यह तेनालीराम से जुड़ी एक लोकप्रिय लोक-कथा का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है। संवाद और कई घटनाएँ कल्पना पर आधारित हैं।
विजयनगर में उस साल गर्मी कुछ ज़्यादा ही पड़ी थी। बारिश दो महीने देर से आई थी, तालाब सूखकर दरारों में बदल गए थे और लोग सुबह-शाम कुओं के पास बाल्टी लेकर खड़े दिखते थे। ऐसे ही दिनों में शहर में एक और परेशानी शुरू हो गई थी: चोरियाँ।
कभी किसी सेठ की तिजोरी खाली मिलती, कभी किसी की छत से पीतल के बर्तन ग़ायब हो जाते। राजदरबार में भी इसकी चर्चा होने लगी थी। महाराज कृष्णदेव राय ने सेनापति को रात की गश्त बढ़ाने का हुक्म दिया, पर चोर हर बार किसी नई गली से निकल जाते।
दरबार की बातें और झाड़ियों में छिपे कान
उस शाम तेनालीराम दरबार से थका-हारा लौटा। घर पहुँचकर उसने चप्पल उतारी, हाथ-मुँह धोया और आँगन में बैठ गया। उसकी पत्नी शारदा पानी का लोटा लेकर आई।
“आज इतनी देर कैसे हो गई?” उसने पूछा।
“वही चोरों वाली बात,” तेनालीराम ने लोटा लेते हुए कहा। “महाराज बहुत नाराज़ हैं। कह रहे थे कि शहर में किसी का घर सुरक्षित नहीं रहा।”
बात करते-करते तेनालीराम की नज़र आँगन की दीवार के पास वाली झाड़ियों पर पड़ी। वहाँ हवा नहीं चल रही थी, फिर भी पत्ते हिल रहे थे। एक पल को उसने किसी की चप्पल का किनारा भी देखा। वह समझ गया कि झाड़ियों में कोई बैठा है, और जो भी बैठा है, वह उसकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा है।
तेनालीराम ने चेहरे पर कोई घबराहट नहीं आने दी। उल्टा, उसकी आँखों में एक शरारती चमक आ गई। उसने आवाज़ थोड़ी ऊँची कर दी।
ऊँची आवाज़ में एक “राज़”
“शारदा, सुनो,” वह बोला, जैसे कोई बहुत गुप्त बात बता रहा हो, पर इतनी ज़ोर से कि दीवार के उस पार तक सुनाई दे। “शहर में चोर घूम रहे हैं। हमारे घर में जो गहने और सोने के सिक्के रखे हैं, वो अब संदूक में सुरक्षित नहीं हैं।”
शारदा हैरान रह गई। उनके घर में गिनती के दो कंगन थे, और सोने के सिक्कों की तो बात ही क्या। वह कुछ कहने वाली थी कि तेनालीराम ने आँख से इशारा किया। शारदा पति को अच्छी तरह जानती थी। वह चुप हो गई और उसने भी ऊँची आवाज़ में पूछा, “तो फिर क्या करें जी?”
“आज रात सारा धन एक लोहे के संदूक में बंद करके पिछवाड़े वाले कुएँ में डाल देंगे,” तेनालीराम ने कहा। “कुएँ में किसे शक होगा? चोर घर में ढूँढते रह जाएँगे।”
“वाह! क्या दिमाग़ पाया है आपने,” शारदा ने कहा, और इस बार उसकी हँसी सच्ची थी, बस उसकी वजह कुछ और थी।
झाड़ियों में बैठे दोनों चोरों ने एक-दूसरे की ओर देखा। एक ने धीरे से फुसफुसाया, “सुना तूने? कुएँ में संदूक! आज की रात तो हमारी किस्मत खुल गई।”
पत्थरों से भरा संदूक
अंदर जाकर तेनालीराम ने कोठरी से एक पुराना लोहे का संदूक निकाला। उसमें पहले कभी अनाज रखा जाता था। फिर वह और शारदा मिलकर आँगन के कोने से ईंट और पत्थर उठा-उठाकर उसमें भरने लगे।
“इतने भारी पत्थर क्यों?” शारदा ने हँसी दबाते हुए पूछा।
“संदूक जितना भारी होगा, चोरों को उतनी ही पक्की उम्मीद रहेगी कि अंदर ख़ज़ाना है,” तेनालीराम ने कहा। “और इस बार उनकी मेहनत हमारे बहुत काम आने वाली है।”
आधी रात से कुछ पहले दोनों संदूक को घसीटते हुए पिछवाड़े ले गए। चाँदनी में कुआँ साफ़ दिख रहा था। तेनालीराम ने जानबूझकर थोड़ा शोर किया, संदूक को कुएँ की मुँडेर पर टिकाया और फिर “धम्म!” की आवाज़ के साथ उसे अंदर गिरा दिया। पानी उछलने की आवाज़ दूर तक गई।
“चलो, अब चैन की नींद सोएँगे,” उसने ऊँची आवाज़ में कहा, और दोनों अंदर जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। पर सोया कोई नहीं। दोनों खिड़की के पास आकर बैठ गए।
रात भर की मेहनत
थोड़ी देर बाद झाड़ियों से दो परछाइयाँ निकलीं और दबे पाँव कुएँ तक पहुँचीं। एक ने अंदर झाँका। “बहुत गहरा है रे। संदूक नीचे तली में बैठ गया होगा।”
“तो क्या हुआ?” दूसरे ने कहा। “पानी निकाल देते हैं। पानी कम होगा, तो संदूक हाथ आ जाएगा।”
बस, फिर शुरू हुआ काम। एक रस्सी खींचता, दूसरा बाल्टी उठाकर पानी बाहर उड़ेलता। पानी कहाँ जाए? पास ही तेनालीराम की क्यारियाँ थीं, केले के पौधे थे, तुलसी थी, बैंगन और भिंडी के पौधे थे, जो कई दिनों से प्यासे मुरझा रहे थे। पानी नालियों से बहता हुआ सीधा उन्हीं में जाने लगा।
खिड़की से तेनालीराम फुसफुसाया, “देखो शारदा, कितने मेहनती माली मिले हैं हमें। वो भी बिना पगार के।”
शारदा ने मुँह पर पल्लू रख लिया, वरना उसकी हँसी बाहर तक सुनाई दे जाती।
घंटा बीता, फिर दूसरा। चोरों की बाँहें दुखने लगीं। एक ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा, “ये कुआँ है या समुंदर? ख़त्म ही नहीं हो रहा।”
“चुप कर और खींच,” दूसरा बोला। “सोने के सिक्के यूँ ही नहीं मिलते।”
सुबह होते-होते पूरा बग़ीचा पानी से तर हो चुका था। केले के पत्ते चमक रहे थे, और मिट्टी से सोंधी ख़ुशबू उठ रही थी।
सुबह का “ख़ज़ाना”
आख़िरकार, जब पूरब में हल्की लाली दिखने लगी, कुएँ का पानी इतना नीचे उतर गया कि संदूक का कोना दिखने लगा। चोरों ने काँटा फँसाकर उसे ऊपर खींचा। दोनों के हाथ काँप रहे थे, आधे थकान से और आधे ख़ुशी से।
उन्होंने ताला तोड़ा, ढक्कन उठाया, और… अंदर ईंटें और पत्थर।
दोनों कुछ देर तक संदूक को ऐसे देखते रहे जैसे उसे देखने से पत्थर सोने में बदल जाएँगे। तभी पीछे से आवाज़ आई।
“धन्यवाद, भाइयों!”
चोरों ने मुड़कर देखा। तेनालीराम दरवाज़े पर खड़ा मुस्कुरा रहा था। “इतनी गर्मी में मेरे बग़ीचे को तीन दिन से पानी नहीं मिला था। तुम्हारी मेहनत से आज सब हरा-भरा हो गया। बताओ, तुम्हारी मज़दूरी कितनी हुई?”
चोर भागने को मुड़े, पर तब तक तेनालीराम के बुलाए सिपाही, जिन्हें उसने रात में ही पड़ोसी के बेटे के हाथ ख़बर भिजवा दी थी, गली के दोनों सिरों पर खड़े थे। दोनों चोर, थके-माँदे और पानी से भीगे हुए, वहीं पकड़ लिए गए।
दरबार में हँसी
उसी दिन दरबार में जब यह क़िस्सा सुनाया गया, तो महाराज कृष्णदेव राय इतनी ज़ोर से हँसे कि पूरा दरबार हँस पड़ा।
“तेनाली,” महाराज बोले, “तुमने चोरों को पकड़वाया, सो तो ठीक है। पर उनसे अपने बग़ीचे की सिंचाई भी करवा ली? यह तुम्हीं कर सकते थे।”
तेनालीराम ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, लालच इंसान की आँखों पर पट्टी बाँध देता है। उन्हें कुएँ में सोना दिख रहा था, इसलिए रात भर पानी खींचते रहे। अगर यही मेहनत ईमानदारी से करते, तो आज किसी के खेत में काम करके इज़्ज़त की रोटी खा रहे होते।”
महाराज ने उसी समय तेनालीराम को इनाम दिया। और कहते हैं, उस साल तेनालीराम के बग़ीचे में ऐसे केले लगे कि पूरा मोहल्ला उनकी तारीफ़ करता रहा।
कहानी की सीख
घबराहट में नहीं, ठंडे दिमाग़ से सोचने वाला इंसान मुश्किल को भी मौके में बदल देता है। और लालच में की गई मेहनत आख़िर में ख़ाली हाथ ही छोड़ती है।
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