लालची सेठ

बहुत पुरानी बात है एक गाव में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था | वह एक दिन कही जा रहा था की अचानक उसका बटुआ गली में खो गया तो उसने पुरे गाव में घोषणा करवा दी की उसके बटुए में पांच हजार रुपे थे और जो उसे लोटा देगा, वह उसे पांच सो रुपे के इनाम में देगा |

उसी दिन संध्या के समय एक बुढिया को उस सेठ का बटुआ मिल गया और वह उसे लेकर फोरन सेठ के पास आई | लेकिन सेठ को लालच आ गया और उसने पूरा का पूरा पैसा खुद रखने की ठान ली | इसलिए उसने बुढिया से कहा की उसके बटुए में पांच हजार पांच सो रुपे थे और उसने पांच सो रूपये पहले ही रख लिये है | पर बुढिया को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी और वो सीधा राजा के पास चली गई | उस बुढिया ने राजा को सारी बात बताई और बोली, “हे महाराज अगर मुझे पैसे लेने ही होते तो में सारे पैसे रख लेती न की पांच सो रुपे रख कर बाकि वापिस करती |

बुढिया की पूरी बात सुन कर राजा को शक हुआ की सेठ बुढिया को दोखा दे रहा है | इसलिए राजा ने सेठ को एक सबक सिखाने के लिए सेठ से कहा, “में समझता हु की ये बटुआ तुम्हारा नहीं है क्योकि इसमें सिर्फ पांच हजार रुपे है ने की पांच हजार पांच सो |

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मतलबी भेड़िया

एक दिन भेड़िया मजे से मछली खा रहा था की अचानक मछली का कांटा उसके गले में अटक गया | भेड़िया दर्द के मारे चीका-चिलाया | वह इधर-उधर भागता फिरा | पर उसे चेन न मिला | उससे न खाते बनता था न पीते बनता था |

तभी उसे नदी किनारे खड़ा एक सारस दिखाई दिया | भेड़िया सारस के पास गया | भेड़िया की आँखे में आसू थे | वह गिडगिडा कर बोला, “सारस भाई, मेरे गले में कांटा अटक गया है | मेरे गले से कांटा निकल दो | में तुम्हारा अहसान कभी न भुलुगा | मुझे इस दर्द से छुटकारा दिला दो |

सारस को भेडिये पर दया आ गई | उसने अपनी लंबी चोंच भेडिये के गले में डाली और कांटा निकाल दिया | भेडिये को बड़ा चेन मिला | सारस बोला, भेडिये भाई मेने आप की मदद की है अब आप मुझे कुछ इनाम दो |

इनाम की बात सुनते ही भेडिये को गुस्सा आ गया | सारस की अपने बड़े-बड़े दांत दिखाते हुए बोला, “तुझे इनाम चाहिए? एक तो मेरे मुंह में अपनी गंदी चोंच डाली | मेने सही – सलामत निकल लेने दी | और अब इनाम मांगता है | जिंदा रहना चाहता है तो भाग जा यंहा से इनाम मांगता है |”

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बेलो की नासमझी

बहुत समय की बात है, जंगल में चार बेल रहते थे | उनका आपस में बहुत प्रेम था | वे आपस में घूमते, साथ खाते पीते और कभी भी झगड़ा नहीं करते थे | उसी जंगल में शेर भी रहता था | बेलो को देखकर वह उन्हें खाने के लिए नए नए उपाय करता, ताकि वह उन्हें खा सके | पर उन चारो को एक साथ देख कर निराश हो जाता था |

और एक दिन उसने चारो बेलो को लड़ाने का उपाय सोच लिया | वह उन चारो बेलो के पास जाकर इधर-उधर घुमने लगा | बेल उसे अपने इतने पास घूमता देखकर डर गए | घबराहट के कारण वे एक दुसरे से अलग हो गए | बस शेर को तो इसी मोके की तलाश में था | वह बारी-बारी से एक-एक बेल के पास गया और उनके कान में कुछ कहा – “कुछ नहीं” और फिर वहा से चला गया और दूर कही पेड़ के पीछे छिप गया | अब क्या था चारो बेल यह जानने को उसुक्त थे की शेर ने उनके कान में क्या कहा |

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लोभ का फल

एक साधू तीर्थयात्रा पर निकले | वह मार्ग में पड़नेवाले गावो और कस्बो में ठहरते जाते थे | जहा जो भी भक्त उन्हें प्रेम और आदर से बुलाते, चले जाते |

एक गाव में एक ऐसा भक्त मिला जिसने उन्हें एक गाय दान दे दी | वह बोला – “महाराज | इसे आप साथ रखिए | रास्ते में घास – पात लेगी और आपको दूध भी देगी |”

साधू ने गाय ले ली और आगे चल पड़े | अभि कुछ देर ही गए होगे की एक व्यापारी मिला | वह भी साधू के साथ साथ चलने लगा | व्यापारी ने साधू को अपना परिचय दिया | फिर उत्सुकतावश पूछ बेठा – “ यह गाय लेकर आप तीर्थयात्रा के लिए क्यों निकले है?”

साधू ने कहा – “में तो अकेला हु चला था | परंतु एक भक्त ने इसे भी साथ कर दिया ताकि दूध मिलता रहे |”

व्यापारी ने देखा की गाय बहुत सुन्दर है | दूध भी काफी देती होगी | अगर किसी तरह इसे में खरीद लू तो इसके अछे दाम मिल जायगे | यह सोचकर बोला – महाराज | आपके लिए भला दूध की क्या कमी है ? जिस गाव में डाल देगे, वहा भकत लोग दूध –ही-दूध ले आएगे | पैर इतना ज़रूर है की जंगल का मामला है | अगर गाय को खतरा हो गया तो व्यथ ही आपको पाप लगेगा | मेरी बात मानिए, आप इसे बेच दीजिए |”

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बीरबल की बेटी

एक दिन बीरबल की बेटी ने बादशाह से मिलने के लिए बहुत जोर दिया | वह 11 वर्ष की थी | वह भी अपने लिटा के समान बुद्धिमान तथा चतुर थी | बीरबल ने उसे खुश करने के लिए महल में ले गया | महल में जाकर उसने सभी कक्ष तथा शाही उधान देखे | उसके बाद वह शाही दरबार में गई | उस समय बादशाह दरबार में बैठे थे | उन्होंने बीरबल की बेटी को देखा तथ उसका स्वागत किया | उसके बाद वह भोजन करने चली गई | भोजन के बाद बादशाह ने उससे पूछा, “बेटी क्या तुम जानती हो कि किस प्रकार बात करनी चाहिए “

“जी महाराज, न अधिक न ही बहुत काम” और यह जवाब सुनकर बादशाह हेरान हो गए, उन्हें समझ नहीं आया कि वह क्या बताना चाहती है, इसलिय उन्होंने उससे पूछा, “तुम क्या कहना चाहती हो, बेटी |”

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