तंग बाज़ार की गली में शांत खड़े बीरबल, भौंकता हुआ कुत्ता और उसकी ओर मुड़ता सजा हुआ शाही हाथी

यह अकबर-बीरबल की एक लोकप्रिय पारंपरिक कहानी का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है।

सर्दियों की एक सुनहरी सुबह थी। फ़तेहपुर सीकरी के दरबार में धूप छनकर आ रही थी और बादशाह अकबर कुछ ज़्यादा ही अच्छे मूड में थे। उस दिन दरबार में बातें हो रही थीं तलवारों की, भालों की, तीर-कमानों की। कोई कहता, “जहाँपनाह, ईरान की तलवार का कोई जवाब नहीं।” कोई कहता, “नहीं हुज़ूर, राजपूतों का भाला सबसे घातक है।”

अकबर मुस्कुराते हुए सबकी सुनते रहे। फिर अचानक उन्होंने हाथ उठाया। दरबार में सन्नाटा छा गया।

“अच्छा, एक बात बताओ,” बादशाह बोले, “दुनिया का सबसे बड़ा हथियार कौन-सा है?”

दरबारियों के जवाब

सवाल सुनते ही दरबारियों में होड़ लग गई। एक सेनापति ने सीना ताना, “तलवार, जहाँपनाह! तलवार से बड़ा कुछ नहीं।”

दूसरे ने कहा, “तोप, हुज़ूर। एक गोला और पूरा क़िला ढह जाए।”

तीसरे ने तो हाथी गिनवा दिए, चौथे ने घोड़े। बात बढ़ती गई, आवाज़ें ऊँची होती गईं। अकबर की नज़र कोने में बैठे बीरबल पर पड़ी, जो चुपचाप सब सुन रहे थे और हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे थे।

“बीरबल, तुम चुप क्यों हो? तुम्हारी क्या राय है?”

बीरबल उठे, झुककर सलाम किया और बोले, “जहाँपनाह, मेरे हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है… आदमी की सूझबूझ और उसकी हिम्मत। मुसीबत की घड़ी में जो चीज़ हाथ लग जाए, समझदार आदमी उसी को हथियार बना लेता है।”

दरबार में कुछ लोग हँस पड़े। एक दरबारी ने तो धीरे से कह भी दिया, “बातें बनाना आसान है।”

अकबर ने भौंहें चढ़ाईं। “बीरबल, बात तो अच्छी है, पर साबित कर सकोगे?”

“वक़्त आने पर ज़रूर, हुज़ूर,” बीरबल ने शांति से जवाब दिया।

बादशाह की परीक्षा

अकबर के मन में यह बात अटक गई। कुछ दिन बाद उन्होंने एक योजना बनाई। शाही हाथीख़ाने में एक हाथी था, नाम था बादल। बहुत ताक़तवर, पर ज़रा गुस्सैल। बादशाह ने चुपके से महावत को बुलाया।

“कल सुबह जब बीरबल बाज़ार वाली तंग गली से दरबार आएँ, तो बादल को उनकी तरफ़ छोड़ देना। पर ध्यान रहे, तुम पीछे-पीछे रहना। बीरबल को खरोंच भी नहीं आनी चाहिए।”

महावत ने सिर झुका दिया, हालाँकि उसके चेहरे पर साफ़ घबराहट थी।

तंग गली में हाथी

अगली सुबह बीरबल हमेशा की तरह पैदल ही निकले। हाथ में न तलवार थी, न लाठी। बस कंधे पर एक शॉल और मन में आज के दरबार की बातें।

गली इतनी तंग थी कि दोनों तरफ़ की दीवारें लगभग छूती लगती थीं। अभी बीरबल आधे रास्ते पहुँचे ही थे कि सामने से ज़मीन हिलाती आवाज़ आई। धम… धम… धम…

बीरबल ने नज़र उठाई और उनका दिल एक पल को धक् से रह गया। सामने से बादल चिंघाड़ता हुआ चला आ रहा था। सूँड ऊपर, कान फड़फड़ाते हुए।

पीछे मुड़कर भागते तो भी फ़ायदा नहीं था। हाथी की चाल के आगे इंसान कितना दौड़ लेगा? दाएँ-बाएँ कोई दरवाज़ा खुला नहीं था। लोग छतों पर चढ़कर चिल्ला रहे थे, “भागो! बीरबल जी, भागो!”

पर बीरबल भागे नहीं। उन्होंने एक गहरी साँस ली। डरोगे, तो सोच नहीं पाओगे, उन्होंने ख़ुद से कहा।

उनकी नज़रें चारों तरफ़ दौड़ीं। तभी उन्हें दीवार के पास दुबका हुआ एक गली का कुत्ता दिखा, जो हाथी की आवाज़ सुनकर भौंकने लगा था। बीरबल के दिमाग़ में बिजली-सी कौंधी।

उन्होंने झट से कुत्ते को दोनों हाथों में उठाया और पूरी ताक़त से उसे हाथी के सामने, बगल वाले खुले चबूतरे की ओर उछाल दिया। कुत्ता चबूतरे पर गिरते ही उछला और ज़ोर-ज़ोर से भौंकता हुआ हाथी के पैरों के आस-पास चक्कर काटने लगा।

बादल ठिठक गया। इस छोटे-से भौंकते जीव ने उसका ध्यान पूरी तरह बाँट दिया। वह सूँड हिलाता हुआ कुत्ते की तरफ़ मुड़ा। कुत्ता फुर्ती से गली के मोड़ पर भाग निकला, और हाथी उसी के पीछे दो-चार क़दम बढ़ गया।

बस, यही वह पल था जिसका बीरबल को इंतज़ार था। वे फ़ौरन दूसरी तरफ़ के एक खुले आँगन में घुस गए और दरवाज़ा भेड़ लिया। तब तक महावत भी दौड़ता हुआ आ पहुँचा और उसने अंकुश से बादल को काबू में कर लिया।

कुत्ता? वह तो मोड़ पर एक दुकान के नीचे बैठा अपनी पूँछ हिला रहा था, बिल्कुल सही-सलामत।

दरबार में वापसी

उस दिन बीरबल दरबार में थोड़ी देर से पहुँचे। माथे पर पसीने की बूँदें थीं, पर चेहरे पर वही जानी-पहचानी मुस्कान।

अकबर ने अनजान बनते हुए पूछा, “क्या बात है बीरबल, आज देर कैसे हो गई?”

बीरबल ने सारा क़िस्सा सुना दिया। दरबारी हैरान होकर सुनते रहे। जो कल हँस रहे थे, आज उनकी आँखें फटी की फटी थीं।

अकबर ठहाका लगाकर हँसे। “बीरबल, सच कहूँ तो वह हाथी मैंने ही भेजा था। देखना चाहता था कि तुम्हारी बात में कितना दम है।”

बीरबल ने हाथ जोड़े। “जहाँपनाह, मैं समझ गया था कि यह कोई इत्तफ़ाक़ नहीं है। गली में महावत की पगड़ी पीछे दिख गई थी।”

पूरा दरबार हँसी से गूँज उठा।

फिर अकबर गंभीर होकर बोले, “आज मान गया। उस गली में तुम्हारे पास न तलवार थी, न भाला। फिर भी तुम बच निकले। क्योंकि तुम्हारे पास सबसे बड़ा हथियार था, ठंडा दिमाग़ और हिम्मत।”

“हुज़ूर,” बीरबल ने विनम्रता से कहा, “तलवार तभी काम आती है जब हाथ में हो। पर सूझबूझ हमेशा साथ रहती है। बस उसे डर के नीचे दबने नहीं देना चाहिए।”

बादशाह ने उसी समय बीरबल को मोतियों की एक माला इनाम में दी। और हाँ, उन्होंने महावत से कहा कि उस गली वाले कुत्ते को रोज़ एक कटोरा दूध और रोटी मिलनी चाहिए। आख़िर उस दिन असली मदद तो उसी ने की थी!

कहानी से सीख

मुश्किल वक़्त में घबराने से रास्ता बंद हो जाता है, जबकि शांत रहकर सोचने से रास्ता अपने-आप दिखने लगता है। बच्चों, याद रखना, सबसे बड़ा हथियार हमारी बुद्धि और हिम्मत है, जो हर पल हमारे साथ रहती है।

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