रामगढ़ के स्कूल मैदान में उस दिन धूल कुछ ज़्यादा ही उड़ रही थी। ज़िला स्तर की दौड़ का ट्रायल था, और पूरे गाँव की नज़रें एक ही लड़के पर टिकी थीं, किशन पर।
किशन चौदह बरस का था। पतला-दुबला, बाल हमेशा बिखरे हुए, और पैरों में ऐसे कैनवस के जूते जिनके तलवे कब के घिस चुके थे। पर दौड़ता था तो लगता था जैसे हवा ने उसे पीछे से धक्का दे दिया हो।
“आज तो किशन ही जीतेगा,” चाय की गुमटी पर बैठे रमेसर चाचा बोले।
“देखते हैं,” किसी ने हँसकर कहा, “शहर से भी लड़के आए हैं।”
वह दौड़ जो पूरी न हो सकी
सीटी बजी। आठ लड़के एक साथ निकले। पहले सौ मीटर में किशन सबसे आगे था। दूसरे सौ में भी। भीड़ से आवाज़ें आने लगीं, “किशन! किशन!”
और फिर आख़िरी मोड़ पर उसका दायाँ पैर एक ढीले पत्थर पर पड़ा। एक पल में सब उलट गया। वह मुँह के बल गिरा, घुटना छिल गया, और बाक़ी सात लड़के उसके पास से धूल उड़ाते निकल गए।
भीड़ एकदम चुप हो गई। फिर किसी कोने से एक हँसी आई। फिर दूसरी।
किशन उठा, लंगड़ाता हुआ लाइन तक पहुँचा, पर तब तक नतीजे लिखे जा चुके थे। आठ में से आठवाँ।
उस शाम वह घर नहीं गया। गाँव के बाहर पुराने बरगद के नीचे बैठा रहा, घुटने पर बँधी पट्टी को घूरता हुआ। मन में बार-बार वही हँसी गूँज रही थी।
भीखू दादा की घड़ी
अँधेरा होने लगा था जब भीखू दादा वहाँ आए। भीखू दादा गाँव के रिटायर्ड डाकिया थे। जवानी में चिट्ठियाँ बाँटने के लिए रोज़ बीस-बीस कोस साइकिल चलाते थे। उनकी जेब में हमेशा एक पुरानी स्टील की स्टॉपवॉच रहती थी, जो पता नहीं कहाँ से आई थी।
“यहाँ छुपकर बैठा है, पहलवान?” उन्होंने पास बैठते हुए पूछा।
“मैं पहलवान नहीं हूँ, दादा। मैं कुछ नहीं हूँ।” किशन की आवाज़ भर्रा गई। “सबने देखा। सब हँसे।”
दादा कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “गिरा कहाँ था तू?”
“आख़िरी मोड़ पर।”
“और उससे पहले?”
किशन ने सिर उठाया। “उससे पहले… सबसे आगे था।”
“तो फिर हारा कौन? तेरी टाँगें या तेरा पत्थर?” दादा मुस्कुराए। “बेटा, लोग नतीजा देखते हैं। मैं तो दौड़ देखता हूँ। और मैंने जो देखा, वह आठवें नंबर वाले लड़के की दौड़ नहीं थी।”
किशन कुछ नहीं बोला। पर उसकी आँखों में कुछ हिला।
“कल सुबह पाँच बजे, सरसों वाले खेत की पगडंडी पर,” दादा ने उठते हुए कहा। “आना हो तो आ जाना। न आना हो, तो भी कोई बात नहीं।”
सरसों के खेतों में सुबहें
अगली सुबह किशन आया। आधे मन से, पर आया।
दादा ने उससे तेज़ दौड़ने को नहीं कहा। उन्होंने कहा, “आज बस मोड़ पर ध्यान दे। हर मोड़ पर पैर कहाँ रखता है, देख।”
पहले हफ़्ते किशन चिढ़ता रहा। “दादा, इससे क्या होगा? मुझे तेज़ होना है।”
“तू तेज़ है,” दादा कहते। “तुझे भरोसे वाला बनना है। जो लड़का अपने हर क़दम पर भरोसा करता है, वह गिरता नहीं। और गिरे भी, तो उठने में वक़्त नहीं लगाता।”
दिन बीतते गए। सुबह की धुंध में किशन दौड़ता, दादा स्टॉपवॉच दबाते और कभी कुछ नहीं बताते कि समय कितना आया। एक दिन किशन ने ज़िद की, “आज तो बता दो!”
दादा ने घड़ी जेब में डाल ली। “जिस दिन तुझे घड़ी की ज़रूरत न रहे, उस दिन बताऊँगा।”
गाँव में बातें भी हुईं। “बुड्ढा डाकिया लड़के को पागल बना रहा है,” किसी ने कहा। स्कूल में दो-एक लड़के अब भी उसे “आठवाँ नंबर” कहकर पुकारते। पहले यह बात किशन को चुभती थी। धीरे-धीरे उसने ध्यान देना छोड़ दिया। उसके पास सुनने के लिए अपनी साँसें थीं, अपने पैरों की थाप थी।
एक सुबह वह मोड़ पर फिसला। पर इस बार गिरा नहीं, सँभल गया, और उसी रफ़्तार में आगे बढ़ गया। पीछे से दादा की हँसी सुनाई दी, ऊँची और खुली।
“देखा?” उन्होंने चिल्लाकर कहा। “यही तो सीखना था!”
एक साल बाद वही मैदान
अगले बरस फिर ट्रायल हुआ। वही मैदान, वही धूल, वही भीड़। कुछ लोग इस बार भी हँसने के लिए आए थे, यह किशन जानता था।
लाइन पर खड़े होने से पहले उसने भीड़ में नज़र दौड़ाई। भीखू दादा पेड़ के नीचे खड़े थे, हाथ में वही स्टॉपवॉच।
सीटी बजी।
इस बार किशन सबसे आगे नहीं निकला। शुरू में वह तीसरे नंबर पर था, आराम से, अपनी लय में। लोगों को लगा, बस, हो गया इस बार भी। पर आख़िरी मोड़ आया, वही मोड़, और किशन ने वहीं अपनी रफ़्तार बढ़ाई। उसके पैर ज़मीन पर ऐसे पड़ रहे थे जैसे उसे हर पत्थर की जगह याद हो।
एक को पीछे छोड़ा। फिर दूसरे को।
फ़िनिश लाइन पार करते वक़्त उसके और दूसरे लड़के के बीच पूरे चार क़दम का फ़ासला था।
भीड़ इस बार भी कुछ पल चुप रही। फिर तालियाँ बजीं, और रमेसर चाचा ने अपना गमछा हवा में उछाल दिया।
घड़ी का राज़
भीड़ छँटी तो किशन दौड़कर दादा के पास गया। साँस फूली हुई थी, पर चेहरा चमक रहा था। “दादा, अब तो बता दो, समय कितना आया?”
दादा ने स्टॉपवॉच उसकी हथेली पर रख दी। किशन ने देखा, सुई अपनी जगह से हिली ही नहीं थी।
“यह तो… ख़राब है?”
“बरसों से,” दादा हँसे। “मैंने कभी तेरा समय नापा ही नहीं, बेटा। मैं तो बस यह देखना चाहता था कि तू घड़ी के भरोसे दौड़ता है या अपने भरोसे।”
किशन देर तक उस बंद घड़ी को देखता रहा। फिर उसने उसे दादा को लौटाया नहीं, अपनी जेब में रख लिया।
“यह मैं रखूँगा,” उसने कहा। “ताकि याद रहे कि पिछली बार मैं हारा नहीं था। बस गिरा था।”
कहानी की सीख
गिरना हार नहीं है। हार तब होती है जब हम दूसरों की हँसी को अपनी आवाज़ बना लेते हैं। आत्मविश्वास किसी तालियों से नहीं आता, वह उन सुबहों से आता है जब कोई देख नहीं रहा होता और हम फिर भी दौड़ते हैं।
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