पंपा सरोवर के किनारे, घने जंगल के बीच, मतंग ऋषि का आश्रम था। आश्रम छोटा-सा था। मिट्टी की कुटियाँ, तुलसी के चौरे, और चारों ओर ऐसी शांति कि हवा भी धीरे चलती लगती थी। इसी आश्रम में एक बुज़ुर्ग स्त्री रहती थी, जिसके बाल अब पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे और कमर थोड़ी झुक गई थी। नाम था शबरी।
शबरी हमेशा से यहाँ नहीं थी। बहुत साल पहले वह भील समाज की एक जवान लड़की थी, जो अपने घर से निकलकर भटकती हुई इस जंगल तक आ पहुँची थी। उसके मन में एक ही सवाल था, “भगवान को पाने का रास्ता क्या है?” उस समय कई लोगों ने उसे दरवाज़े से लौटा दिया था। कोई कहता, “तुम पढ़ी-लिखी नहीं हो।” कोई कहता, “तुम्हारी जाति ठीक नहीं।”
पर मतंग ऋषि ने उसे लौटाया नहीं। उन्होंने बस इतना कहा था, “बेटी, यहाँ रहना है तो रहो। सेवा करो, मन साफ़ रखो। बाक़ी भगवान पर छोड़ दो।”
उस दिन से शबरी ने आश्रम को ही अपना घर मान लिया। सुबह सबसे पहले उठती, आश्रम का आँगन बुहारती, सरोवर से पानी भरकर लाती, और ऋषियों के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करती। कोई उसे धन्यवाद कहे या न कहे, उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
साल बीतते गए। फिर एक दिन मतंग ऋषि का अंतिम समय आ गया। शबरी उनके पास बैठी रो रही थी।
“गुरुदेव, आप चले जाएँगे तो मैं किसके सहारे रहूँगी?”
ऋषि ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रखा। “रोओ मत, शबरी। एक दिन श्रीराम ख़ुद इस आश्रम में आएँगे। तुम उनकी प्रतीक्षा करना। वे तुम्हें दर्शन देंगे, तभी तुम्हारी साधना पूरी होगी।”
बस, यही एक बात शबरी के जीवन का आधार बन गई।
अब उसकी हर सुबह एक ही सोच से शुरू होती थी, “शायद आज राम आएँगे।”
वह रोज़ आश्रम से सरोवर तक का रास्ता बुहारती। एक-एक काँटा हाथ से चुनकर हटाती, ताकि आने वाले के पैरों में चुभ न जाए। रास्ते के किनारे फूल बिछाती। फिर जंगल जाकर सबसे अच्छे फल ढूँढ़ती। शाम होती, राम नहीं आते। फूल मुरझा जाते, फल बासी हो जाते। शबरी उन्हें हटाती, और अगली सुबह फिर से वही सब करती।
आश्रम के पास से गुज़रने वाले कुछ लोग उस पर हँसते भी थे।
“अरे शबरी, कितने बरस हो गए? तुम्हारे राम का रास्ता तो शायद भूल ही गया होगा!”
शबरी बस मुस्कुरा देती। “गुरुदेव ने कहा है, तो आएँगे। मेरा काम रास्ता साफ़ रखना है। कब आना है, यह उनका काम है।”
ऐसे करते-करते कितने ही बरस निकल गए। जवानी गई, बाल पके, आँखों की रोशनी भी थोड़ी कम हो गई। पर इंतज़ार कम नहीं हुआ।
उधर, अयोध्या के राजकुमार राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ वनवास काट रहे थे। रावण सीता माता का हरण कर चुका था, और दोनों भाई उन्हें खोजते हुए जंगल-जंगल भटक रहे थे। रास्ते में किसी ने उन्हें बताया कि पंपा सरोवर के पास मतंग ऋषि का आश्रम है, और वहाँ रहने वाली शबरी आगे का मार्ग बता सकती है।
उस दिन भी शबरी सुबह से रास्ता बुहार रही थी। तभी उसने दूर से दो युवकों को आते देखा। एक साँवला, शांत चेहरा, आँखों में गहरी करुणा। दूसरा गोरा, हाथ में धनुष, चौकन्नी नज़र।
शबरी के हाथ से झाड़ू छूट गई। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने अपनी कमज़ोर आँखों पर हाथ रखकर ध्यान से देखा। फिर उसके होंठ काँपे।
“राम… मेरे राम आ गए!”
वह जितनी तेज़ चल सकती थी, उतनी तेज़ी से उनकी ओर बढ़ी और उनके चरणों में गिर पड़ी। आँखों से आँसू बह रहे थे। कुछ बोलना चाहती थी, पर गला भर आया था।
राम ने झुककर उसे उठाया। “माता, आप इतनी व्याकुल क्यों हैं?”
“प्रभु, बरसों से इसी दिन की राह देख रही थी,” शबरी ने रुँधे गले से कहा। “आइए, भीतर आइए। मेरी कुटिया छोटी है, पर आपके लिए पूरा मन बिछा रखा है।”
उसने दोनों भाइयों को आसन पर बिठाया, उनके पैर धोए। फिर अचानक उसे याद आया, “अरे, मैंने तो आपके लिए बेर रखे हैं!”
वह अंदर से एक टोकरी उठा लाई। उसमें जंगली बेर थे, जो उसने उसी सुबह तोड़े थे। पर टोकरी आगे बढ़ाने से पहले वह रुकी। एक बेर उठाया, उसे थोड़ा-सा चखा। खट्टा निकला, मुँह बिगड़ा, और उसने वह बेर एक ओर रख दिया। फिर दूसरा चखा। उस बार उसके चेहरे पर संतोष आया, और वह बेर राम के सामने रख दिया।
लक्ष्मण यह देखकर चौंके। उन्होंने धीमे से कहा, “भैया, ये तो जूठे बेर हैं।”
शबरी ने सुन लिया। वह घबरा गई। “माफ़ करना, बेटा। मैं बस यह देख रही थी कि कोई खट्टा या कड़वा बेर प्रभु के मुँह में न चला जाए। मुझसे और कुछ होता नहीं…”
राम ने शबरी का हाथ थाम लिया और वही बेर उठाकर बड़े प्रेम से खा लिया। फिर दूसरा, फिर तीसरा।
“लक्ष्मण,” राम ने मुस्कुराकर कहा, “ये बेर जूठे नहीं हैं। इनमें माँ की ममता है। जो माँ अपने बच्चे को खिलाने से पहले ख़ुद चखकर देखती है कि खाना ठीक है या नहीं, उसका भोजन कभी जूठा नहीं होता। मैंने राजमहल के पकवान भी खाए हैं, पर ऐसा स्वाद कभी नहीं मिला।”
लक्ष्मण चुप हो गए। उनकी आँखों में भी अब नमी थी।
शबरी हाथ जोड़कर बोली, “प्रभु, मैं तो एक साधारण भीलनी हूँ। न मुझे मंत्र आते हैं, न शास्त्र। मैं आपकी पूजा कैसे करूँ?”
राम ने बड़े स्नेह से कहा, “माता, मुझे पाने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ने की ज़रूरत नहीं। सच्चे मन से सत्संग करना, दूसरों की सेवा करना, अहंकार छोड़ना, सबमें मुझे देखना और जो मिले उसमें संतोष रखना, यही भक्ति है। और आपके पास तो ये सब पहले से है। आपने बरसों जो रास्ता बुहारा, वही आपकी पूजा थी।”
शबरी का चेहरा खिल उठा, जैसे बरसों की थकान एक पल में उतर गई हो।
फिर राम ने पूछा, “माता, हम सीता की खोज में हैं। आगे का मार्ग क्या है?”
शबरी ने पंपा सरोवर की ओर इशारा किया। “प्रभु, आगे ऋष्यमूक पर्वत है। वहाँ वानरराज सुग्रीव रहते हैं। उनसे मित्रता कीजिए। वे सीता माता को खोजने में आपकी सहायता करेंगे।”
राम ने हाथ जोड़कर उसका धन्यवाद किया। शबरी ने आख़िरी बार जी भरकर अपने प्रभु को देखा। उसकी बरसों की साधना पूरी हो चुकी थी। कहते हैं, उसी दिन वह परम शांति के साथ प्रभु के धाम चली गई।
राम और लक्ष्मण आगे बढ़ गए, ऋष्यमूक पर्वत की ओर, जहाँ उनकी मुलाक़ात हनुमान और सुग्रीव से होनी थी। पर जंगल के उस छोटे-से आश्रम में, एक बूढ़ी भीलनी के जूठे बेरों की कहानी हमेशा के लिए अमर हो गई।
आज भी जब कोई पूछता है कि भगवान को क्या चाहिए, तो लोग शबरी को याद करते हैं। भगवान को सोने की थाली नहीं चाहिए, ऊँचा कुल नहीं चाहिए, बड़ा ज्ञान भी नहीं चाहिए। उन्हें बस सच्चा मन चाहिए, और वह इंतज़ार जो कभी हार नहीं मानता।
यह कथा रामायण के अरण्य कांड में आई शबरी प्रसंग और लोक परंपरा में प्रचलित जूठे बेरों की कहानी को अपने शब्दों में दोबारा कहती है। इसमें आए संवाद कहानी को जीवंत बनाने के लिए लिखे गए हैं।
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