यह विक्रम-बेताल की एक पारंपरिक लोक कथा का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है।
अमावस की रात थी। श्मशान में चिताओं की राख अब भी कहीं-कहीं सुलग रही थी, और हवा में एक अजीब-सी ठंडक घुली हुई थी। राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर उस पुराने पीपल के पेड़ की ओर क़दम बढ़ाए, जिसकी डाल पर बेताल उल्टा लटका रहता था।
न डर, न झिझक। राजा ने तलवार कमर में खोंसी, पेड़ पर चढ़े और बेताल को उतारकर कंधे पर डाल लिया। फिर चुपचाप चल पड़े।
कुछ देर तक सन्नाटा रहा। फिर बेताल की खिलखिलाहट गूँजी।
“वाह राजन, वाह! तुम्हारी ज़िद भी कमाल की है। कितनी बार मैं भाग चुका हूँ, फिर भी तुम हर बार लौट आते हो।” उसने एक लंबी साँस ली। “ठीक है, रास्ता लंबा है। चलो, तुम्हारा मन बहलाने के लिए एक कहानी सुनाता हूँ। पर याद रखना, कहानी के आख़िर में एक सवाल पूछूँगा। जवाब जानते हुए भी चुप रहे, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े हो जाएँगे।”
विक्रम ने कुछ नहीं कहा। बेताल समझ गया कि राजा सुन रहे हैं।
दानी राजा का भोज
“बहुत पुरानी बात है,” बेताल ने शुरू किया। “धर्मपुर नाम का एक राज्य था। वहाँ के राजा हरिदत्त अपनी दानशीलता के लिए दूर-दूर तक मशहूर थे। कोई भूखा उनके दरवाज़े से ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। हर पूर्णिमा को वो महल के आँगन में बड़ा भोज रखते थे, जिसमें ब्राह्मणों, साधुओं और ग़रीबों को भरपेट खाना खिलाया जाता था।”
“उस बार भी पूर्णिमा आई। सुबह से ही रसोई में हलचल थी। बड़ी-बड़ी कड़ाहियों में पूड़ियाँ तली जा रही थीं, और आँगन के एक कोने में खुले में खीर का बड़ा-सा पतीला चढ़ा था, ताकि उसकी भाप बाहर निकलती रहे। रसोइया रामभरोसे बार-बार उसमें कलछी चलाता और ख़ुशबू पूरे महल में फैल जाती।”
“दोपहर होते-होते मेहमान आने लगे। पंगतें बैठ गईं। राजा हरिदत्त ख़ुद हाथ जोड़कर सबका स्वागत कर रहे थे।”
आसमान से गिरी मौत
बेताल की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई, जैसे वो ख़ुद उस पल में लौट गया हो।
“उसी वक़्त आसमान में एक चील उड़ती हुई आई। उसके पंजों में एक काला नाग दबा था, जिसे वो अभी-अभी खेतों से पकड़कर लाई थी। नाग छटपटा रहा था, फुफकार रहा था। चील महल के ऊपर से गुज़री, और ठीक खीर के पतीले के ऊपर नाग के मुँह से ज़हर की कुछ बूँदें टपक गईं।”
“किसी ने देखा नहीं। रसोइया उस वक़्त पूड़ियाँ गिनने में लगा था। चील आगे निकल गई, और ज़हर खीर में घुल गया।”
“थोड़ी देर बाद वही खीर एक बूढ़े ब्राह्मण के पत्तल में परोसी गई। उन्होंने बड़े प्रेम से पहला कौर खाया, राजा को आशीर्वाद दिया… और दूसरा कौर मुँह तक पहुँचने से पहले ही उनका हाथ काँपने लगा। आँखें पलट गईं, और वो वहीं पंगत में लुढ़क गए।”
“पूरे आँगन में हाहाकार मच गया। वैद्य दौड़े आए, पर तब तक देर हो चुकी थी। राजा हरिदत्त के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस भोज से वो पुण्य कमाना चाहते थे, उसी में एक निर्दोष की जान चली गई थी।”
बात का बतंगड़
“ख़बर आग की तरह फैली,” बेताल बोला। “उसी शाम एक ब्राह्मण दूसरे राज्य से राजा के दरबार की ओर आ रहा था। रास्ते में उसने एक औरत से पूछा, ‘बहन, राजा हरिदत्त का महल किधर है?'”
“औरत ने मुँह बिचकाया। ‘अरे, वहाँ मत जाना बाबा! वो राजा ऊपर से दानी बनता है, पर अंदर से हत्यारा है। आज ही उसने भोज में बुलाकर एक ब्राह्मण को ज़हर देकर मार डाला। पता नहीं तुम्हारे साथ क्या करे।'”
“औरत ने न कुछ देखा था, न किसी से ठीक से पूछा था। बस सुनी-सुनाई बात में अपना नमक-मिर्च मिलाया और आगे बढ़ा दिया।”
बेताल ठहाका मारकर हँसा, पर उस हँसी में कोई ख़ुशी नहीं थी।
“ऊपर, यमलोक में यमराज के दूत भी उलझन में पड़ गए थे। एक ब्राह्मण की मौत हुई थी, और ब्रह्महत्या का पाप किसी न किसी के खाते में लिखा जाना था। पर किसके?”
बेताल का सवाल
बेताल ने अपनी ठंडी उँगलियों से विक्रम का कंधा थपथपाया।
“तो बताओ राजन। नाग का? उसके मुँह से ज़हर टपका था। चील का? वही तो नाग को महल के ऊपर लेकर आई थी। रसोइये का? उसने पतीला खुला छोड़ा था। या राजा हरिदत्त का? भोज उन्हीं का था, खीर उन्हीं की थी। सोच-समझकर बोलना। चुप रहे तो याद है न क्या होगा?”
विक्रम कुछ पल चलते रहे। फिर बोले।
“बेताल, नाग का कोई दोष नहीं। वो तो ख़ुद मौत के मुँह में था, दर्द से तड़प रहा था। उसने जान-बूझकर किसी को नहीं मारा।”
“चील भी दोषी नहीं। वो अपना पेट भरने के लिए शिकार ले जा रही थी। यही उसका स्वभाव है, यही उसकी भूख।”
“रसोइये को भी क्या पता था कि आसमान से ज़हर बरसेगा? उसने तो पूरे मन से खाना बनाया था।”
“और राजा हरिदत्त? उन्होंने तो सेवा के भाव से भोज रखा था। जिसकी नीयत साफ़ हो, उस पर पाप नहीं चढ़ता।”
“तो फिर?” बेताल ने बेसब्री से पूछा।
“पाप उस औरत को लगेगा,” विक्रम ने शांत आवाज़ में कहा। “बाकी सब अनजाने में उस घटना का हिस्सा बने। पर उस औरत ने बिना जाने, बिना देखे, सिर्फ़ मज़े के लिए एक निर्दोष इंसान पर हत्या का इल्ज़ाम लगा दिया। उसने एक दुखी राजा के ज़ख़्म पर नमक छिड़का, और एक अनजान राहगीर के मन में ज़हर भर दिया। खीर का ज़हर तो एक जान ले गया, पर ज़ुबान का ज़हर न जाने कितनों का भरोसा मार देता है। सबसे बड़ा पाप उसी का है जो सच जाने बिना किसी को दोषी ठहरा दे।”
कुछ देर के लिए श्मशान की हवा भी जैसे रुक गई।
फिर बेताल ज़ोर से हँसा। “बहुत ख़ूब, राजन! जवाब बिल्कुल सही है। पर तुम भूल गए कि तुमने मुँह खोला, और मेरी शर्त टूट गई।”
इतना कहकर वो हवा में उड़ा और फिर से पीपल की उसी डाल पर जा लटका।
विक्रम ने एक गहरी साँस ली, मुड़े, और फिर से पेड़ की ओर चल पड़े। रात अभी बाकी थी, और उनका धैर्य भी।
कहानी से सीख
किसी के बारे में सुनी-सुनाई बात को सच मानकर आगे फैलाना बहुत आसान है, पर उसका नुक़सान बहुत गहरा होता है। बोलने से पहले सच जानिए, और अगर नहीं जानते, तो चुप रहना ही समझदारी है।
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