यह कथा पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है और यहाँ इसे अपने शब्दों में सुनाया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके रूप थोड़े अलग मिलते हैं।
कार्तिक का महीना था और शाम ढलते ही आँगन में हल्की ठंडक उतर आई थी। दादी ने तुलसी के चौरे को गोबर से लीपा, चारों ओर रंगोली बनाई और चार गन्ने खड़े करके उनके सिरों को लाल धागे से बाँध दिया। देखते-देखते तुलसी के पौधे के ऊपर एक छोटा-सा मंडप तैयार हो गया।
दस साल की गुड्डी बड़ी देर से यह सब देख रही थी। आख़िर उससे रहा नहीं गया। “दादी, ये गन्ने का घर किसके लिए बना रही हो?”
“घर नहीं बिटिया, मंडप है,” दादी मुस्कुराईं। “आज तुलसी मैया का ब्याह है।”
छोटा चिंटू, जो अब तक गन्ने का एक टुकड़ा हथियाने की जुगत में लगा था, हँस पड़ा। “पौधे की भी शादी होती है क्या?”
“होती है, और बड़ी धूमधाम से होती है।” दादी ने दीया जलाया, आँचल से हाथ पोंछे और चौकी पर बैठ गईं। “आओ, पहले कथा सुन लो। फिर समझ आएगा कि आज का दिन इतना ख़ास क्यों है।”
भगवान की चार महीने की नींद
“आषाढ़ के महीने में एक एकादशी आती है, देवशयनी एकादशी,” दादी ने शुरू किया। “मान्यता है कि उस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। पूरे चार महीने वो विश्राम करते हैं। इसीलिए इन महीनों में शादी-ब्याह नहीं होते।”
“चार महीने सोते रहते हैं?” चिंटू की आँखें फैल गईं। “मुझे तो मम्मी सात बजे ही उठा देती है।”
गुड्डी ने उसे कोहनी मारी। दादी हँस दीं। “फिर कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान जागते हैं। उसी को देवउठनी या देवोत्थान एकादशी कहते हैं। उस दिन से फिर शुभ काम शुरू होते हैं। और सबसे पहला ब्याह होता है तुलसी जी का, भगवान शालिग्राम के साथ।”
“पर क्यों, दादी? तुलसी जी ही क्यों?” गुड्डी ने पूछा।
दादी ने एक लंबी साँस ली। “इसके पीछे एक बड़ी पुरानी कथा है। थोड़ी मीठी है, थोड़ी दुख भरी भी।”
वृंदा की अटूट भक्ति
“बहुत पहले की बात है। जलंधर नाम का एक बहुत ताक़तवर असुर था। उसकी पत्नी का नाम था वृंदा। वृंदा भगवान विष्णु की बड़ी भक्त थी। सुबह-शाम उनका नाम लेती और पूजा करती।
कहते हैं, वृंदा का पतिव्रत और उसकी भक्ति इतनी पवित्र थी कि वो जलंधर के लिए कवच बन गई थी। जब तक वृंदा का व्रत अटूट था, तब तक कोई भी जलंधर को हरा नहीं सकता था, देवता भी नहीं।
अब ताक़त मिल जाए तो अक्सर घमंड भी साथ चला आता है। जलंधर के साथ भी यही हुआ। उसने स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी और ऋषि-मुनियों को सताने लगा। तब देवता घबराकर भगवान शिव की शरण में पहुँचे, और फिर भगवान विष्णु के पास भी।”
“तो भगवान ने उसे हरा दिया?” चिंटू ने बेचैनी से पूछा।
“इतना आसान नहीं था, बेटा। भगवान शिव और जलंधर में भयंकर युद्ध हुआ, पर जलंधर हार ही नहीं रहा था। उसकी ढाल तो वृंदा की भक्ति थी न।”
एक छल, और एक श्राप
दादी की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई। “तब भगवान विष्णु ने एक कठिन फ़ैसला लिया। संसार को बचाने के लिए उन्होंने जलंधर का रूप धरा और वृंदा के पास पहुँच गए। वृंदा ने समझा कि उसका पति युद्ध से लौट आया है। वो ख़ुशी-ख़ुशी उनके चरण छूने बढ़ी, और जैसे ही उसने उन्हें अपना पति मानकर छुआ, उसका व्रत टूट गया।
उसी पल युद्ध के मैदान में जलंधर की शक्ति ख़त्म हो गई, और भगवान शिव ने उसका अंत कर दिया।”
आँगन में एकदम सन्नाटा छा गया। गुड्डी धीरे से बोली, “पर दादी, ये तो… वृंदा के साथ ग़लत हुआ न?”
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “हाँ बिटिया, वृंदा को भी यही लगा। जब उसे सच्चाई पता चली तो उसका दिल टूट गया। जिसे वो सबसे ज़्यादा पूजती थी, उसी ने उसके साथ छल किया था। दुख और गुस्से में उसने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया, ‘तुमने पत्थर जैसा कठोर काम किया है, जाओ, तुम भी पत्थर बन जाओ।’
और कहते हैं, भगवान ने वो श्राप चुपचाप स्वीकार कर लिया। वो शिला बन गए। उसी काले, चिकने पत्थर को आज हम शालिग्राम कहते हैं।”
वृंदा से तुलसी तक
“फिर क्या हुआ?” गुड्डी ने पूछा।
“चारों ओर हाहाकार मच गया। भगवान ही पत्थर बन जाएँ तो संसार कैसे चले? देवी लक्ष्मी ने वृंदा से विनती की। वृंदा का मन पिघल गया और उसने श्राप वापस ले लिया। पर उसका अपना दुख कम नहीं हुआ। पति के जाने के शोक में उसने भी अपने प्राण त्याग दिए।
मान्यता है कि जहाँ वृंदा का शरीर पंचतत्व में मिला, वहाँ एक नन्हा-सा पौधा उग आया। हरी-हरी पत्तियाँ, भीनी-सी ख़ुशबू। भगवान विष्णु ने उस पौधे को देखकर कहा, ‘वृंदा, अब तुम तुलसी कहलाओगी। तुम मुझे लक्ष्मी जितनी ही प्रिय रहोगी। तुम्हारे बिना मेरी कोई पूजा पूरी नहीं होगी। और हर साल, जिस दिन मैं निद्रा से जागूँगा, उस दिन मेरे शालिग्राम रूप से तुम्हारा विवाह होगा।'”
दादी ने तुलसी की ओर इशारा किया। “इसीलिए आज घर-घर में तुलसी जी का ब्याह होता है।”
आँगन का ब्याह
कथा ख़त्म हुई तो गुड्डी कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “दादी, अब मुझे ये सिर्फ़ पौधा नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है जैसे वृंदा अब भी यहीं हैं।”
इसके बाद तैयारी ज़ोर-शोर से शुरू हो गई। गुड्डी ने तुलसी जी को लाल चुनरी ओढ़ाई। माँ चूड़ियाँ और बिंदी ले आईं। पापा ने पीतल की थाली में शालिग्राम जी को रखा और उन पर पीला वस्त्र चढ़ाया। चिंटू को सबसे बड़ा काम मिला, शंख बजाने का।
दादी ने शालिग्राम जी को हाथ में लेकर तुलसी के चारों ओर सात फेरे करवाए। माँ ने मंगल गीत गाए। फिर सबने मिलकर थाली बजाई और ज़ोर से कहा, “उठो देव, बैठो देव…” भगवान को जगाने की रस्म पूरी हुई।
आख़िर में दादी ने सबको गन्ने के टुकड़े, शकरकंद और सिंघाड़े का प्रसाद बाँटा। चिंटू जिस गन्ने के पीछे शाम से पड़ा था, वो आख़िरकार उसके हाथ में था।
प्रसाद खाते-खाते गुड्डी ने पूछा, “दादी, भगवान ने वृंदा के साथ छल क्यों किया? क्या भगवान से भी ग़लती होती है?”
दादी देर तक दीये की लौ को देखती रहीं। फिर बोलीं, “बिटिया, ये सवाल तो बड़े-बड़े ज्ञानी भी पूछते आए हैं। मुझे तो बस इतना समझ आता है कि भगवान ने अपनी बात छिपाई नहीं। उन्होंने श्राप सिर झुकाकर लिया और वृंदा को इतना ऊँचा मान दिया कि आज करोड़ों घरों में उसकी पूजा होती है। जो अपनी भूल मान ले और उसे सुधारने में लग जाए, असल में वही बड़ा होता है।”
गुड्डी ने धीरे से सिर हिलाया। दीये की रोशनी में तुलसी की पत्तियाँ हल्के-हल्के हिल रही थीं, जैसे वो भी इस बात से सहमत हों।
कथा से सीख
सच्ची भक्ति और सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाते। वृंदा का दुख भी पूजनीय बन गया, और यह कथा सिखाती है कि अपनी भूल स्वीकारना कमज़ोरी नहीं, बड़प्पन है। सच का साथ देने वाले का मान हमेशा बढ़ता है, यही बात ईमानदार लकड़हारे और सोने की कुल्हाड़ी की कहानी में भी दिखती है। अगर आपके घर में भी दादी-नानी की कहानियों वाली शामें होती हैं, तो बच्चों को चालाक लोमड़ी और अंगूर की बेल वाली पंचतंत्र की कहानी भी ज़रूर सुनाइए। ऐसी और धार्मिक एवं पौराणिक कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे साथ बने रहिए।
त्योहारों की रातों में थोड़ा रहस्य भी पसंद हो, तो नानी की यादों से जुड़ी कहानी पुरानी हवेली की तीसरी मंज़िल भी ज़रूर पढ़िए।
