एक साधू तीर्थयात्रा पर निकले | वह मार्ग में पड़नेवाले गावो और कस्बो में ठहरते जाते थे | जहा जो भी भक्त उन्हें प्रेम और आदर से बुलाते, चले जाते |
एक गाव में एक ऐसा भक्त मिला जिसने उन्हें एक गाय दान दे दी | वह बोला – “महाराज | इसे आप साथ रखिए | रास्ते में घास – पात लेगी और आपको दूध भी देगी |”
साधू ने गाय ले ली और आगे चल पड़े | अभि कुछ देर ही गए होगे की एक व्यापारी मिला | वह भी साधू के साथ साथ चलने लगा | व्यापारी ने साधू को अपना परिचय दिया | फिर उत्सुकतावश पूछ बेठा – “ यह गाय लेकर आप तीर्थयात्रा के लिए क्यों निकले है?”
साधू ने कहा – “में तो अकेला हु चला था | परंतु एक भक्त ने इसे भी साथ कर दिया ताकि दूध मिलता रहे |”
व्यापारी ने देखा की गाय बहुत सुन्दर है | दूध भी काफी देती होगी | अगर किसी तरह इसे में खरीद लू तो इसके अछे दाम मिल जायगे | यह सोचकर बोला – महाराज | आपके लिए भला दूध की क्या कमी है ? जिस गाव में डाल देगे, वहा भकत लोग दूध –ही-दूध ले आएगे | पैर इतना ज़रूर है की जंगल का मामला है | अगर गाय को खतरा हो गया तो व्यथ ही आपको पाप लगेगा | मेरी बात मानिए, आप इसे बेच दीजिए |”
साधू ने कहा – “ दान में मिली गाय को बेचना भी तो पाप है | में तो सोचता हु, आगे जो गाव आएगा वहा अगर कोई सच्चा भकत मिल गया तो उसे ही दे दूगा |”
व्यापारी को लाभ अब और भी बढ़ गया | वह बोला – “सुबह – शाम भगवान की पूजा करना, ब्रह्ममणौ का दान देना, सच्चाई और ईमानदारी से रहना तो मेरी भी विशेषता है | क्या में इस गाय को प्राप्त करने योग्य नहीं हु ?”
साधू उस व्यापारी के मन की बात समझ गए | बोले –“तुम भी इस गाय को प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हो | लेकिन उससे पहले एक काम करना होगा | तुम अपना यह लोटा मुझे दे दो |“
में इसमें गाय का दूध दुहकर तुम्हे दूगा | यह लोटा लेकर तुम उस गाव तक मेरे साथ चलोगे | यदि रास्ते में लोटे का एक बुद्ध दूध भी छलककर गिर गया तो तुम गाय प्राप्त करने का अधिकार खो दोगे |”
व्यापारी ने सोचा – इसमें कोन सी मुशिकल बात है | उसने अपना लोटा साधू को दे दिया | साधू ने उसमे दूध दुहकर उसे दे दिया और वे फिर चल पड़े |
दूध से लबालब भरा लोटा लिये हुए व्यापारी भी चलने लगा | वह बहुत खुश था की उसे इतनी सुन्दर गाय मुफ्त में ही मिल जाएगी |
व्यापारी कुछ ही दूर चलकर अपने विचारो में खो गया | उसने सोचा – मान लो, इस गाय के लिए मुझे मुहमागे दाम न मिले तो इसे में घर पर ही रख लुगा | घर की द्वार पर बंधी इतनी सुंदर गाय देखकर लोग बार बार यही पूछेगे कि अरे लालाजी! इसे कहा से ले आए | और में मुछो पर तव देकर कहुगा |” इतना सोचते ही उसका एक हाथ मुछो तक पहुच गया और दुसरे हाथ ने लोटे का सतुलंन खो दिया | फिर तो दूध छलक गया |
साधू मुस्कराए | बोले –“अब तो तुम गाय नहीं प्राप्त का सकोगे | लेकिन एक बात गाठ में बांध लो | कभी किसी चीज को प्राप्त करने कि लिए मन में लोभ न लाना और न ही शान दिखाना | अगर तुम एकाग्र और शांत मन से दूध के लोटे को सभालकर गाय प्राप्त करने कि बात सोचते तो ज़रूर सफल हो जाते | अब तो इस सीख को प्राप्त करके सतोष करो | “
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