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कैसे मुक्त हुआ यज्ञधन शाप से

ऋषि हरी अपनी पत्नी के साथ गोतमी गंगा के तट पर आश्रम बनाकर निवास करते थे | एक बार वे यज्ञ आरभ कर इंद्र, अग्नि, सोम आदि देवगण को भोग लगाने के लिए पकवान बनाने लगे | उसी समय वहा पर एक भयंकर पुरुष प्रकट हुआ और देखते ही देखते सारे पकवान खा गया | यह देखकर ऋषि क्रोधित होकर बोले – “दुष्ट तू कोन है जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है | जल्दी अपना परिचय दे, अन्यथा में तुझे अभी भस्म कर दुगा |”

उनकी यह बात सुनकर वो डर गया और विन्रम होकर बोला – “ हे मुनिवर | मेरा नाम यज्ञधन है | में संध्या और प्राचीनबऋषि का पुत्र हु | पितामह ने मुझे यज्ञो का भक्षण करने का वरदान दिया है | इसलिए में आपका यज्ञ नष्ट करने यहाँ आया हु |”

तभी ऋषि हरी बोले, “यज्ञधन | यज्ञ की रक्षा करना प्रतेक मानव का धर्म है,, इसलिए तुम भी मेरे यज्ञ की रक्षा करो | में जनता हु की तुम यज्ञ का नाश करने वाले हो और यही तुम्हारा स्वभाव है, लेकिन फिर तुम से मेरी यह विनती है की तुम मेरा अनुरोध स्वीकार करो |”

यह सब सुन कर यज्ञधन अपनी पूर्व जन्म का शाप बताने लगा, उसने कहा हे ऋषिवर पूर्वकाल में पितामह ने मुझे शाप दिया था, किंतु बाद में मेरी आराधना से प्रसन्न होकर उन्होंने कहा, की जब कोई श्रेष्ठ ऋषि मेरे उपर अम्रत का छींटा देगा, तब में शाप से मुक्त हो जाऊगा| इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है | इसलिए हे मुनिश्रेष्ठ आप मेरा उदार करे | फिर में आप के यज्ञ की रक्षा कर आपकी मनोकामना पूर्ण कर सकुगा |

यह सुनकर ऋषि चकित हो गए और बोले हे यज्ञधन, ये कैसे संभव है | देवताओ और देत्यो ने श्रीरसागर का मंथन कर बढ़ी कठनाई से अम्रत प्राप्त किया था | वह मुझे कैसे प्राप्त हो सकता है? यह एक असंभव कार्य है, इसलिए कोई और वस्तु मांग लो|”

यज्ञधन बोला – हे ऋषिवर ! गोतमी गंगा का पवित्र जल, स्वर्ण और गाय का घी – अम्रत-तुल्य कहे गए है | आप इन सबका इस्तेमाल करके मेरा अभिषेक करे | यदि ये वस्तुए सुलभ न हो तो केवल गोतमी गंगा के जल से ही मेरा उदहार करे | वह सबसे उत्क्रष्ट और दिव्य अम्रत है |”

यह सुनकर ऋषि बहुत अत्यधिक प्रसन्न हुए | उन्होंने अपनी पत्नी को कह कर गोतमी गंगा से जल मंगवा लिया और हाथ में लेकर उससे यज्ञधन का अभिषेक किया | इससे यज्ञधन शाप मुक्त हो गया और यज्ञधन ने अपना भी किया हुआ वादा किया ऋषि से | ऋषि हरी ने अपना यज्ञ पूरा किया उसके सरक्षण पूर्ण किया |

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