नहीं मरता | में तो सभी के अंदर रहता हु हर वक्त | दिन प्रति दिन मेरी ताकत में वृधि हो रही है | और में अपने साथ गरीबी, भूख, दुःख, क्रोध, शोषण आदि भी लाया हु |

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जो होता है अच्छे के लिए होता है

एक बार एक सेठ अपने साथियों के साथ शिकार पर गया | वह एक हिरण के पीछे जंगल में कभी अंदर तक चला गया था और वहा जाकर हिरण उसकी आँखों के सामने से ओझल हो गया था परन्तु तब तक संध्या हो चुकी थी और वहा रास्ता भी भूल गया था | करीब करीब २-३ हफ्तों तक वह एक दुसरो को खोजते रहे | और एक दिन वो सब मिल गए और सेठ अपने पर बहुत ज्यादा क्रोधित था क्योई सब ने उसे मना किया परन्तु वह फिर भी उस हिरण के पीछे चला गया था |

परन्तु सब के मिलने पर उसके दोस्तों ने उसे समझाया और कहा “सब कुछ अच्छे के लिए होता है “ यह बात सुनकर सेठ को कुछ समझ नहीं आया वह ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहता था क्योकि वह बहुत थक चूका था | कुछ दिनों बाद कुछ काम करते हुए उसकी एक ऊँगली कट गई और यह देख कर फिर उसके दोस्त ने कहा “जो हुआ अच्छे के लिए होता है “ | इस बार यह सुनते ही वो गुस्से से लाल-पिला हो गया | उसने उसे तुरंत अपने घर से निकाल दिया | इस पर भी उसने यही कहा, “जो हुआ अच्छे के लिए हुआ |”

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सोने का कुत्ता

बहुत पुरानी बात है एक बार एक राजा ने अपनी तीनो बेटो में से किसी एक को अपना उतराधिकारी चुनने का फेसला किया और इसी के चलते उसने तीनो की परीक्षा लेने की सोची | उस राजा ने अपनेतीनो बेटो के १०० – १०० सोने की मुद्राए देकर उसने उन्हें आज्ञा दी की जो उसे एक साल के अंदर अंदर सबसे फहले सोने का कुत्ता ले कर आयगा उसे में अपना उतराधिकारी गोषित कर दुगा |

सबसे बड़े राजकुमार ने एक शहर में जा कर एक महल किराये पर लिया और अपने कुछ आदमियों को चारो दिशाओ में भेज दिया उस सोने के कुत्ते की खोज में | परन्तु सब के सब कुछ सप्ताह के बाद सभी लोग खाली हाथ आ गए | तब तक बड़े राजकुमार के सारे पैसे खत्म हो गए और वह वापिस चला गया |

वहा दूसरी तरफ दुसरे राजकुमार एक शहर में जा कर एक महाजन बनकर लोगो को सूद पर पैसे देने लगा | और जल्दी ही उसे बहुत सारे पैसे कम लिए और उसने अपने पिता को दोनों के लिए सोने का कुता बनाने के लिए सुन्हार को दे दिया |

अब बारी थी छोटे बच्चे की | वह एक शहर में गरीब समुदाय के बीच एक छोटा-सा घर लेकर रहने लगा | उसने अपना पूरा पैसा एक व्यपार में लगा दिया जिससे उसकी बहुत अच्छी कमाई हो गई की उसने बहुत से गरीब लोगो को काम पर रख लिया | उसने अपने कमाए पैसो से न सिर्फ गरीबो को काम दिया अपितु स्कुल, अस्पताल के अलावा कार्य किये | साथ ही साथ उसने गरीब लोगो को सस्ते दर पर कर्जा देना भी आरंभ कर दिया | इससे वे लोग जल्दी ही खुशहाल हो गए | बल्कि पूरा खुशहाल हो गए थोड़े दिनों में | अपने काम से संतुष्ट होकर वह अपने पिता से मिलने चल दिया |

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चालक पंडित

कशी पुर एक पंडित रहता था और वो बहुत गरीब था वह अपने परिवार के लिए बहुत मुश्किल से दो वक्त की रोटी का बंदोवस्त कर पाता था इसलिए उसकी पत्नी ने उसे सुझाव दिया की वह एक बार राजा से मिले और उनसे कुछ मदद मांगे | उसका सुझाव मानकर पंडित उसी दिन राजा के दरबार के लिए चल दिया | वह राजा से मिला और राजा ने उसके आने का कारण पूछा तो पंडित जी बोले, हे महाराज में सीधा केलाश पर्वत से आ रहा हु | वहा में भगवान शिव से मिला था | उन्होंने मेरे आप के लिए के संदेश भेजा है की उन्हें एक गाये की आवश्यकता है |

राजा बहुत चतुर था उसको शंका हुई | वह तुरंत समझ गया की गाय भगवान को नहीं उसे चाहिए किंतु वो सीधा मांगने से डर रहा है | राजा ने अपने मंत्री को कहा की पंडित जी के लिए गाय का बंदोवस्त किया जाए और राजा ने अपने मंत्री को कहा की पंडित जी को एक हजार स्वर्ण मुद्रए दे दे | मंर्त्री ने उसे गाय और एक हजार स्वर्ण मुद्रए दे दी | पंडित ने एक नजर में ही भांप लिया की गाये बहुत बड़ी थी | उसे देखा कर उसने नाटक किया और उसके चारो तरह घुमा और सिर झुका कर और अचानक वह अपने कान को गाये के पास ले गया | कुछ देर बाद वह सीधा खड़ा होकर राजा से बोला, महाराज, इस गाय ने मुझे अभी अभी बताया है की यह बहुत ही बूढी गाय है और यह भी कहा की इस आयु में अब वह दूध भी नहीं दे सकती और बछड़े को भी पैदा नहीं कर सकती है |

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