मजाक उड़ाना पड़ा मंहगा

बहुत पुरानी बात है एक बार एक कछुआ तलाब में पानी पी कर जा रहा था की वहा बेठा एक खरगोश उसकी मंद गति को देख कर हसने लगा | यह देख कर कछुए को बहुत बुरा लगा और उसने खरगोश को दोड के लिए चुनोती दे डाली |

खरगोश ने ख़ुशी ख़ुशी दोड की चुनोती स्वीकार की | अगले ही दिन यह दोड होनी थी | सुबह – सुबह दोनों अपने – अपने समय पर आ गए और दोड सुरु हो गई | खरगोश आरंभ से ही बहुत आगे निकल गया था | थोरी दूर आगे जा कर वो उब गया था दोड़ते दोड़ते | उसने सोचा क्यों न थोड़ी देर आराम कर लिया, वैसे भी कछुआ बहुत पीछे रह गया है | वह सोचने लगा में तो बहुत तेज दोड़ता हु | यह सोचते हुआ सो गया क्योकि उसे कछुए की कोई चिंता न थी |

कछुआ अपनी मंद गति से चलता रहा बिना रुके,लगातार चलता रहा तथा सोए हुए खरगोश को पीछे छोड़कर चुपके से आगे निकल गया और लक्ष्य पर जा पहुचा |

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दादी माँ की समस्या

सोनू पांचवी कक्षा में पड़ता था | गर्मियों की चुतियो में वह अपनी दादी की पास रहने गया | गाँव में कई बाग थे आमो के | सोनू को आम खाने बहुत पसंद थे | लेकिन सोनू को सबसे ज्यादा मज़ा आमो के पहरेदारो को बेकूफ बनाने में आता था | बेवकूफ बनाने के बाद वह अपने दोस्तों के साथ आमो के बाग़ में गुस जाते और जम कर आमो का मजा करते |

सोनू की दादी माँ उसकी शेतानियो से बहुत तंग थी | उन्होंने सोनू को समझाने की बहुत कोशिश करती परन्तु वह सुनी अनसुनी कर देता था | गाँव के पास बहुत बड़े ऋषि मुनि रहते थे | उसकी दादी एक दिन उन्ही ऋषि के पास गई और वहा जा कर उन्होंने साडी कहानी ऋषि को सुनाई और ऋषि ने उन्हें अगले दिन आने को कहा | अगले दिन दादी फिर से ऋषि के पास गई परन्तु उस दिन भी ऋषि ने उन्हें अगले दिन आने को कहा | लगभग १० दिनों तक ऐसा ही चलता रहा | दादी को बहुत गुस्सा आ रहा था परन्तु को चुप चाप थी | और दसवे दिन ऋषि ने कहा, “कल अपने पोते को मेरे पास ले कर आना | अब में उससे बात करुगा|” यह सुनते ही दादी को गुस्सा आ गया और बोली महाराज यह बात आप मुझे पहले दिन भी बोल सकते थे | इसकेलिय आपन ने दस दिन ले लिए |

यह सुनते ऋषि मुस्कराकर बोले, “माँ आप बिलकुल ठीक कहा रही था लेकिन जो काम न करने में स्वंय मुझे कठिनाई हो रही हो उस काम को न करने की सलाह में आपके पोते को कैसे दे देता |” दादी यह सुनकर चोंक गई, उसने बहुत चकित हो कर पूछा, “मुनिवर में समझी नहीं” |

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पेड़ो को भी दर्द होता है

एक गाँव में एक सोनू नाम का एक लड़का रहता था | यह पढाई में बहुत अच्छा था परन्तु साथ ही साथ बड़ा ही लापरवाह और शरारती था | इसी कारण से अध्यापक और माता – पिता से डाट पडती रहती थी | इसके चलते वह सभी से नराज भी रहता था | पर उसे अपना गुस्सा बाहर निकालना भी अच्छी तरह आता था | वह अपने दोस्त मोनज के साथ खेतो में चले जाता और वहा पर वो अपने दोस्त के साथ गेम्स खेलता | कभी अध्यापक – अध्यापक, कभी गीली – डंडा, कभी पेड़ पोधो को मरता काटता | सभी तरीका था उसका अपने गुस्से को बाहर निकालने का | वे दोनों अँधा दुन्ध पेड़ पोधो को कटते की वो बे जुबान मर जाते थे, उनके फल फूल भी सभी नष्ट हो जाते थे |

उन दोनों के सभी मित्रो ने उनको समझया की ऐसा न किया करे परन्तु वो दोनों कहा किसी की सुनते | वे उनसे बार बार क्दते की पोधो को मारना या तोडना अपराध है | उन दोनों की शरारते बहुत ज्यादा बड चुकी थी | एक दिन सोनू ने अपने सहपाठी को सीढियों से धक्का दे दिया जिससे उसकी दोनों टांगे टूट गई और उसको उसी समय अस्पताल ले जाना पड़ा | उस दिन उसके अध्यापक पर उसके माता-पिता ने उसे खूब पिटा डंडो से | इस पिटाई के कारण उसके हाथो पर बहुत ज्यादा निशान पड़ गए और बहुत देर तक उनमे दर्द भी बोता रहा | सोनू कही घंटो तक रोता रहा और दर्द होते रहा |

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क्या है योगी का कर्तव्य

यह कहानी तब की है जब पुणे में महामारी ने अपना भीषण प्रोकोप फेला रखा था दिन प्रतिदिन बहुत से लोग मारे जा रहे थे इस बीमारी से | सभी लोग इतने डर चुके थे की कोई भी किसी की मदद नहीं कर रहे थे | यहाँ तक की अगर किसी परिवार के सदस्य को भी बीमारी हो जाती तो भी उसे मरने के लिए छोड़ देते थे |

उन्ही दिनों वहा से थोरी ही दूर पर एक ऋषि रहा करते थे जो सभी की मदद किया करते थे | और उस वक्त वो ऋषि लोगो के लिए रौशनी की एक किरण बनकर आए | वो सभी को समझाते थे की किसी को भी बिच मझधार में न छोड़े, सभी की मदद करे | यह सिद करने के लिए उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था | तथा वो जो कहते वो करते भी थे व् अपना आश्रम छोड़ कर पुणे में आ कर रहने लगे और रोगियों की मदद करने लगे | यह देख कर उनके सभी शिष्य भी उनके साथ सभी रोगियों की मदद करने लगे | स्वामी जी ने अपने सभी शिष्यों को आज्ञा दी की सभी एक – एक गाँव का भर सभाल ले ताखी हम सभी एक बीमारी को जड से ख़तम कर सके |सभी शिष्यों ने स्वामी जी की बात का पालन किया | परन्तु उन में से कुछ योगी डर रहे थे और उनके मन में कुछ संकाए भी थी | लेकिन वो डर रहे थे स्वामी जी से पूछने में| पंरतु उनमे से एक योगी ने हिमत करके स्वामी जी से पूछा, “हे स्वामी जी हम लोग योगी है हम लोगो ने एक जगत को छोड़ दिया है, फिर हम इन लोगो की मदद क्यों करे ? जबकि ये लोग अपनी मदद खुद नहीं करना चाहते |

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कैसे मिला खोया जहाज

यह कहानी उस वक्त की है जब लोग लम्बी यात्राए अधिकतर समुंद्री जहाजो से करते थे | ऐसा ही एक जहाज एक लड़का जिसका नाम दिनेश था अपने मामा के साथ सफ़र का रहा था | वह जहाज के सभी यात्रियों का चहेता बन गया था क्योकि वह अकेला लड़का था उस जहाज पर | दिनेश सारा दिन उस जहाज के एक कोने से दुसरे कोने में घूमता रहता था |

जहाज को बन्दरगाह से चले अभी १० दिन ही हुए थे की रस्ते में बर्फीली हवाए चलने गई थी | दिन-पर-दिन हवाए तेज होती गई और कुछ ही दिनों में हवाओ ने एक भयंकर तूफान का रूप ले लिया था अब तो तूफान के साथ साथ बारिश भी होने लग गई थी | अब दिनेश सारा दिन अपने ही कमरे में रहता था | खराब मोसम के कारण सभी यात्री धीरे धीरे बीमार पड़ने लग रहे थे और कुछ की तो मोत भी हो गई थी परन्तु न तो तूफान रुका और न ही बारिश रुकी | यात्रियों का मरना रुक नहीं रहा था | जहाज के कप्तान ने सारी कोशिश कर ली परन्तु कही से कुछ मदद नहीं मिल पा रही थी क्योकि जहाज के वायरलेस ख़राब हो चुके थे |

अब जहाज पूरी तरह से सुमुंदर में खो चूका था और आस पास कोई मदद करने के लिए भी कोई नहीं था | ऐसा लग रहा था की अगले २-३ हफ्ते तक ये तूफान रुकने वाला न था | अब तो जहाज पर तेल और खाने पीने की भी कमी होने लगी थी धीरे धीरे देखते जहाज के संही यात्री मर चुके थे | अब अकेला दिनेश ही रह चूका था | तूफान के कारण वो अपने कमरे से बहरा भी नहीं निकल पा रहा था | अब जहाज पर उसके अलावा और कोई न था | और अचानक एक चमत्कार हुआ | मोसम अब सुधर रहा था और समुद्र भी शांत हो चूका था |

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तीर्थ यात्रा का रहस्य

बहुत पुरानी बात है | एक बार एक ऋषि तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे की अचानक उनकी आँख लग गौ और उन्होंने एक सपना देखा | उन्होंने ने अपने सपने में २ देवताओ को आपस में बात करते सुना | पहला देवता कहता, “आज कल तो सभी लोग तीर्थ यात्रा पर जाते है किंतु किसी को परमात्मा का आशीर्वाद नहीं मिलता, विरले ही होते है जिनको परमात्मा का आशीर्वाद मिलता है |” दूसरा देवता कहता, “हा जैसे रमेश को मिला था वो हरिद्वार में गंगा के किनारे रहता है | परमात्मा का आशीर्वाद पाने के लिए जरूरी नहीं की तीर्थ यात्रा करे |”

इतना सुनते ही ऋषि की नीद टूट गई वो हरिद्वार की तरफ निकल पड़े रमेश की तलाश में | ऋषि उस रमेश से जानना चाहते थे की उसे परमात्मा का आशीर्वाद कैसे मिला | उन्हें बहुत वक़्त लगा रमेश की तलाश करने में | पर जब मिले तो उसे देख कर वो बहुत ही हेरान हुए क्योकि वो बहुत ही गरीब था मुस्किल से दो वक़्त की रोटी की कमा पता था |

ऋषि ने बहुत ही उत्क्स्ता से रमेश से पूछा, “की कभी तुम ने तीर्थ यात्रा की है या नहीं” यह सुनकर रमेश ने उत्तर दिया, “हे महात्मा में तीर्थ यात्रा कैसे कर सकता हु, में तो बहुत गरीब हु, मुस्किल से दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता हु | में तीर्थ यात्रा कैसे कर सकता हु | हा पर मेने एक बार बहुत कठिन से तीर्थ यात्रा के लिए पैसे जमा किये थे परन्तु जा नहीं सका था |”

ऋषि ने बड़ी उत्कास्ता से पूछा, “पर क्यों” |

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दिनेश ने कैसे सीखा धंधे का गुर

एक शहर में एक हरीश नाम का आदमी रहता था जो की बहुत गरीब था वह अपने परिवार का पालन पोषण बहुत मुस्किल से करता था | उसके घर में उसकी बीवी, एक बेटा और एक बेटी थी | हरीश एक ईमानदार इन्सान था वो अपने बेटे को भी ईमानदार बनान चाहता था और उसके लिए वो हर कोशिश करता था | उसका बेटा अब बड़ा हो गया था और उसके हाथ बटाने योग्य भी हो गया था | हरीश ने अपने रिश्तेदारों से पैसे उधर पर ले कर अपने बेटे को एक जूते की दुकान खोल कर दी शहर में ही | दिनेश बहुत मन लगा कर वहा पैर काम करता था और जूते बेचता था |

पूरा शहर जनता था की दिनेश अपने पिता की ही तरह बहुत ईमानदार है | तब भी दुकान खुलने के एक सप्ताह तक वो कोई जूता न बेच सका | दिनेश बहुत उदास था क्योकि उसको पता था की उसके पिता ने किस तरह से उसको यह दुकान खोल कर दी है | उसने इस बारे में अपने पिता से बात की | हरीश ने बहुत विनर्ता से अपने को कहा, “चिंता मत करो में तुम्हारी मदद करुगा “| अगले ही दिन हरीश भी अपने बेटे के साथ पूरा दिन उसकी दुकान पर रहा | पूरा दिन बीतने के बाद हरीश ने अपने बेटे दिनेश से कहा, “बेटा तुम केवल ईमानदारी के बूते पैर जूते नहीं बेच सकते | तुम्हे यह सीखना होगा की ग्राहक को कैसे खुश किया जाता है|” दिनेश अपने पिता का इशारा समझ गया |

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दान का रहस्य

एक बहुत बड़ा राजा था परंतु उस राजा के बुरे दिन आ गये थे क्योकि उसके पड़ोसी राजा ने उस पर हमला कर दिया और मजबूरी में उसने अपनी पत्नी और बच्चे सहित अपने राज्य से भागकर जंगल में शरण लेनी पड़ी | राजा बहुत ही दयालु और दानी था उसके यहाँ से कोई भी खाली हाथ नहीं जाता था और सही सोच कर राजा और रानी अपने दिन बिता रहे थे की कोई न कोई उनकी मदद करने जरुर आयगा | परन्तु स्थिथि बहुत ही जायदा ख़राब हो रही थी | यहाँ तक की उनके भूखे मरने की नोबत आ गई थी |

राजा दिन प्रति दिन शहर जाता, काम की तलश में परंतु उसे कही काम न मिला | एक दिन भाग्यवश उसे काम मिल गया | और ख़ुशी ख़ुशी कुछ राशन ले कर अपनी पत्नी और बच्चो के पास पहुचा | रानी ने सभी के लिए खाना बनाया और खाने ही लगे थे की उनके पास एक महात्मा उनके घर आ गए | जैसे की राजा और रानी बहुत दानी थे उन्होंने अपने अपने हिस्से का खाना महात्मा को दे दिया |

महात्मा के खुश हो कर राजा को एक सेठ के बारे में बताया की वो पुण्यो के बदले पैसा देता था | यह सुनकर राजा अगले ही दिन शहर चला गया अपने पुण्यो के बारे में बताने ताकि उसको कुछ पैसे मिल सके | राजा ने अपने सारे पुण्ये की एक सूची सेठ को दे दी | जब सेठ ने यह सूची तराजू के एक पलड़े में रखी तो भी दोनों पलड़े बराबर ही रहे | यह देखकर सेठ ने राजा के कहा, “लगता है तुम्हारे पुण्यो में मेहनत और बलीदान शामिल नहीं थे | किसी ऐसी वस्तु की यद् करो जिसकी तम्हे बहुत आवश्कता थी, किंतु फिर भी तुम ने उस को दान में दे दिया था |

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लालची सेठ

बहुत पुरानी बात है एक गाव में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था | वह एक दिन कही जा रहा था की अचानक उसका बटुआ गली में खो गया तो उसने पुरे गाव में घोषणा करवा दी की उसके बटुए में पांच हजार रुपे थे और जो उसे लोटा देगा, वह उसे पांच सो रुपे के इनाम में देगा |

उसी दिन संध्या के समय एक बुढिया को उस सेठ का बटुआ मिल गया और वह उसे लेकर फोरन सेठ के पास आई | लेकिन सेठ को लालच आ गया और उसने पूरा का पूरा पैसा खुद रखने की ठान ली | इसलिए उसने बुढिया से कहा की उसके बटुए में पांच हजार पांच सो रुपे थे और उसने पांच सो रूपये पहले ही रख लिये है | पर बुढिया को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी और वो सीधा राजा के पास चली गई | उस बुढिया ने राजा को सारी बात बताई और बोली, “हे महाराज अगर मुझे पैसे लेने ही होते तो में सारे पैसे रख लेती न की पांच सो रुपे रख कर बाकि वापिस करती |

बुढिया की पूरी बात सुन कर राजा को शक हुआ की सेठ बुढिया को दोखा दे रहा है | इसलिए राजा ने सेठ को एक सबक सिखाने के लिए सेठ से कहा, “में समझता हु की ये बटुआ तुम्हारा नहीं है क्योकि इसमें सिर्फ पांच हजार रुपे है ने की पांच हजार पांच सो |

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दया करना कभी निष्फल नहीं जाता

बहुत पुरानी बात है एक जंगल बहुत ग्रीषम ऋतू के दिन चल रहे थे | एक दिन दोपहर का समय एक शेर एक छायादार पेड़ के नीचे दो रहा था | उसी पेड़ के पास ही एक चुहिया का घर था | अचानक ही वह अपने घर से बाहर आई तो उसने शेर को वहा सोते हुए देखा |

यह देख कर उसे एक शरारत सूझी | उसने सोते हुए शेर के ऊपर कूदकर उसे जगा लेने की सोची | परन्तु हुआ बिलकुल उल्टा | शेर की नीद टूट गई और उसने उसे अपने पंजे में पकड़ लिया | वह उसे मर कर खाने की सोच ही रहा था की इसने में वह गिडगिडा कर बोली, “आप बहुत महान हो, मेरे प्राण बख्श दीजिए हुजुर | एक न एक दिन में इस दया का बदला अवश्य चूकाउगी |”

यह बात सुन कर शेर को उस चुहिया पर दया आ गई और उसने उसे छोड़ दिया | और कुछ दिनों बाद जंगल में एक शिकारी आ गया और उसने शेर को पकड़ने के लिए एक जाल बिछा दिया और दुर्भाग्य से शेर उस जाल में फस गया | शेर जोर जोर से दहाड़ने लगा मदद के लिए |

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