जैसी करनी वैसी भरनी: सेठ और नौकर

पारंपरिक आँगन में सेठ घनश्यामदास नौकर भोलू को चाय का प्याला देते हुए, तुलसी का चौरा और सुनहरी शाम की रोशनी

चंदपुर कस्बे में सेठ घनश्यामदास की हवेली देखकर लोग रुक जाते। बड़े आँगन में तुलसी का चौरा, लाल मिट्टी की दीवारें, और छत पर चमकती टीन की नाली। बाज़ार में उनका नाम था—कपड़ा, अनाज, साहूकारी। घर में नौकर था भोलू। बीस साल का, पतला-सा, पर काम में चुस्त। सुबह आँगन बुहारना, घोड़े को पानी देना, दुकान की गठरियाँ उठाना—सब भोलू के हिस्से।

सेठ जी कहते, “भोलू, तुझे रोटी-कपड़ा मिला है। और क्या चाहिए? शहर के नौकर तो इससे आधे में रहते हैं।”

भोलू चुप रहता। कभी माँ के इलाज के लिए पैसे माँगता, तो सेठ जी माथा ठनकाने लगते, “अरे, हर महीने कोई न कोई बीमारी निकाल लेता है तू। पहले काम कर, फिर बातें।”

एक दिन बरसात हुई। भोलू बुखार में काँप रहा था। फिर भी सेठ जी ने उसे बाज़ार भेजा। “दुकान बंद रहेगी क्या मेरे बुखार से?” रास्ते में भोलू गिर पड़ा। पड़ोस की रमुआ बुआ ने उसे घर पहुँचाया। सेठानी ने दो सूखी रोटियाँ फेंक दीं, “खा ले, कल उठ जाना।”

भोलू ने रोटियाँ उठाईं और आँखें झुका लीं। मन में एक बात घूम रही थी—माँ कहती थीं, कर्मों का फल कभी न भूलना। पर वह कुछ बोल नहीं पाया। रात भर खाँसता रहा, पर सुबह फिर झाड़ू हाथ में थी।

कुछ महीने बाद शहर से सेठ हरिप्रसाद आए। बड़े व्यापारी। घनश्यामदास उन्हें रिझाना चाहते थे। दावत, मिठाई, रेशमी गद्दे। भोलू रात-दिन दौड़ता रहा। दीये जलाने से लेकर मेहमानों के जूते साफ करने तक—सब उसी पर। एक रात थककर सीढ़ियों पर बैठ गया। सेठ जी ने देखा तो चिल्लाए, “आलसी! मेहमान आँगन में खड़े हैं और तू यहाँ सो रहा है?”

भोलू उठ खड़ा हुआ। आवाज़ में थकान थी, पर गुस्सा नहीं। “हुज़ूर, पानी भर लाऊँ?”

“पानी नहीं, दिमाग लगा।” सेठ जी मुड़े और मेहमान के पास मुस्कुराते चले गए।

उस रात भोलू ने आँगन के कोने में बैठकर सोचा। याद आई ईमानदार लकड़हारे की कहानी—जहाँ सच बोलने वाले को इनाम मिला था। फिर याद आई बुढ़िया की रोटी—जहाँ बाँटने वाले का पेट कभी खाली नहीं रहा। उसने सोचा, शायद मेरी बारी अभी बाकी है। सब्र का बीज धीरे-धीरे उगता है।

साल नहीं बीता कि भाग्य ने करवट बदली। बाढ़ आई। गोदाम का माल बह गया। एक साझेदार ने हिसाब में धोखा दिया। सेठ घनश्यामदास की साख टूटने लगी। महाजनों ने कर्ज़ माँगे। हवेली सूनी पड़ गई। सेठानी मायके चली गईं। भोलू को सेठ जी ने खुद निकाल दिया, “अब तुझे पालने लायक नहीं रहा मैं। जा।”

भोलू ने झोला बाँधा। जाते-जाते एक बार मुड़ा, पर सेठ जी ने पीठ फेर ली थी। पास के गाँव में खेतों का काम करने लगा। पेट भर रोटी मिलती, और लोग सम्मान से नाम लेते। शाम को बच्चों को छोटी बातें सुनाता—कि हाथ की ताकत किसी को कुचलने के लिए नहीं होती।

सेठ जी शहर गए। किसी रिश्तेदार के यहाँ ठहरने की आशा थी। रिश्तेदार ने द्वार पर ही कहा, “अभी जगह नहीं। नीचे कोठरी में सो लो। सुबह जल्दी उठकर बाज़ार का सामान लाना।”

कोठरी में न रोशनी, न चटाई। सुबह बासी रोटी मिली। जब सेठ जी ने धीरे से कहा, “मुझे थोड़ा गरम पानी चाहिए,” तो जवाब मिला, “तुझे रोटी-कपड़ा मिला है। और क्या चाहिए?”

सेठ जी की साँस अटक गई। वही शब्द। वही स्वर। जैसे कोई आईना उनके सामने रख दिया हो।

रात को कोठरी में लेटे-लेटे उन्हें भोलू की याद आई—बुखार में काँपता हुआ, सूखी रोटियाँ उठाता हुआ, चुपचाप सिर झुकाए हुए। आँखों में पानी आ गया। “मैंने क्या किया…” फुसफुसाए वे। नींद नहीं आई। हर दीवार से वही आवाज़ गूँजती लगी।

एक सुबह सेठ जी बाज़ार से सामान लेकर लौट रहे थे कि गाड़ी का पहिया कीचड़ में धँस गया। कोई मदद को नहीं आया। तभी एक आवाज़ सुनाई दी, “हुज़ूर?”

सामने भोलू खड़ा था। साफ़ धोती, कंधे पर फावड़ा, चेहरे पर वही शांत मुस्कान।

सेठ जी शर्म से नीचे देख नहीं पाए। “भोलू… तू?”

भोलू ने फावड़ा नीचे रखा और पहिया धकेलने लगा। “आएँ, मिलकर निकालते हैं।”

“मैंने तुझे बुरा कहा था,” सेठ जी की आवाज़ काँपी। “बीमार छोड़ दिया था। पैसे नहीं दिए। तू फिर भी…”

भोलू ने मुस्कुराकर कहा, “हुज़ूर, माँ कहती थीं—जैसी करनी वैसी भरनी। आपने कठोरता बोई, तो कठोरता काटी। मैंने सब्र बोया, तो सब्र का फल मिला। अब अगर आप चाहें, तो नया बीज भी बो सकते हैं।”

सेठ जी चुप रहे। दोनों ने मिलकर गाड़ी निकाली। कीचड़ उनके कपड़ों पर लग गया, पर उस दिन पहली बार सेठ जी की पीठ सीधी थी—शर्म से नहीं, समझ से। रास्ते में उन्होंने भोलू से पूछा, “तू नाराज़ नहीं?”

भोलू ने सिर हिलाया, “नाराज़गी बोझ है, हुज़ूर। बोझ उठाकर कौन आगे बढ़ता है?”

कुछ दिनों बाद सेठ जी चंदपुर लौटे। छोटी दुकान शुरू की। भोलू को बुलाया—नौकर कहकर नहीं, साथी कहकर। रोटी एक थाली में बैठकर खाई। जब कोई नया नौकर आया, सेठ जी खुद कहने लगे, “बेटा, थकान हो तो बोल। बीमारी हो तो आराम कर। इंसान को इंसान की तरह रखना ही असली हिसाब है।”

बाज़ार वाले फुसफुसाते, “सेठ जी बदल गए।” कोई कहता, कर्मों का फल देखो। कोई कहता, दो दोस्त और भालू जैसी कहानियों में जो लिखा है, वही ज़िंदगी में उतर आया।

भोलू कभी जवाब नहीं देता था। बस काम करता, और कभी-कभी बच्चों को आँगन में बैठाकर छोटी-छोटी बातें सुनाता। सेठ जी भी पास बैठ जाते। एक दिन उन्होंने बच्चों से कहा, “अगर कभी किसी से कठोर बनने का मन हो, तो मेरी यह हवेली याद कर लेना—और वह कोठरी भी, जहाँ मुझे अपना ही स्वर सुनाई दिया था।”

और जब शाम ढलती, तुलसी के चौरे पर दीया जलता, तो सेठ घनश्यामदास चुपचाप खड़े होकर सोचते—सच्ची दौलत वह नहीं जो तिजोरी में रखी हो, वह है जो दिल में जगह बनाए।

जैसी करनी, वैसी भरनी—यह बात किताबों में नहीं, रोज़ के व्यवहार में लिखी जाती है। नैतिक कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते अगर एक बात याद रह जाए, तो यही काफी है।

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