पहाड़ों की गोद में बसा था एक छोटा-सा गाँव, फूलगढ़। नाम फूलगढ़ था, पर उस साल वहाँ फूल कम ही खिले थे। बारिश देर से आई थी, और जब आई भी, तो जैसे जल्दी में थी। खेत आधे सूखे, आँगन के गमले उदास, और गाँव के बच्चों के चेहरों पर भी वह पहले वाली चहक नहीं थी।
इसी गाँव में रहती थी नौ साल की गुड्डी। दो चोटियाँ, फटी चप्पल, और हाथ में हमेशा एक पुरानी बाँस की बाँसुरी। वह बाँसुरी उसके दादाजी की थी। दादाजी कहते थे, “बाँसुरी फूँक से नहीं, मन से बजती है, बिटिया।” पर गुड्डी जब भी फूँकती, बाँसुरी से बस “फूँ… पीं…” जैसी आवाज़ निकलती।
“अरे, फिर से बकरी को डरा रही है क्या?” पड़ोस का राजू हँसता।
गुड्डी मुँह फुलाकर बैठ जाती। पर अगले दिन फिर बाँसुरी उठा लेती। उसे हार मानना आता ही नहीं था।
झील किनारे चाँदनी रात
एक रात गुड्डी को नींद नहीं आई। अम्मा सो चुकी थीं, दादाजी खाँसते-खाँसते करवट बदल रहे थे। गुड्डी चुपके से बाँसुरी उठाकर गाँव के पीछे वाली छोटी झील तक चली गई। वहाँ बैठकर वह धीरे-धीरे बजाने लगी। आवाज़ अब भी टूटी-फूटी थी, पर इस बार वह दादाजी के बारे में सोच रही थी। सोच रही थी कि काश दादाजी फिर से पहले की तरह हँस पाते।
तभी झील के पानी पर चाँदनी कुछ अलग ढंग से चमकी। जैसे किसी ने पानी पर चाँदी का दुपट्टा बिछा दिया हो। उसी रोशनी में से एक औरत बाहर आई। लंबे, चमकते बाल, हल्के नीले पंख, और आँखों में ऐसी मुस्कान जैसे वह गुड्डी को बरसों से जानती हो।
गुड्डी की बाँसुरी हाथ से छूटते-छूटते बची। “आप… आप कौन हैं?”
“डरो मत,” वह बोली, “मैं इस झील की परी रानी हूँ। बहुत दिनों बाद किसी ने यहाँ इतने सच्चे मन से बाँसुरी बजाई है।”
“सच्चे मन से?” गुड्डी ने नाक सिकोड़ी। “पर मेरी बाँसुरी तो बेसुरी है। सब हँसते हैं।”
परी रानी हँस पड़ीं। फिर उन्होंने अपनी हथेली खोली। उस पर एक पतली, चाँदी जैसी चमकती बाँसुरी रखी थी।
“यह जादुई बाँसुरी है,” उन्होंने कहा। “इसे बजाओगी तो जहाँ तक इसकी धुन जाएगी, वहाँ मुरझाए फूल खिल उठेंगे, थके चेहरे मुस्कुरा देंगे। पर एक बात याद रखना। यह तभी बजती है जब बजाने वाला दूसरों की खुशी के लिए बजाए। अपने घमंड के लिए फूँकोगी, तो यह चुप हो जाएगी।”
गुड्डी ने काँपते हाथों से बाँसुरी ली। “मैं ध्यान रखूँगी, परी रानी। पक्का।”
पलक झपकते ही परी रानी चाँदनी में घुल गईं। झील फिर से सामान्य हो गई। बस गुड्डी के हाथ में वह चमकती बाँसुरी रह गई।
जब पूरा गाँव खिल उठा
अगली सुबह गुड्डी ने आँगन में बैठकर पहली बार जादुई बाँसुरी बजाई। धुन ऐसी निकली कि खुद गुड्डी हैरान रह गई। मीठी, बहती हुई, जैसे पहाड़ी नदी पत्थरों से बात कर रही हो। और देखते ही देखते आँगन के सूखे गेंदे में पीली कलियाँ फूट पड़ीं।
दादाजी खाट पर उठकर बैठ गए। “ये… ये तू बजा रही है, गुड्डी?”
गुड्डी ने सिर हिलाया। दादाजी की आँखें भर आईं, और बरसों बाद वे खुलकर हँसे।
फिर तो जैसे गाँव में बहार आ गई। गुड्डी कभी पनघट पर बजाती, तो पानी भरती औरतें गुनगुनाने लगतीं। खेतों की मेड़ पर बजाती, तो सरसों के पौधे सिर उठाकर झूमने लगते। राजू भी अब नहीं हँसता था। बल्कि एक दिन उसने धीरे से पूछा, “गुड्डी, मुझे भी सिखाएगी?”
मेले का इनाम और चुप बाँसुरी
कुछ दिन बाद गाँव में बसंत का मेला लगा। मुखिया जी ने घोषणा की, “इस बार जिसका बगीचा सबसे सुंदर होगा, उसे चाँदी का कंगन इनाम में मिलेगा!”
गुड्डी के मन में लालच की एक छोटी-सी चिंगारी जली। “बस अपने आँगन में थोड़ी देर बजा दूँगी,” उसने सोचा, “तो सबसे सुंदर बगीचा मेरा ही होगा। अम्मा को कंगन मिलेगा, और सब कहेंगे, वाह गुड्डी!”
उस शाम वह अपने आँगन में बैठी और बाँसुरी होंठों से लगाई। मन में एक ही बात थी, मैं जीतूँगी, सब मेरी तारीफ़ करेंगे।
फूँक मारी। कुछ नहीं।
फिर फूँकी। बाँसुरी से हवा तो निकली, पर धुन नहीं। एक भी कली नहीं खिली।
गुड्डी घबरा गई। “क्या हुआ? टूट गई क्या?” उसने बाँसुरी को उलट-पलटकर देखा। चमक भी फीकी पड़ गई थी।
तभी उसे परी रानी की बात याद आई। अपने घमंड के लिए फूँकोगी, तो यह चुप हो जाएगी। गुड्डी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह देर तक चुपचाप बैठी रही।
भेड़ का बीमार मेमना
उसी रात गाँव के किनारे रहने वाली बूढ़ी चरवाहिन, कमला काकी, रोती हुई आईं। “गुड्डी बिटिया, मेरा छोटा मेमना दो दिन से कुछ खा नहीं रहा। बस आँखें बंद किए पड़ा है। वैद्य जी कल आएँगे, पर तब तक…”
गुड्डी ने एक पल भी नहीं सोचा। वह बाँसुरी उठाकर काकी के बाड़े की ओर दौड़ी। मेमना सचमुच बहुत कमज़ोर लग रहा था। गुड्डी उसके पास घुटनों के बल बैठी, और इस बार न कंगन याद आया, न मेला, न तारीफ़। बस यही मन था कि यह नन्हा जीव फिर से उछल सके।
उसने फूँका। और बाँसुरी फिर से गा उठी। पहले से भी ज़्यादा मीठी, पहले से भी ज़्यादा उजली।
धीरे-धीरे मेमने ने आँखें खोलीं, कान हिलाए, और काकी की हथेली से घास का तिनका खींच लिया। कमला काकी ने गुड्डी को गले लगा लिया। “भगवान तेरा भला करे, बिटिया।”
अगले दिन गुड्डी ने अपने आँगन में नहीं, पूरे गाँव के बीच वाले चौक पर बाँसुरी बजाई। हर घर के गमले खिल गए, हर बगीचा रंग से भर गया। मुखिया जी परेशान हो गए, “अब इनाम किसे दूँ? सबके बगीचे तो एक से बढ़कर एक हैं!”
आख़िर में फ़ैसला हुआ कि चाँदी के कंगन बेचकर उस पैसे से गाँव के स्कूल के लिए नई किताबें आएँगी।
परी रानी से आख़िरी मुलाक़ात
उस रात गुड्डी फिर झील किनारे गई। चाँदनी फिर से चमकी और परी रानी मुस्कुराती हुई सामने आईं।
“परी रानी,” गुड्डी ने सिर झुकाकर कहा, “मुझसे गलती हो गई थी। मैं इनाम के लिए बजाने बैठी थी।”
“जानती हूँ,” परी रानी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा। “पर तुमने गलती पहचानी, और फिर दूसरों के लिए बजाया। यही सबसे बड़ी बात है।”
गुड्डी ने जादुई बाँसुरी उनकी ओर बढ़ाई। “इसे आप रख लीजिए। मैं अब दादाजी वाली बाँसुरी ही बजाऊँगी।”
परी रानी ने बाँसुरी ली और हल्के से हँसीं। “पगली, असली जादू इस बाँसुरी में कभी था ही नहीं। जादू तुम्हारे मन में था। मैंने तो बस उसे सुनने का रास्ता दिखाया।”
और वे फिर चाँदनी में घुल गईं।
अगली सुबह गुड्डी ने दादाजी की पुरानी बाँस की बाँसुरी उठाई, आँखें बंद कीं और अम्मा, दादाजी, कमला काकी के मेमने, सबके बारे में सोचते हुए फूँका। इस बार “फूँ… पीं…” नहीं निकला। निकली एक साफ़, मीठी, छोटी-सी धुन।
दादाजी मुस्कुराए। “देखा, मैंने कहा था न? बाँसुरी मन से बजती है।”
कहानी की सीख
जो काम दूसरों की भलाई के लिए सच्चे मन से किया जाता है, उसमें सबसे बड़ा जादू होता है। घमंड और लालच अच्छे से अच्छे हुनर को भी चुप करा देते हैं।
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