बस अड्डे पर चाय की दुकान पर किताब पढ़ती बेटी और उसे गर्व से देखते चाय वाले पिता का चित्र

यह एक काल्पनिक कहानी है। इसके पात्र और जगहें लेखक की कल्पना से गढ़ी गई हैं।

बिलासगंज के बस अड्डे पर सुबह पाँच बजे सबसे पहले जो चीज़ जागती थी, वो थी रामदीन की केतली। लोहे की पुरानी अँगीठी, उस पर काली पड़ चुकी केतली, और बगल में टीन की एक बेंच। यही थी “रामदीन टी स्टॉल”। बोर्ड पर नाम तो लिखा था, पर आधे अक्षर बारिश में बह चुके थे।

रामदीन की बेटी सुनीता उस वक़्त ग्यारह साल की थी। स्कूल जाने से पहले वह रोज़ पापा के साथ स्टॉल पर आती, कुल्हड़ धोती, अदरक कूटती और बीच-बीच में अपनी किताब खोलकर पढ़ती रहती। बसों का शोर, कंडक्टरों की आवाज़ें, ग्राहकों की चिल्लाहट… इन सबके बीच वह ऐसे पढ़ती थी जैसे आसपास कुछ हो ही नहीं रहा।

“अरे रामदीन, बिटिया को पढ़ाकर क्या करोगे? आख़िर में तो चूल्हा ही सँभालना है,” एक दिन रोज़ आने वाले ठेकेदार साहब ने हँसते हुए कहा।

रामदीन ने चाय छानते हुए जवाब दिया, “साहब, चूल्हा तो मैं भी सँभाल रहा हूँ। मेरी बेटी कुछ और सँभालेगी।”

सुनीता ने किताब से नज़र उठाई। उसने कुछ कहा नहीं, बस वह बात मन में कहीं गहरे बैठ गई।

वह रात जिसने सपना दिया

सुनीता की माँ अक्सर बीमार रहती थीं। एक रात उन्हें तेज़ बुखार हुआ और साँस फूलने लगी। रामदीन उन्हें रिक्शे में बिठाकर कस्बे के सरकारी अस्पताल ले गया। वहाँ एक ही डॉक्टर थीं, डॉक्टर शालिनी। रात के दो बजे भी वे पूरे धैर्य से मरीज़ों को देख रही थीं।

सुनीता दरवाज़े के पास खड़ी सब देखती रही। डॉक्टर ने माँ की नब्ज़ देखी, दवा दी, और फिर रामदीन से कहा, “घबराइए मत, सुबह तक ठीक हो जाएँगी।”

उस एक वाक्य से पापा के चेहरे पर जो राहत आई, सुनीता उसे कभी नहीं भूली। लौटते वक़्त रिक्शे में उसने धीरे से पूछा, “पापा, डॉक्टर बनने के लिए क्या करना पड़ता है?”

रामदीन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “बहुत पढ़ना पड़ता है बेटा। और बहुत पैसा भी लगता है।”

“पढ़ाई मैं कर लूँगी,” सुनीता ने कहा। “पैसे का कुछ सोच लेंगे।”

रामदीन हँस पड़ा, पर उसकी आँखें भीग गईं।

केतली की भाप और किताबों के पन्ने

उसके बाद सुनीता का दिन और लंबा हो गया। सुबह स्टॉल, फिर स्कूल, शाम को फिर स्टॉल, और रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई। बिजली अक्सर चली जाती थी, तो वह बस अड्डे की स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठ जाती। आने-जाने वाले ड्राइवर उसे पहचानने लगे थे।

“ए डॉक्टरनी, एक कड़क चाय!” बस वाले मज़ाक में कहते।

सुनीता मुस्कुराकर चाय बढ़ा देती। उसे अब इस नाम से चिढ़ नहीं होती थी। उसे लगता था, लोग मज़ाक में ही सही, उसका सपना रोज़ दोहरा रहे हैं।

दसवीं में वह पूरे ज़िले में तीसरे नंबर पर आई। अख़बार में छोटी-सी ख़बर छपी। रामदीन ने वह कतरन काटकर स्टॉल के खंभे पर चिपका दी और हर ग्राहक को दिखाता, “ये देखो, मेरी बिटिया।”

पर असली लड़ाई तो अब शुरू होनी थी।

पहली हार

बारहवीं के बाद सुनीता ने मेडिकल की प्रवेश परीक्षा दी। कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे, तो उसने पुरानी किताबें माँगकर और लाइब्रेरी में बैठकर तैयारी की थी। नतीजा आया तो उसका नाम लिस्ट में नहीं था। कुछ ही नंबरों से रह गई थी।

उस शाम वह स्टॉल पर नहीं आई। घर की कोठरी में चुपचाप बैठी रही। रिश्तेदारों के ताने पहले से तैयार थे। “हमने तो पहले ही कहा था। अब शादी की सोचो।”

सुनीता के मन में भी एक आवाज़ उठी, कि शायद ये सपना ही उसके लायक़ नहीं था। जैसे लोमड़ी ने अंगूर न मिलने पर उन्हें खट्टा कह दिया था, वैसे ही वह भी कह सकती थी कि डॉक्टरी में रखा ही क्या है। पर उसे पता था, यह झूठ होगा।

रात को रामदीन उसके पास आकर बैठ गया। उसके हाथ में चाय का एक कुल्हड़ था।

“जानती है, जब मैंने ये स्टॉल शुरू किया था, तो पहले महीने एक दिन में सिर्फ़ चार चाय बिकती थीं,” उसने कहा। “मैं रोज़ सोचता, कल बंद कर दूँगा। पर अगली सुबह फिर अँगीठी जला देता था। आज देख, पूरा अड्डा मेरी चाय पीता है।”

सुनीता ने पापा की ओर देखा।

“एक साल और,” रामदीन ने कहा। “पैसे की चिंता मत कर। मैं रात की बसों के लिए भी स्टॉल खुला रखूँगा।”

“नहीं पापा, आप पहले ही बहुत थक जाते हो।”

“थकान तो सो जाने से उतर जाती है,” वह मुस्कुराया। “पर अधूरा सपना ज़िंदगी भर चुभता है।”

दूसरी कोशिश

उस साल सुनीता ने अपनी गलतियों को एक-एक करके लिखा। कौन-से अध्याय कमज़ोर थे, कहाँ समय बर्बाद हुआ, किन सवालों में जल्दबाज़ी की। उसने कस्बे के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, ताकि अपनी किताबों का ख़र्च ख़ुद निकाल सके।

रामदीन ने अपनी बात रखी। रात की आख़िरी बस तक स्टॉल खुला रहता। कई बार सुनीता देर रात उसके पास जाकर बैठती और वहीं किताब खोल लेती। केतली की भाप उठती रहती और वह फ़ॉर्मूले दोहराती रहती।

एक दिन वही ठेकेदार साहब फिर आए। “क्या रामदीन, अब भी बिटिया को पढ़ा रहे हो?”

इस बार जवाब सुनीता ने दिया, बहुत शांति से। “जी अंकल। अगले साल आपकी चाय के पैसे शायद मैं न ले पाऊँ। तब तक मैं किसी अस्पताल में रहूँगी।”

ठेकेदार साहब कुछ नहीं बोले। चुपचाप चाय पी और चले गए।

वह सुबह

नतीजे का दिन आया। मोबाइल पर वेबसाइट बार-बार अटक रही थी। सुनीता के हाथ काँप रहे थे। रामदीन स्टॉल पर था, ग्राहकों को चाय दे रहा था, पर उसका ध्यान बार-बार बेटी के चेहरे पर जा रहा था।

फिर स्क्रीन पर नतीजा खुला। सुनीता ने उसे दो बार पढ़ा, फिर तीसरी बार। उसका चयन सरकारी मेडिकल कॉलेज में हो गया था।

वह दौड़कर पापा के पास गई और कुछ बोल नहीं पाई। बस मोबाइल आगे कर दिया। रामदीन ने स्क्रीन देखी, फिर केतली नीचे रखी और पूरे बस अड्डे के सामने ज़ोर से बोला, “आज सबकी चाय मेरी तरफ़ से!”

उस दिन बिलासगंज के बस अड्डे पर किसी ने पैसे नहीं दिए, पर हर किसी ने सुनीता को दुआ दी।

कई साल बाद

आज उसी कस्बे के सरकारी अस्पताल में एक नई डॉक्टर बैठती हैं। रात के दो बजे भी वे पूरे धैर्य से मरीज़ों को देखती हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी डॉक्टर शालिनी देखती थीं।

हर सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले डॉक्टर सुनीता बस अड्डे पर रुकती हैं। एक कुल्हड़ चाय पीती हैं और पापा से पूछती हैं, “आज कितनी बिकीं?”

रामदीन हँसकर कहता है, “जितनी भी बिकीं, सब तेरे नाम की।”

खंभे पर चिपकी अख़बार की वह पुरानी कतरन अब पीली पड़ चुकी है। उसके बगल में अब एक नई तस्वीर लगी है, सफ़ेद कोट पहने एक लड़की की, जो कभी इसी बेंच पर बैठकर पढ़ती थी।

कहानी से सीख

हालात कितने भी कठिन हों, अगर इरादा पक्का हो और कोई साथ खड़ा हो, तो सपने पूरे होते हैं। हार आख़िरी पड़ाव नहीं होती, वह बस अगली कोशिश की तैयारी होती है। और जैसे ईमानदार लकड़हारे माधो ने मुश्किल में भी अपना रास्ता नहीं छोड़ा, वैसे ही सच्ची मेहनत का रास्ता भी कभी ख़ाली हाथ नहीं लौटाता। ऐसी और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे साथ बने रहिए।

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