यह सिंहासन बत्तीसी की एक पारंपरिक लोक कथा का अपने शब्दों में किया गया पुनर्कथन है।
धारा नगरी के पास एक छोटा-सा गाँव था। गाँव के बाहर खेतों के बीच मिट्टी का एक ऊँचा टीला था, जिस पर दिन भर गाय-भैंसें चरतीं और ग्वालों के बच्चे खेलते रहते। उन्हीं बच्चों में एक था चंदू। बाक़ी दिनों में वह भी उतना ही शरारती था जितने बाक़ी, पर जैसे ही टीले पर चढ़कर बैठता, उसकी आवाज़ बदल जाती, आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती।
गाँव वालों ने यह बात जल्दी ही पकड़ ली। किसी का झगड़ा होता, किसी की बकरी पड़ोसी के खेत में घुस जाती, किसी का बँटवारा अटक जाता, तो लोग कहते, “चलो, टीले वाले चंदू से पूछते हैं।”
और चंदू टीले पर बैठकर ऐसा फ़ैसला सुनाता कि दोनों पक्ष चुपचाप सिर झुका लेते। नीचे उतरते ही वह फिर वही नटखट बच्चा बन जाता, जिसे कुछ याद नहीं रहता।
बात उड़ते-उड़ते धारा के राजा भोज तक पहुँची। राजा भोज ख़ुद बड़े विद्वान थे, और उन्हें ऐसी बातों पर आसानी से भरोसा नहीं होता था। उन्होंने सोचा, “एक ग्वाला बालक, और ऐसा न्याय? ज़रूर इसमें कोई भेद है।”
टीले के नीचे क्या छिपा था
राजा भेस बदलकर गाँव पहुँचे। उनके सामने दो किसान आए, जो एक ही बछड़े पर अपना-अपना हक़ जता रहे थे। चंदू ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, “बछड़े को बीच में छोड़ दो और दोनों अपनी-अपनी गाय को अलग-अलग दिशा में ले चलो। बछड़ा जिसके पीछे दौड़े, वही उसकी माँ का मालिक है।”
बछड़ा रँभाता हुआ सीधा एक गाय के पीछे दौड़ पड़ा। झगड़ा वहीं ख़त्म।
राजा भोज मुस्कुराए, पर उनकी नज़र चंदू पर नहीं, उस टीले पर टिकी थी। उन्होंने चंदू को नीचे बुलाया और वही सवाल फिर पूछा। इस बार चंदू ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता, आप ही बता दो।”
राजा समझ गए कि करामात बालक में नहीं, उस मिट्टी में है।
अगले ही दिन राजा के आदेश पर टीले की खुदाई शुरू हुई। मज़दूर दिन भर फावड़े चलाते रहे। तीसरे दिन अचानक एक फावड़ा किसी सख़्त चीज़ से टकराया और खन्न की आवाज़ गूँजी। मिट्टी हटाई गई तो सबकी आँखें फटी रह गईं।
नीचे एक सिंहासन था। सोने का, जिसमें रत्न ऐसे जड़े थे मानो आसमान के तारे किसी ने तोड़कर लगा दिए हों। उसके चारों ओर बत्तीस पुतलियाँ खड़ी थीं, हर एक अलग मुद्रा में, जैसे अभी साँस लेकर कुछ बोल पड़ेंगी।
पहली पुतली की आवाज़
सिंहासन को साफ़ करवाकर धारा के दरबार में लाया गया। पंडितों ने शुभ मुहूर्त निकाला। पूरे नगर में ढोल बजे। राजा भोज नए वस्त्र पहनकर, बड़े चाव से सिंहासन की ओर बढ़े।
जैसे ही उन्होंने पहली सीढ़ी पर पाँव रखा, एक मीठी पर साफ़ आवाज़ आई, “रुकिए, राजन!”
दरबार में सन्नाटा छा गया। आवाज़ सिंहासन की पहली पुतली से आई थी। उसकी पत्थर जैसी आँखों में अब हल्की-सी चमक थी।
“मैं रत्नमंजरी हूँ,” पुतली बोली। “यह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का है। इस पर वही बैठ सकता है जो उनके जैसा दानी, साहसी और न्यायप्रिय हो। क्या आप ख़ुद को ऐसा मानते हैं?”
राजा भोज ठिठक गए। फिर विनम्रता से बोले, “देवी, मैं विक्रमादित्य के बारे में जानना चाहता हूँ। आप ही बताइए, वे कैसे थे?”
रत्नमंजरी के होंठों पर मुस्कान आई और उसने कहानी शुरू की।
अमर फल की कथा
“बहुत पहले अंबावती नाम का एक राज्य था, जहाँ राजा गंधर्वसेन राज करते थे। उनके बेटों में सबसे बड़े थे भर्तृहरि और उनके छोटे भाई थे विक्रम। पिता के बाद गद्दी भर्तृहरि को मिली। वे विद्वान थे, कवि थे, पर अपनी रानी पिंगला से इतना प्रेम करते थे कि राज-काज भी अक्सर भूल जाते।
एक दिन एक तपस्वी ब्राह्मण दरबार में आया और राजा को एक फल भेंट किया। बोला, ‘महाराज, यह अमर फल है। जो इसे खाएगा, वह कभी बूढ़ा नहीं होगा।’
भर्तृहरि ने सोचा, ‘मैं अमर होकर क्या करूँगा, अगर मेरी पिंगला न रहे?’ और उन्होंने फल रानी को दे दिया।
पर रानी का मन किसी और पर था, नगर के कोतवाल पर। उसने चुपके से फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक नर्तकी पर मोहित था, सो फल उसके पास पहुँच गया। और नर्तकी ने सोचा, ‘मैं अमर होकर क्या करूँगी? यह फल तो उस राजा के योग्य है जिसके राज में सब सुखी हैं।’ वह फल लेकर सीधे राजा भर्तृहरि के दरबार में पहुँच गई।
अपना ही दिया फल घूमकर अपने हाथ में देखा, तो भर्तृहरि का कलेजा जैसे बैठ गया। उन्होंने पूछताछ की और एक-एक कड़ी खुलती चली गई।
उस रात भर्तृहरि सो नहीं पाए। सुबह उन्होंने कहा, ‘जिस मोह को मैं सबसे बड़ा सच समझता था, वही सबसे कच्चा निकला।’ उन्होंने राजपाट छोड़ा, भगवा पहना और वन की ओर चल दिए।”
राजा भोज ध्यान से सुन रहे थे। रत्नमंजरी आगे बोली।
विक्रम और नगर का रक्षक
“राज्य सूना हो गया। मंत्रियों ने विक्रम को बुलाया, जो उन दिनों देश-देशांतर घूम रहे थे। पर एक मुश्किल थी। भर्तृहरि के जाने के बाद नगर पर एक शक्तिशाली देव का पहरा बैठ गया था। जो भी गद्दी पर बैठता, रात को देव उसे चुनौती देता, और अब तक कोई टिक नहीं पाया था।
विक्रम ने यह सुना तो डरे नहीं। उन्होंने कहा, ‘राजा वह नहीं जो गद्दी पर बैठे, राजा वह है जो प्रजा के डर को अपने कंधे पर उठा ले।’
राज्याभिषेक की रात विक्रम ने महल में खीर, मिठाई और सुगंधित फूल सजवाए और ख़ुद तलवार लेकर जागते रहे। आधी रात को देव प्रकट हुआ। उसने पकवान देखे, खाए, फिर गरजा, ‘तू कौन है जो मेरी नगरी का राजा बनने चला है?’
विक्रम ने बिना काँपे जवाब दिया, ‘मैं इस नगरी का सेवक हूँ। अगर लड़ना है तो लड़ लो, पर पहले बता दो, तुम्हें इस नगरी से चाहिए क्या?’
देव हैरान रह गया। आज तक किसी ने उससे यह नहीं पूछा था। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ, पर अंत में विक्रम के साहस के आगे देव झुक गया। उसने कहा, ‘जो राजा डर के आगे भी पहले प्रजा की बात सोचे, उसकी रक्षा मैं ख़ुद करूँगा।’ उस दिन से वह देव विक्रम का साथी बन गया।
विक्रम ने राज संभाला तो किसी को भूखा नहीं सोने दिया। उनके दरबार का दरवाज़ा हर किसी के लिए खुला रहता था। उनकी कीर्ति इतनी फैली कि स्वयं देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर उन्हें यह रत्नजड़ित सिंहासन भेंट किया, जिसकी रखवाली के लिए हम बत्तीस पुतलियाँ बनाई गईं।”
राजा भोज का उत्तर
कहानी ख़त्म हुई तो रत्नमंजरी ने राजा भोज की आँखों में देखा। “अब बताइए, राजन। क्या आपने कभी अपने सबसे प्यारे मोह को छोड़ा है? क्या आप डर के आगे भी पहले प्रजा का सोचते हैं?”
राजा भोज कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने पैर पीछे खींच लिया। “देवी, मैं ऐसा दावा नहीं कर सकता। आज मैं इस सिंहासन पर नहीं बैठूँगा।”
दरबार में फुसफुसाहट होने लगी, पर रत्नमंजरी मुस्कुराई। “जो राजा अपनी कमी मान ले, उसमें सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।”
इतना कहकर वह पुतली उड़ी और आकाश में ओझल हो गई। राजा भोज ने सिंहासन की ओर देखा, जहाँ अब भी इकतीस पुतलियाँ खड़ी थीं। उन्होंने मन ही मन तय किया कि वे फिर आएँगे। और अगली बार दूसरी पुतली अपनी कथा लेकर उनकी परीक्षा लेने वाली थी।
सीख: ऊँची कुर्सी पर बैठने से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा वह होता है जो मोह छोड़ सके, डर के आगे भी दूसरों का सोचे और अपनी कमी ईमानदारी से मान ले।
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