शादी वाले घर में शोर कभी थमता नहीं। ढोलक, हलवाई की कड़ाही की छनछन, बच्चों की भाग-दौड़ और हर दो मिनट में किसी की आवाज़, “अरे, कैंची किसने ली?” बारह साल की मीरा को यह सब बहुत अच्छा लगता था। वह अपनी बुआ की बेटी पिंकी दीदी की शादी में लखनऊ आई थी, और पूरे घर में घूम-घूमकर सब देखती रहती थी।
मीरा की एक आदत थी, जिससे घर वाले कभी हँसते थे, कभी चिढ़ जाते थे। वह हर चीज़ को ग़ौर से देखती थी। किसकी चप्पल कहाँ उतरी है, किसने चाय में कितनी चीनी ली, किस खिड़की का पर्दा आधा खुला है। उसकी जेब में हमेशा एक छोटी-सी डायरी और पेंसिल रहती थी। छोटा भाई चिंटू उसे चिढ़ाता, “आ गई जासूस मीरा!”
शादी से एक दिन पहले, दोपहर को अचानक घर में हंगामा मच गया।
“मेरा हार! मेरा सोने का हार कहाँ गया?”
यह दादी की आवाज़ थी। सब दौड़कर उनके कमरे में पहुँचे। दादी पलंग के पास खड़ी थीं, चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। “नहाने जाने से पहले यहीं खिड़की के पास रखा था। बस आधा घंटा हुआ है। वही हार, जो मैं पिंकी को कल फेरों पर पहनाने वाली थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर फूफा जी ने धीरे से कहा, “इस कमरे में आज सुबह से कौन-कौन आया था?”
बुआ ने सोचकर बताया, “मैं आई थी, चाय देने। फिर कमला आई थी, झाड़ू-पोंछा करने।”
कमला कुछ ही दिन पहले काम पर लगी थी। वह दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ में अब भी पोंछे का कपड़ा था। सबकी नज़रें एक साथ उसकी ओर घूम गईं। किसी ने कुछ कहा नहीं, पर कहने की ज़रूरत भी नहीं थी।
कमला की आँखें भर आईं। “बीबी जी, मैंने तो हार देखा तक नहीं। मैं बस फ़र्श साफ़ करके चली गई थी।”
मौसी ने धीरे से बुआ के कान में कुछ कहा। मीरा ने सुन लिया, “नई है, किसी को क्या पता…”
मीरा को यह बात चुभ गई। उसने कमला का चेहरा देखा। डर था, शर्म थी, पर चोरी करने वाले की घबराहट जैसा कुछ नहीं था। उसने अपनी डायरी निकाली।
“दादी,” मीरा ने कहा, “क्या मैं कमरा देख सकती हूँ? बस पाँच मिनट।”
फूफा जी ने हल्की-सी झुँझलाहट से कहा, “बेटा, ये खेल का वक़्त नहीं है।”
पर दादी ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। “देखने दो। ये लड़की आँखें खोलकर देखती है।”
मीरा खिड़की के पास गई। खिड़की पूरी खुली थी, और उसमें लोहे की सलाखें नहीं थीं, बस एक जाली थी जो एक कोने से फटी हुई थी। चौखट पर हल्की-सी धूल जमी थी, और उस धूल पर छोटे-छोटे निशान थे। तीन पतली उँगलियों जैसे, आगे की ओर फैले हुए।
“ये किसी इंसान के हाथ के निशान तो नहीं हैं,” मीरा ने अपने आप से कहा, और डायरी में उनकी शक्ल बना ली।
फिर उसकी नज़र नीचे गई। फ़र्श पर, खिड़की के ठीक नीचे, एक काला चमकीला पंख पड़ा था। मीरा ने उसे उठाया और रोशनी में घुमाकर देखा।
“चिंटू,” उसने पुकारा, “इधर आ। तू कल छत पर पतंग उड़ा रहा था न? सामने नीम के पेड़ पर कौन-कौन से पक्षी रहते हैं?”
चिंटू ने कंधे उचकाए। “कौए। एक तो इतना बदमाश है, कल मेरी चमकीली पन्नी वाली चरखी की डोरी लेकर उड़ गया था।”
मीरा की आँखें चमक उठीं। उसे एक और बात परखनी थी। वह कमला के पास गई और धीरे से बोली, “दीदी, ज़रा अपने हाथ दिखाओगी?”
कमला ने हिचकते हुए हथेलियाँ आगे कर दीं। उन पर ताज़ा, गीली-सी मेहँदी लगी थी। सुबह घर की सभी औरतों के साथ उसे भी मेहँदी लगाई गई थी।
मीरा मुड़ी और सबसे बोली, “दादी के पलंग की सफ़ेद चादर देखिए। हार चादर के ठीक बगल में, खिड़की पर रखा था। अगर कमला दीदी ने हार उठाया होता, तो इन गीली हथेलियों से खिड़की पर या चादर पर कहीं तो मेहँदी का निशान लगता। लेकिन कहीं कुछ नहीं है। और जाली का फटा कोना देखिए, उसमें एक छोटा काला पंख अटका है, और ठीक नीचे ये बड़ा पंख गिरा है।”
बुआ ने चादर देखी। वह सचमुच बेदाग़ थी।
“तो फिर हार कहाँ गया?” मौसी ने पूछा, अब उनकी आवाज़ थोड़ी नरम थी।
मीरा ने खिड़की से बाहर इशारा किया। सामने नीम का घना पेड़ था, और उसकी एक ऊँची डाल पर टहनियों का एक बड़ा-सा घोंसला दिख रहा था। “कौए चमकीली चीज़ें उठा ले जाते हैं, ऐसा दादाजी कहते थे। मुझे लगता है, हमारा चोर वहाँ बैठा है।”
कुछ लोग हँस पड़े। फूफा जी बोले, “अब कौआ जासूसी कहानी का विलेन बनेगा?”
पर दादी ने तुरंत माली काका को बुलवाया। काका ने सीढ़ी लगाई, ऊपर चढ़े, और जब उन्होंने घोंसले में झाँका, तो उनकी हँसी छूट गई।
“अरे बाप रे! यहाँ तो पूरी दुकान खुली है!”
उन्होंने एक-एक चीज़ नीचे फेंकनी शुरू की। एक स्टील का चम्मच, किसी बच्चे की टूटी चूड़ी, चिंटू की चरखी वाली चमकीली डोरी, बोतल का एक ढक्कन… और फिर, धूप में झिलमिलाता हुआ, दादी का सोने का हार।
आँगन में तालियाँ बज उठीं। चिंटू उछलकर बोला, “मेरी डोरी भी मिल गई!”
दादी ने हार हाथ में लिया, उसे माथे से लगाया, और फिर सीधे कमला के पास गईं। कमला अब भी एक कोने में चुपचाप खड़ी थी।
“बेटी,” दादी ने उसके दोनों हाथ थाम लिए, मेहँदी की परवाह किए बिना, “हम सबने तुझ पर शक किया। ये हमारी ग़लती थी। माफ़ कर दे।”
कमला की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार वे राहत के आँसू थे। मौसी भी पास आईं और धीमे से बोलीं, “मुझसे भी ग़लती हुई, कमला।”
शाम को, जब हलवाई की कड़ाही फिर से छनछनाने लगी और ढोलक की थाप लौट आई, फूफा जी मीरा के पास आए। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराए।
“माफ़ करना, जासूस साहिबा। तुम्हारा खेल तो हम सब पर भारी पड़ गया।”
मीरा ने शरमाकर डायरी जेब में रख ली। “फूफा जी, मैंने कुछ ख़ास नहीं किया। बस जो दिख रहा था, उसे ध्यान से देखा। सबने कमला दीदी को देखा, मैंने खिड़की को देखा।”
अगले दिन फेरों पर पिंकी दीदी के गले में वही हार चमक रहा था। और मंडप के पास, नई साड़ी पहने, कमला मुस्कुराती हुई सबको मिठाई बाँट रही थी। उस दिन से घर में कोई मीरा को चिढ़ाता नहीं था। चिंटू भी नहीं। अब वह उसे बड़े गर्व से पुकारता था, “मेरी दीदी, जासूस मीरा।”
और हाँ, दादी ने अपनी खिड़की की फटी जाली उसी शाम बदलवा दी।
सीख: किसी पर शक करने से पहले सबूत देखिए। जल्दबाज़ी में लगाया गया इल्ज़ाम किसी बेगुनाह का दिल तोड़ सकता है, और सच अक्सर वहीं छिपा होता है जहाँ हम देखना भूल जाते हैं।
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