सूर्योदय के समय बिठूर के मैदान में भूरे घोड़े पर दौड़ती नन्ही मनु हाथ में लकड़ी की तलवार उठाए, पास खड़े लड़के, बुज़ुर्ग प्रशिक्षक और पिता उसे देखते हुए

काशी की गलियों में सुबह हमेशा घंटियों की आवाज़ से होती थी। गंगा के घाटों पर दीये तैरते, पंडितों के मंत्र गूँजते, और इन्हीं गलियों में एक छोटी-सी लड़की नंगे पाँव दौड़ती फिरती थी। नाम था मणिकर्णिका, पर घर में सब उसे प्यार से मनु बुलाते थे। यही मनु आगे चलकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बनी, वही रानी जिसका नाम आज भी हिम्मत का दूसरा नाम माना जाता है।

पर यह कहानी उस रानी की नहीं, उस बच्ची की है जो रानी बनने से बहुत पहले ही यह तय कर चुकी थी कि वह किसी से कम नहीं रहेगी।

मनु के पिता मोरोपंत तांबे एक सीधे-सादे, विद्वान आदमी थे। माँ भागीरथी बाई धर्म-कर्म वाली, शांत स्वभाव की महिला थीं। पर क़िस्मत ने मनु से माँ का आँचल बहुत जल्दी छीन लिया। इतिहासकार बताते हैं कि मनु मुश्किल से चार साल की रही होगी, जब माँ चल बसीं।

घर एकदम सूना हो गया। मोरोपंत सोच में पड़ गए कि इस नन्ही-सी जान को अब कौन संभालेगा। कुछ समय बाद वे मनु को लेकर बिठूर चले गए, जहाँ पेशवा बाजीराव द्वितीय रहते थे। मोरोपंत को वहाँ दरबार में काम मिल गया।

बिठूर का माहौल काशी से बिल्कुल अलग था। यहाँ मंत्रों के साथ-साथ घोड़ों की टापें भी सुनाई देती थीं। तलवारों की खनक, अखाड़े की मिट्टी, और मैदान में दौड़ते घुड़सवार। मनु की आँखें यह सब देखकर चमक उठीं।

पेशवा के दरबार में मनु से थोड़े बड़े लड़के भी थे, जिनमें नाना साहब सबसे जाने-पहचाने थे। तात्या टोपे का नाम भी इन्हीं दिनों से जुड़ा बताया जाता है। लड़के सुबह-सुबह घुड़सवारी सीखने जाते, तलवारबाज़ी का अभ्यास करते, निशाना लगाते। और मनु? वह दूर खड़ी होकर देखती रहती।

एक दिन उससे रहा नहीं गया। वह सीधे पिता के पास पहुँची।

“बाबा, मुझे भी घोड़ा चलाना है।”

मोरोपंत हँस पड़े। “घोड़ा? बेटा, तू तो अभी घोड़े की पीठ तक भी नहीं पहुँचती।”

“तो सीढ़ी लगा दीजिए,” मनु ने बड़ी गंभीरता से कहा, “पर सीखना मुझे है।”

आसपास बैठे लोग मुस्कुरा दिए। उस ज़माने में लड़कियों से उम्मीद की जाती थी कि वे घर का काम सीखें, पूजा-पाठ करें, और बस। पर मोरोपंत ने बेटी की आँखों में कुछ ऐसा देखा, जिसे वे टाल नहीं पाए। माँ के बिना पल रही इस बच्ची को उन्होंने कभी किसी चीज़ से रोका भी नहीं था।

तो मनु भी मैदान में उतर आई।

शुरू-शुरू में सब उसे मज़ाक समझते थे। पहली बार घोड़े पर बैठी, तो घोड़ा ज़रा-सा हिला और मनु धम्म से नीचे। घुटने छिल गए, कपड़े मिट्टी से सन गए। एक लड़का ठहाका मारकर हँसा, “देखो, देखो, रानी साहिबा गिर गईं!”

मनु की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने उन्हें गिरने नहीं दिया। कपड़े झाड़े, घोड़े की लगाम फिर से पकड़ी और बोली, “एक बार और।”

“चोट लगी है, रहने दे,” सिखाने वाले ने कहा।

“चोट तो कल भी ठीक हो जाएगी,” मनु बोली, “पर अगर आज डर गई, तो डर कभी ठीक नहीं होगा।”

यह बात सुनकर वह बुज़ुर्ग सिपाही चुप हो गया। उसने घोड़े की लगाम थामी और धीरे-धीरे मनु को मैदान का चक्कर लगवाने लगा।

दिन बीतते गए। मनु रोज़ सबसे पहले मैदान पहुँचती और सबसे आख़िर में लौटती। धीरे-धीरे घोड़ा उसकी बात समझने लगा, और वह घोड़े की। फिर तलवार की बारी आई। लकड़ी की तलवार से शुरुआत हुई, फिर असली तलवार। निशानेबाज़ी में भी उसने हाथ आज़माया। कहा जाता है कि पेशवा बाजीराव उसकी चंचलता और फुर्ती पर इतने ख़ुश रहते थे कि उसे प्यार से “छबीली” कहकर पुकारते थे।

अब वही लड़के, जो कभी उस पर हँसते थे, उसके साथ दौड़ लगाने से कतराने लगे। एक बार घुड़दौड़ हुई, तो मनु का घोड़ा सबसे आगे निकल गया। वह लौटी, तो उसके चेहरे पर पसीना था और होंठों पर एक शरारती मुस्कान।

“अब बताओ,” उसने उसी लड़के से पूछा, “कौन गिरा था?”

लड़का झेंप गया, फिर ख़ुद भी हँस पड़ा। उस दिन से दोनों अच्छे दोस्त बन गए।

बिठूर के दिनों से जुड़ा एक क़िस्सा लोग अक्सर सुनाते हैं। इसे इतिहास की पक्की घटना नहीं, लोक-स्मृति की कहानी मानना चाहिए, पर इसमें मनु का स्वभाव साफ़ झलकता है।

एक दिन नाना साहब हाथी पर बैठकर सैर पर निकल रहे थे। मनु ने देखा तो दौड़कर पास आई।

“मुझे भी बिठाओ न, मुझे भी हाथी पर घूमना है!”

नाना साहब ने किसी वजह से मना कर दिया और हाथी आगे बढ़ गया। मनु वहीं खड़ी रह गई। पिता ने आकर उसका कंधा थपथपाया।

“जाने दे, बेटा। हम लोग साधारण घर के हैं। हाथी पर बैठना हमारी क़िस्मत में कहाँ।”

मनु ने सिर उठाया और बड़े यक़ीन से बोली, “बाबा, एक दिन मेरे पास एक नहीं, दस हाथी होंगे।”

मोरोपंत उस समय मुस्कुराकर रह गए होंगे। उन्हें क्या पता था कि उनकी बेटी की यह बात एक दिन सच होने वाली है।

समय पंख लगाकर उड़ा। मनु की उम्र बहुत कम थी, जब झाँसी के राजा गंगाधर राव से उसका विवाह तय हुआ। उस दौर में लड़कियों की शादी छोटी उम्र में ही हो जाती थी। विवाह के बाद मनु को नया नाम मिला, लक्ष्मीबाई। अब वह झाँसी की रानी थी, और महल में हाथी-घोड़ों की कोई कमी नहीं थी।

पर ख़ास बात यह थी कि रानी बनने के बाद भी लक्ष्मीबाई ने अपना अभ्यास नहीं छोड़ा। वे सुबह जल्दी उठतीं, घुड़सवारी करतीं, तलवार चलातीं। बताया जाता है कि उन्होंने महल की कई महिलाओं को भी हथियार चलाना सिखाया। जो बच्ची कभी घोड़े से गिरकर उठी थी, वह अब दूसरों को उठना सिखा रही थी।

आगे की कहानी तो पूरा देश जानता है। सन् 1857 के संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज़ी सेना के सामने जिस साहस से मोर्चा लिया, उसकी मिसाल आज भी दी जाती है। पर उस साहस की नींव बिठूर के उसी धूल भरे मैदान में पड़ी थी, जहाँ एक छोटी-सी लड़की ने छिले घुटनों के साथ कहा था, “एक बार और।”

कभी-कभी हमें लगता है कि बड़े लोग पैदा ही बड़े होते हैं। पर सच यह है कि हर बड़ी कहानी किसी छोटे-से फ़ैसले से शुरू होती है। किसी दिन डर के आगे न झुकने का फ़ैसला, किसी दिन हँसी उड़ाने वालों की परवाह न करने का फ़ैसला, किसी दिन गिरकर फिर से उठने का फ़ैसला।

मनु ने वह फ़ैसला बचपन में ही कर लिया था।

सीख: हिम्मत किसी उम्र या हालात की मोहताज नहीं होती। जो गिरकर भी “एक बार और” कहना सीख लेता है, उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

नोट: यह कहानी रानी लक्ष्मीबाई के बचपन के बारे में उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी और प्रचलित क़िस्सों पर आधारित है। इसमें आए संवाद कहानी को जीवंत बनाने के लिए कल्पना से लिखे गए हैं।

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