अमृत का छीटा

बहुत पुरानी बात है गंगा तट के किनारे ऋषि और उनकी पत्नी रहा करते थे | एक बार वे यज्ञ कर रहे थे और उनकी पत्नी देवताओ के लिए खीर बना रही थी की अचानक चुल्ले के धुएं से एक भयंकर प्रुरुष प्रकट हुआ और देखते ही देखते वह सारा खाना खा गया | यह सब देखर ऋषि को बहुत गुस्सा आया और बोले, “दुष्ट! तू कोन है जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है? शीर्घ अपना परिचय दे, वरना में तुझे अभी भस्म कर दुगा “

यह सुनकर वह डर गया और विन्रम स्वर में बोला, “हे ऋषि मेरा नाम य्ग्यधन है और में संध्या और प्राचीनबहिर्ष का पुत्र हु | पितामह ने मुझे यज्ञो का भक्षण करने का वरदान दिया है | और इसलिए में आपका यज्ञ नष्ट करने आया हु|

यह सुनकर ऋषि बोले, “य्ग्यधन | यज्ञ की रक्षा करना सभी का लोगो का धर्म है इसलिए तुम भी मेरे यज्ञ की रक्षा करो | में जनता हु की तुम यज्ञ का नाश करने वाले हो और यही तुम्हारा स्वभाव है, लेकिन फिर भी में तुम से अनुरोध करता हु की तुम मेरे यज्ञ की रक्षा करो |”

य्ग्यधन बोला, “महर्षि, प्राचीनकाल में ब्रह्मा जी ने मुझे शाप दिया था किन्तु बाद में मेरी आराधना से प्रसन्न होकर उन्होंने कहा था की जब कोई महर्षि मेरे उपर अम्रत का छीटा देगा, तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे | इसलिए हे महर्षि आप मेरा उदाहर करे |”

यह सुनकर ऋषि बोले, “य्ग्यधन! यह भला कैसे संभव हो सकता? देवताओ और देत्यो ने क्षीरसागर का मंथन कर बड़ी कठिनाई से अम्रत प्राप्त किया था | वह मुझे कैसे प्राप्त हो सकता है ? यह एक असम्भव कार्य है, इसलिए तुम कोई और वस्तु मांग लो”

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फिर भी रहा गधे का गधा ही

एक गाँव में एक पाठशाला थी उस गाँव के पंडित जी उस गाँव के बच्चो को पढ़ाया करते थे | एक दिन की बात है पंडितजी बच्चो को किसी बच्चे की शरारत करने पर गुस्सा कर रहे थे की तुम जैसे गधो को में आदमी बना दिया है | तो तुम क्या चीच हो |

उसी समय वहा से एक घोबी जा रहा था अपने गधे के साथ | उस धोबी का कोई बच्च नहीं था | उसने सोचा अगर यह सत्य है की पंडित जी गधे को आदमी बना देते है हो क्या वो मेरे इस गधे को भी आदमी बना देगे क्या? मेरे बुढ़ापे का सहारा हो जायगा |

शाम होते ही घोबी अपने गधे को साथ लेकर पंडित जी के पास ले गया और बोला, “पंडित जी मेरा कोई बच्चा नहीं है क्या आप मेरे इस गधे को आदमी बना दोगे क्या?”

यह सुनकर पंडित जी हेरान रह गए और बोले, “तुम पागल तो नहीं हो, क्या गधा भी आदमी बन सकता है | “

घोबी ने पंडित जी के पांव पकड़ लिए और बोला, “पंडित जी आप को जो चाहिए में आप को दे दुगा, परन्तु कृपा करके इस गधे को आदमी बना दो | मुझे पता है आप कर सकते हो क्योकि में अपने कानो से सुना है की आप बच्चो को कहे रहे थे की तू जैसे गधो को आदमी बना दिया है |”

पंडित जी पूरी बात समझ गए और उसे भी समझाने लगे की ऐसा नहीं हो सकता है परन्तु वो समझ ही नहीं रहा था | कुछ देर बाद पंडित जी समझ गए की इस गधे को समझाना असंभव है | कुछ देर बाद पंडित जी बोले, “अच्छा ठीक है, पर देख लो, इस काम के पांच सो रुपे लगेगे और तिन महीने का वक्त भी |”

यह सुनकर घोबी खुश हो गया और बोला, “ठीक है पंडित जी में अभी घर जा कर पैसे ले कर आता हु |”

थोड़ी देर बाद घोबी पैसे ले आ गया और पंडित को दे दिया | पंडित जी पैसे अपनी जेब में रख लिए और बोले, “अब तुम जाओ और ठीक तीन महीने बाद आ जाना |”

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दो व्यापारी का झगड़ा

बीरबल अकबर के बहुत करीब थे और सभी चाहने वाले लोग अक्सर उनके पास आया करते थे सलाह मशुवरा करने | एक दिन दो व्यापारी उनके पास अपना झगड़ा सुलझाने गए और बीरबल उनका झगड़ा निपटाने की कोशिश कर रहे थे | बीरबल ने पहले व्यापारी से पूछा, “रमेश तो तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं … Read more

कैसे मिला व्यापारी को उसका खोया घोडा

एक व्यापारी घोड़े पर सामान लाद का दूर दूर शहरों में जाकर उसे बचे करता था | एक बार की बात है वह हमेशा की तरह अपने घर से निकला सामान बेचने के लिए | थोड़ी दूर चलने के बाद वह थक गया था और एक पेड़ के निचे आराम करने लगा और अपने घोड़े को भी पेड़ से बांध दिया | आराम करते करते उसकी आंख लग गई और बह सो गया और जब उसकी आंख खुली तो उसने देखा की उसका धोड़ा वहा नहीं है | वह बहुत परेशान हो गया था वह इधर उधर देखने लगा परन्तु उसे कही न मिला |

वह बहुत परेशान हो गया | थोड़ी देर में उसे थोड़ी दूर एक लड़का दिखा | उसने उस लडके को बुलाया और पूछा, “बेटा क्या तुमने यहाँ किसी को एक घोडा ले जाते देखा है |”

लड़का बोला, “वोही न जो उस पेड़ से बंधा हुआ था | जो सफेद रंग का था |” यह सुनते ही व्यापारी खुश हो गया और बोला, “क्या तुम्हे पता है वह कहा है |”

लड़का बोला, “नहीं मुझे नहीं पता, “

व्यापारी बोला, “क्या तुम्हे नहीं पता, पर तुमने तो उसे देखा है | मुझे बताओ में तुम्हे इनाम दुगा |”

लड़का जोर दे कर बोला, “मैंने आप को कहा न की मैंने उसे नहीं देखा |”

व्यापारी को गुस्सा आ गया और बोला, “मुझे लगता है की तुमने ही मेरा घोडा चुराया है और अब तुम ने उसे छुपा दिया है | “

दोनों में बहस हो गई और फिर व्यापारी बोला, चलो मेरा साथ | अब तुम्हारा फेसला काजी साहब ही करेगे |

दोनों व्यापारी के पास चल पड़े | काजी के पास पहुच कर, व्यापारी ने सारी बात उसे बताई |

काजी ने सारी बात सुनकर उस लकड़े से पूछा, “लडके कहा है इनका घोडा |”

लड़का बोला, “काजी साहब, मेने इनका घोडा देखा ही नहीं तो चुराने की तो बात ही बहुत दूर है | “

अब काजी साहब बहुत अजीब परेशानी में पड़ गए | उन्हें समझ नहीं आ रहा था की जुट कोन बोल रहा है | काजी साहब ने लडके से पूछा, “अच्छा एक बात बताओ, जब तुमने उसे देखा नहीं तो तुम्हे उस घोड़े के बारे में इतना कैसे पता |”

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कैसे मिला सोनू का नया जीवन

एक गाँव में एक लड़का रहता था जिसका नाम सोनू था उसे जरा भी मेहनत करने की आदत नहीं थी | वह सारा दिन मन्दिर के बाहर बेठ कर भीख ही मांगता रहता था और मन्दिर में आने जाने वालो से भीख मांग का अपना जीवन व्यतीत करता था |

सर्दियों के दिन थे सुबह का समय था और ठंडी हवा चल रही थी | उस दिन मंदिर में लोगो का आना जाना बहुत कम था सोनू ने सोचा आज ठंड बहुत लोग भी काम आ रहे है क्यों न कही और जा कर बेठ जाऊ जहा में ठंड से बच सकू | सही सोच कर वह मंदिर के पास एक छज्जे था वहा जा कर बेठ गया |

सोनू को बहुत ज्यादा ठंड लग रही थी और जोर से जोर चिल्लाकर – चिल्लाकर राहगीरों से कहा रहा था, “भगवान के नाम पर कुछ दे दो, दो दिनों से मेने कुछ नहीं खाया | कोई कुछ तो दे दो, मेरे बढ़े माँ-पाप भेखे है |

जो थोड़े बहुत लोग थे वो कुछ न कुछ उसे दे देते | वही दूर खड़े एक महात्मा उसे देख रहे थे | वह सोनू के पास आए और बोले, “क्या नाम है तुम्हारा और तुम भीख क्यों मांग रहे हो?”

सोनू बोला, “मेरा नाम सोनू है और में बहुत ज्यादा गरीब हु | मेरे पास कुछ भी नहीं है | अगर में भीख नहीं मागुगा तो क्या खाउगा |”

महात्मा बोले “सोनू क्या सच में तुम्हारे पास कुछ नहीं है |”

यह सुनकर सोनू, “जी सच में मेरे पास कुछ नहीं है |”

महात्मा बोले, “तुम झूठ क्यों बोल रहे हो” |

सोनू बोला, “महाराज में झूठ क्यों बोलू गा, सच में मेरे पास कुछ भी नहीं है |”

यह सुनते ही महात्मा बोले, “तो ठीक है, में तुम्हे १०० रुपे देता हु और इसके बदले तुम मुझे अपने दोनों हाथ दे दो, बोलो ठीक है |”

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तीन मूर्तिया का राज

बीरबल बहुत दिनों से दरबार नहीं गए थे और इसी मोके को देख कर बाकि दरबारियों ने बादशाह अकबर के कान भरना शुरू कर दिया जैसे बीरबल ने बादशाह के साथ बगावद की है, बीरबल गद्दार है, और बहुत कुछ कहा |

जब बीरबल वापिस दरबार आए तो बादशाह अकबर ने बीरबल से इस आरोपों के बारे में कोई बात नहीं की | लेकिन बीरबल ने महसूस कर लिया था की कोई न कोई बात तो है क्योकि बादशाह अकबर उनसे सही से बात नहीं कर रहे थे और उनके दिमाग में उसके प्रति अविश्वास और संदेह पैदा हो रहा था और इसी के चलते वब दरबार भी काम आने लगा था |

समय बीतता गया | अकबर को अपने चतुर और समझदार सलाहकार की याद आने लगी | एक दिन की बात है एक कारीगर बादशाह के लिए बहुत ही खास सोने से बनी तीन एक जैसी मूर्तिया लाया |

बादशाह अबकर को बहुत पसंद आई तीनो मूर्तिया परन्तु तभी कारीगर बोला, बादशाह, ये पूरी तरह एक जैसी नहीं है | इनमे से एक बाकि दोनों से बहतर है | लेकिन इनमे फर्क्र जानने के लिए बहुत तेज और पेनी नजर और दिमाग जाहिए |

तीनो मूर्तिया सभी दरबारियों को दिखाई गई | लेकिन न तो कोई दरबारी और न ही बादशाह अकबर उनमे कोई फर्क बता न सके |

बादशाह अकबर बोले, “अब सिर्फ्र एक ही आदमी इसमें फर्क बता सकता है जाओ जा कर बबीरबल को बुलाओ |”

कुछ देर बाद बरिबल दरबार में आए और बादशाह को सलाम किया | अकबर ने मन ही मन सोचा, “यह आदमी धोखेबाज कैसे हो सकता है क्योकि इसे देखते ही हमारा मन खुश हो जाता है |”

अकबर ने बीरबल से कहा, “बीरबल इन मूर्तियों को देखो और बताओ की इन तीनो मूर्तियों में क्या फर्क है या है भी नहीं |”

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काला पानी – एक कहानी क्रांतिकारियों की

गूंजती है आज भी इन दीवारों में
चीत्कार उन केदियो की
भारत माता को मुक्त करने की कसम ले
चढ़ गए जो फँसी पर बिना किसी शिकन के |

उर्म केद हुई उन काली कोठरियों में
हंस का खा गए वो गोलिया सीने में
इन्ही सलाखों के पीछे
काट दी उन्होंने अपनी जिंदगानी बिना किसी परेशानी के
जिए थे वे एक ही माँ के लिए
और मरे भी थे एक माँ के लिए
उस माँ के लिए मरना था सोभाग्य की नोशानी |

लिख गए अपने रक्त से वो
इस काला पानी की काली कहानी
होंसले न कभी डगमगाए
बेत और कोड़े खा कर भी
आंसू न आए आँखों ने जिनकी

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नारी के रूप अनेक

तुम्हे तम्हारा अस्तित्व देने वाली नारी है |

तुम्हारा परिवार शुरू करने वाली नारी है |

निस्वार्थ सेवा करने वाली भी नारी है |

मन्दिरों की मूर्तियों में भी नारी है |

 

बचपन में यही तुम्हारा घर सजाती है |

तुम्हारे आगन की रोनक बढ़ाती है |

तुम्हे अभिमान करना सिखाती है |

फिर उम्र का नया पड़ाव आता है |

पराये धन होने का उसे मतलब बताता है |

 

फिर वो ही नारी शादी का बंधन बनाती है |

वो ही नारी पत्नी का भी कर्तव्य निभाती है |

जिन्दगी के नए अनुभव सिखाती है |

माँ बन नई जिन्दगी को जन्म देती है |

फिर जिन्दगी ने ली करवट |

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सिखों के पहले गुरु – नानक देव जी – Part 3

सुन 1497 सन 28 वर्षीय गुरु नानक अपनी पहली लम्बी यात्रा पर निकल पड़े | इस दोरान उन्होंने सत करतार का प्रचार किया और संपूर्ण उतर भारत में भुमते रहे | इस दोरान उन्होंने लाहोर, सेयदपुर करनाल, पानीपत, हरिद्वार, म्हनू का टीला (दिली), मथुरा, बनारस, पटना जैसे स्थानों में जाकर लोगो को सच्चे मार्ग पर चलने का उपदेश दिया |

एक बार की बात है नानक जी हरिद्वार में कुछ पडितो को गंगा जी की धारा में खड़े होकर सूर्य को जम अर्पित कर रहे थे | यह देख कर गुरु नानक ने उनसे पूछा, “अप्प लोग यह क्या कर रहे हो?”

तब उन्होंने उतर दिया, “हम लोग अपने पूर्वजो को जल अर्पित कर रहे है | सूर्य को दिया हुआ जल सीधा हमारे पूर्वजो को लगता है | और यह सुनते ही नानक जी अपने सारे कपड़े उतार दिए और गंगा जी में कूद पड़े और पशिचम दिशा में खड़े होकर जल देने लगे | वहा खड़े लोगो ने पूछा महाराज सूर्य इधर है आप गलत जगह पत जल अर्पित कर रहे हो | नानक जी बोले में अपने खेतो को जल दे रहा हु अभी आप ने ही तो कहा है की ऐसा जल देने से उनको जल पहुच जाता है जिसको आप देना चाहते हो इसलिए में अपने खेतो को दे रहा हु | यह सुनकर सभी हंस पड़े और बोले ऐसा थोड़ी न होता है | ऐसा जल कैसे पहुच सकता है | यह सुनकर गुरु नानक जी हस पड़े बोले, “तुम भी तो यही कर रहे हो, सूर्य को जल देने से यह जल कैसे उन तक पहुच सकता है |”

यह बात सुनकर उन सभी लोगो को अपनी गलती का अहसास हुआ और गुरु नानक जी के शिष्य बन गए |

जो गुरु नानक को अपना अंत समय निकट आया तो उन्होंने सारी सिख संगत को बुलाया और फिर उन्होंने भाई लहना के हाथ ने पांच पैसे और एक नारियल रखा और उनके माथे पर तिलक लगाकर उने अपनी गद्दी सोंप दी | फिर वे संत संगत को सबोधित करके बोले, “आज से भाई लहना आप सबके गुरु है | आज से ये गुरु आनंद देव कहलायेगे |”

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भगवान सब देखता है

बहुत पुरानी बात है | एक बहुत प्रसिद गुरुकुल था | दूर दूर के गाँवो से बच्चे वहा पड़ने आते थे | आश्रम में जो गुरु थे वो भी बहुत विद्वान और यशस्वी थे |

एक दिन की बात है आचर्य ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और कहा, “प्रिये शिष्यों, मेने तुम्हे आज एक विशेष कार्य ले लिए यहाँ पर बुलाया है | शिष्यों मेरे सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ पड़ी है | मेरी पुत्री विवहा योग्य हो गई है और मेरे पास उसके विवहा करने के लिए घन नहीं है | मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है की में क्या करू?”

उन सभी शिष्यों में से कुछ शिष्य धनि परिवार में से थे और वो आगे बढ़ के बोले, “गुरुदेव अगर आप की आज्ञा हो तो हम अपने घर में से ले आते है धन और फिर आप अपनी पुत्री का विवहा कर देना |

आचर्य बोले,” अरे नहीं अरे नही वत्स, ऐसा नहीं हो सकता है |”

शिष्य बोले, “गुरुदेव ऐसा क्यों नहीं हो सकता, आप उसे हमारी तरफ से गुरु दक्षिणा समझ लेना”

इस पर गुरुदेव बोल, “नहीं वस्त, तुम्हारे घर वाले सोचेगे की तुम्हारे गुरु लालची हो गए है | वो धन ले कर विध्या देते है |”

सभी शिष्यों ने पूछा,” फिर क्या किया जाए गुरुदेव, जिस से आप की पुत्री का विवहा हो सके” | गुरुदेव कुछ देर सोचने के बाद बोले, “हा एक तरीका है | ऐसा करो तुम धन ले कर तो आओ परन्तु मांग कर नहीं | इस तरह से लाओ की किसी को पता न चल सके |”

उनमे से कुछ शिष्य बोले, “गुरुदेव परन्तु हमारे माता-पिता के पास तो नहीं है |”

“कुछ भी ले कर आओ अपने घरो में से परन्तु ध्यान रहे की किसी को पता न चले वरना मेरे श्रम से मर जाऊगा |”

यह सुन कर सही शिष्य अपने अपने घर की तरफ चल पड़े | अगले दिन से ही सभी शिष्य अपने अपने घरो में से कुछ न कुछ लाना सुरु कर दिया | और कुछ ही दिनों में आश्रम में बहुत सारी सामग्री इकठी हो गई |

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