राजस्थान में जब रात को ठंडी हवा चलती है और रेत के टीलों पर चाँदनी बिछ जाती है, तब गाँवों में अक्सर किसी ढाढ़ी की सारंगी से एक पुरानी धुन उठती है। उस धुन के पीछे एक कहानी है, ढोला और मारू की। कोई कहता है यह सचमुच हुआ था, कोई कहता है यह लोक कवियों की कल्पना है। पर सदियों से गायक इसे गाते आए हैं, और हर गायक इसमें अपना थोड़ा-सा रंग भर देता है। आज वही कहानी, मेरे अपने शब्दों में।
बहुत पुरानी बात है। रेगिस्तान के बीच बसे पूगल राज्य में राजा पिंगल राज करते थे। उनकी एक नन्ही-सी बेटी थी, मारवणी। महल में सब उसे प्यार से मारू बुलाते थे। उधर दूर नरवर में राजा नल का बेटा था साल्हकुमार, जिसे सब लाड़ से ढोला कहते थे।
एक बरस पूगल में ऐसा अकाल पड़ा कि कुएँ सूख गए और खेतों में दरारें पड़ गईं। गायें प्यास से बिलबिलाने लगीं। राजा पिंगल अपनी प्रजा और पशुओं को लेकर कुछ समय के लिए नरवर चले आए, जहाँ पानी था, हरियाली थी। दोनों राजाओं में गहरी दोस्ती हो गई। एक शाम चौपाल पर बैठे-बैठे राजा नल ने हँसकर कहा, “पिंगल जी, क्यों न इस दोस्ती को रिश्ते में बदल दें?”
उस ज़माने के रिवाज़ के मुताबिक़ नन्ही मारू और छोटे ढोला का ब्याह कर दिया गया। दोनों को तो यह भी नहीं पता था कि फेरे किस चीज़ के होते हैं। ढोला मिठाई के लिए मचल रहा था और मारू अपनी कपड़े की गुड़िया ढूँढ रही थी।
बारिश लौटी तो पिंगल भी पूगल लौट गए। तय हुआ कि बच्चे बड़े होंगे, तब गौना होगा। फिर बरस बीतते गए। रास्ता लंबा था, बीच में तपता रेगिस्तान था, और धीरे-धीरे दोनों राज्यों के बीच ख़बरें आनी बंद हो गईं।
ढोला बड़ा हुआ तो उसे बचपन का वह ब्याह याद ही नहीं रहा। जवान होने पर उसका विवाह मालवा की राजकुमारी मालवणी से हो गया। मालवणी सुंदर थी, समझदार थी, और ढोला से बहुत प्रेम करती थी। पर उसे कहीं से पता चल गया था कि पूगल में एक और राजकुमारी है, जो ढोला की पहली पत्नी है। यह बात उसके मन में काँटे की तरह चुभती रहती थी।
उधर पूगल में मारू सोलह बरस की हो चुकी थी। उसकी सखियाँ एक-एक करके अपने ससुराल जा चुकी थीं। मारू रोज़ शाम को महल की छत पर खड़ी होकर पूरब की ओर देखती, जहाँ से कभी कोई ऊँट आता नहीं दिखता था। एक रात उसने सपने में ढोला को देखा। सुबह उठी तो आँखें भीगी हुई थीं।
“माँ, क्या वो मुझे भूल गए?” उसने रानी से पूछा।
रानी ने उसका सिर सहलाया, “बेटी, भूले नहीं होंगे। शायद ख़बर ही न पहुँची हो।”
राजा पिंगल ने कई संदेशवाहक भेजे, पर कोई जवाब लेकर नहीं लौटा। बाद में पता चला कि मालवणी ने नरवर की सीमा पर अपने आदमी बिठा रखे थे। पूगल से आने वाला हर दूत वहीं रोक लिया जाता, या कुछ देकर लौटा दिया जाता।
तब मारू ने एक तरकीब सोची। “पिताजी, दूतों को तो रोका जा सकता है, पर गीतों को कौन रोकेगा?”
उसने पूगल के कुछ ढाढ़ी गायकों को बुलाया और अपने मन की हर बात उन्हें बताई। तपती दोपहरें, सूनी रातें, छत पर बैठकर किया गया इंतज़ार। “ये बातें ढोला के कानों तक पहुँचा देना। संदेश मत कहना, बस गाना।”
ढाढ़ी नरवर पहुँचे, दूत बनकर नहीं, गवैये बनकर। गवैयों को भला कौन रोकता? एक रात जब बादल गरज रहे थे, वे ढोला के महल की खिड़की के नीचे बैठ गए और गाने लगे। उनकी आवाज़ में मारू का दर्द था, “बादल बरसे, बिजली चमके, पर पूगल की धरती अब भी प्यासी है। जिसका ब्याह बचपन में हुआ, वह आज भी छत पर खड़ी राह देखती है।”
ढोला ने खिड़की खोली। गीत सुनते-सुनते उसके मन में धुंधली-सी यादें जागने लगीं। एक बड़ा-सा आँगन, एक नन्ही लड़की, उसकी गुड़िया। उसने गायकों को भीतर बुलवाया। “यह किसका गीत है?”
बूढ़े ढाढ़ी ने सिर झुकाकर कहा, “कुँवर जी, यह पूगल की राजकुमारी मारवणी का गीत है। आपकी ब्याहता का।”
ढोला देर तक चुप बैठा रहा। फिर उठा और बोला, “मैं पूगल जाऊँगा।”
मालवणी ने यह सुना तो घबरा गई। उसने रोकर, रूठकर, हर तरह से ढोला को रोकने की कोशिश की। कभी कहती, “अभी सावन है, रास्ते ख़राब हैं।” कभी कहती, “मेरी तबीयत ठीक नहीं है।” ढोला हर बार रुक जाता, क्योंकि वह मालवणी का दिल भी नहीं दुखाना चाहता था। पर मन तो कब का पूगल पहुँच चुका था। आख़िर एक रात उसने अपना सबसे तेज़ ऊँट तैयार करवाया और चुपचाप निकल पड़ा।
कहते हैं, उस ऊँट ने रातों-रात इतना रास्ता नाप लिया जितना आम ऊँट हफ़्तों में नापते हैं। रेत के ऊँचे टीले, कँटीली झाड़ियाँ, दिन की जलती धूप, कुछ भी ढोला को नहीं रोक पाया। जब वह पूगल पहुँचा, तो पूरा नगर उमड़ पड़ा। मारू झरोखे से देख रही थी। उसने ढोला को पहली बार जवान रूप में देखा, और ढोला ने मारू को। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। बोलने की ज़रूरत भी नहीं थी।
कुछ दिन पूगल में ख़ूब ख़ुशियाँ मनाई गईं। फिर ढोला मारू को लेकर नरवर की ओर चल पड़ा। पर इस प्रेम कहानी की परीक्षा अभी बाकी थी।
रास्ते में एक रात, जब वे रेगिस्तान में डेरा डाले थे, मारू को एक ज़हरीले साँप ने डस लिया। सुबह होते-होते उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा। ढोला उसका सिर गोद में रखकर बिलख पड़ा, “इतने बरस बाद मिली हो, और ऐसे छोड़ जाओगी?”
लोक कथा कहती है कि उसी समय उधर से एक योगी और योगिनी गुज़र रहे थे। योगिनी ने ढोला का विलाप सुना तो योगी से बोली, “ऐसे सच्चे प्रेम को यूँ टूटने दोगे?” योगी ने मारू के माथे पर हाथ रखा, कुछ मंत्र पढ़े, और धीरे-धीरे मारू की साँसें लौट आईं। कुछ गायक कहते हैं कि वे स्वयं शिव और पार्वती थे। सच क्या है, यह तो रेगिस्तान की रेत ही जाने।
मुसीबत अब भी ख़त्म नहीं हुई थी। उमर सूमरा नाम का एक सरदार मारू की सुंदरता के क़िस्से सुन चुका था। उसने रास्ते में दावत का बहाना बनाकर ढोला को रोक लिया। उसका इरादा था कि ढोला को बातों में उलझाए रखे और मौक़ा मिलते ही मारू को उठा ले जाए। ढोला को कुछ पता नहीं था।
पर उमर के डेरे में एक ढाढ़न थी, जो पूगल की रहने वाली थी और मारू को बचपन से जानती थी। उसने गीत की धुन में ही मारू को इशारा कर दिया, “ऊँट पर बैठी बहना, यहाँ मत रुकना, यहाँ धोखा है।”
मारू समझ गई। वह बहाने से ऊँट के पास गई और उसकी नकेल हल्के से खींची। ऊँट बैठा, ढोला झट से उस पर चढ़ा, और ऊँट हवा से बातें करने लगा। उमर सूमरा और उसके आदमी पीछे दौड़े, पर उस ऊँट की बराबरी भला कौन कर पाता!
आख़िरकार ढोला और मारू नरवर पहुँचे। कहते हैं, समय के साथ मालवणी ने भी मारू को अपना लिया, और उस महल में फिर कभी किसी गीत को रोका नहीं गया।
आज भी जब राजस्थान में कोई ढाढ़ी सारंगी पर ढोला मारू गाता है, तो सुनने वाले चुप हो जाते हैं। इस कहानी में सिर्फ़ प्रेम नहीं है। इसमें इंतज़ार का धीरज है, एक लड़की की सूझबूझ है, जिसने सारे रास्ते बंद देखे तो गीतों का रास्ता बना लिया। और एक ढाढ़न की हिम्मत भी, जिसने एक धुन से दो ज़िंदगियाँ बचा लीं।
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