गूंजती है आज भी इन दीवारों में
चीत्कार उन केदियो की
भारत माता को मुक्त करने की कसम ले
चढ़ गए जो फँसी पर बिना किसी शिकन के |
उर्म केद हुई उन काली कोठरियों में
हंस का खा गए वो गोलिया सीने में
इन्ही सलाखों के पीछे
काट दी उन्होंने अपनी जिंदगानी बिना किसी परेशानी के
जिए थे वे एक ही माँ के लिए
और मरे भी थे एक माँ के लिए
उस माँ के लिए मरना था सोभाग्य की नोशानी |
लिख गए अपने रक्त से वो
इस काला पानी की काली कहानी
होंसले न कभी डगमगाए
बेत और कोड़े खा कर भी
आंसू न आए आँखों ने जिनकी
याद कर बाते पुरानी
दिल दहलाने वाली यह कहानी
सुनी थी कइयो की जुवानी
कहना था उन वीरो की की बात
”मत कहो इस खुबसुरत जमीन को काला पानी
जहा दी थी वीरो ने अपनी जवानी |
जहा दी थी जान भारत माता के वीरो ने |
मत कहो इस खुबसुरत जमीन को काला पानी “
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