एक सियार था | एक दिन वन में उसे कुछ खाने का मिला और रात हो गई थी | जब सियार से भूख बरदाश न हुई तो वो नगर की और चल पड़ा | सर्दियों की रात थी इसलिए सभी घरो के दरवाजे बंद थे | सियार गली गली भटकता रहा |
कभी घुमने के बाद एक धोबी के घर का दरवाजा खुला था | सियार उसमे घुस गया | सामने गधे बंधे हुए थे | एक नाद में कपड़े भीग रहे थे और दुसरे नांद से गंध आ रही थी | सियार ने सोचा – “दूसरी नांद में पेट-पूजा का कुछ सामान होगा |” वह उसमे कूदा और दूसरी नांद में गिर गया | उस नांद में नील घुला हुआ था | सियार का सारा शरीर नीला हो गया | परन्तु पानी इतना ठंडा था की उसे बहुत ठंड लगने लगा और वहा से जंगल की और भागा |
झाड़ियो में जाकर वह सो गया और सुबह होते ही वह पानी पीने नाले पर गया | पानी पीते समय उसने अपनी सुरत पानी में देखी | वह बहुत खुश हुआ |
इतने में वहा और कई जानवर आए | सियार ने रोब जमाते हुए कहा – “में नीलांबर हु | भगवान ने मुझे जंगल का राजा बनाकर भेजा है |”