बहुत पुरानी बात है | किसी जंगल में एक बंदर रहता था | वह बहुत समझदार व् चतुर था | वह एक पेड़ से दुसरे पेड़ पर उछलता – कूदता रहता था | इस खेल में उसे बहुत अच्छा लगता था | एक बार वह जंगल घुमने निकला| घूमते हुए उसे जंगल में एक थेला मिला | थेले में एक कंधा और एक शीशा था | उसने कंधा उठाया और उसे उलट-पलटकर देखने लगा | पर उसे कुछ समझ नहीं आया, इसलिए बेकार समझकर उसने कंधा फ़ेंक दिया |
इसके बाद उसने शीशा उठाया | उसे भी उलट-पलटकर देखने लगा पर तब भी उसे कुछ समझ नहीं आया पर अचानक उसे शीशे में अपना चेहरा देख कर उसे समझ आ गया की जो भी उसके सामने आयगा इसमें दिखाई देगा | फिर उसने सोचा की इसका में क्या करू? कुछ देर सोचने के बाद उसने वह शीशा वापस थेले में डाल दिया और आगे चल पड़ा | पर अब उसी चाल कुछ बदली हुई थी | रास्ते में उसे भालू मिला | वह बोला –“अरे ओ बंदर, इतना अकडकर क्यों चल रहा है ?” भालू की बात सुन बंदर बोला – “में तो ऐसे ही अकडकर चलूगा | तू क्या कर लेगा मेरा? तेरे जैसो को तो में अपने थेले में रखता हु |”
उसी समय जंगल का राजा शेर भी वहा आ गया | शेर ने भालू से पूछा – “तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो?” भालू ने शेर के सामने हाथ जोडकर कहा – महाराज ! यह बंदर अकड रहा है | भालू की बात सुनकर शेर ने बंदर अकड़कर पूछा – “अरे ओ बंदर | क्या यह सच है ?” बंदर ने शेर से भी अकड़ते हुए कहा – “क्यों न अकडू | में सबसे ताकतवर हु |”
बंदर की बात सुनते ही शेर को गुस्सा आ गया और दहाड़ते हुए बोला – भाग जा यहाँ से, अगर एक पंजा मर दिया तो यही पर मर जायगा |” बंदर ने शेर से भी व्ही बात कही –“ तू मुझे मरेगा? तेरे जैसे को तो में अपने थेले में रखता हु |”
बंदर की निडरता देख शेर थोडा नर्म होकर बोला – “अच्छा में भी तो देखू | निकल मेरे जैसा शेर अपने थेले में से|” फिर क्या, बंदर ने अपना थेला खोला और शीशा निकला और शेर के मुंह के सामने कर दिया | शेर ने उसमे अपना चेहरा देखा पर समझा की इसमें कोई दूसरा शेर है | यह देख कर वह डर गया और उसने सोचा – “ यह बंदर तो सचमुच बड़ा ताकतवर है | इससे लड़ना ठीक नहीं |
शेर ने बंदर से हाथ जोड़ते हुए कहा – बंदर जी | आपसे मेरा क्या झगड़ा? आप जो चाहे, करे |” शेर की बात सुन भालू भी बंदर से डर गया | अब तो बंदर और अधिक निडर होकर बड़े मजे से जंगल में रहने लगा |
सीख: समझदारी का फल सदेव अच्छा होता है |
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