बहुत पुरानी बात है एक गाँव में एक शिकारी रहता था वह बड़ा क्ररू, असत्यवादी और पाप में सलंग्न रहने वाला प्राणी था | एक बार वह जंगले में शिकार करने गया | वहा उसने बहुत सारे जानवर और पक्षियों को पकड़कर पिंजरे में बंद कर लिया | अनेक म्रगो का वध किया | इस प्रकार सारा दिन बीत गया | श्याम होते ही वह अपने घर जा रहा था की अचानक आकाश में काले काले बादल आ गए और थोड़ी ही देर में मुसलाधार वर्षा सुरु हो गई | तब वह शिकारी एक विशाल व्रक्ष के निचे बेठ गया |
उस व्रक्ष पर कबूतर और कबूतरी का एक जोड़ा रहता था प्रर्तिदीन की भांति उस दिन भी वे दोनों दाना चुगने वन में गए हुए थे, किन्तु अब तक सिर्फ कबूतर ही अपने घोसले में लोटा था| कबूतरी को वहा ना देख कर वह विलाप करने लगा | रोने की अवाज सुन कर, कबूतरी ने जोर से अवाज दी, “में यहाँ पिंजरे में केद हु |”
अवाज सुनकर कबूतर जल्दी से पिंजरे के पास गया और उसको बाहर निकालने का प्रत्यन करने लगा | तब कबूतरी बोली, “स्वामी, इससे तोडना असंभव है, आप चले जाओ यहाँ से | यह सब विधि के विधान के अनुसार है | इसमें किसी का दोष नहीं है | और एक बात, इस समय यह शिकारी हमारे घर पर आया है और अतिथि भगवान का रूप होता है | इस समय यह मुसीबत में है और आप को किसी तरह इसकी मदद करनी है |
यह बात सुन कर कबूतर जल्दी से उड़ कर कही से जलती हुई लकड़ी अपनी चोंच्मे दबाकर ले आया और शिकारी के सामने रखकर उसमे सूखे पत्ते, लकड़ी, और तिनके डालने लगा| देखते – ही – देखते उसमेऔर आग लग गई| यह सब देख कर शिकारी हेरान रह गया |
तभी कबूतर बोला, “हे शिकारी, तुम हमारे अतिथि हो और इस समय भूख से पीड़ित हो | इसलिए में इस अग्नि में प्रवेश कर रहा हु, तुम मेरे मांस खा लेना और अपनी भूख शांत कर लेना | यह कहकर कबूतर अग्नि में कूद गया | यह देखकर शिकारी का ह्रदय करुणा से भर गया | तभी कबूतरी बोली, “हे शिकारी मुझे भी छोड़ दीजिये| मेरे पति मुझसे दूर जा रहे है|” यह सुनकर शिकारी ने कबूतरी को मुक्त कर दिया और खुद भी अग्नि में कूद गई | तभी देखते – देखते आकाश में से एक दिव्य विमान उतरा और वे दोनों दम्पति दिब्य शरीर धारण क्र उसमे विराजमान हो गए |
शिकारी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने स्वंय के उदार का उपाय पूछा| वे बोले – “हे शिकारी गोतमी गंगा (गोदावरी) के जल में स्नान करने से तुम्हारे सारे पाप ख़तम हो जायेगे और तुम्हे अस्वमेघ यज्ञ जैसा फल प्राप्त होगा|”
उसके परम्शानुसार शिकारी ने गोतमी गंगा में स्नान किया, जिसके उसके समस्त पाप नष्ट हो गए और वह पुण्यवान होकर स्वर्ग चला गया |
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