एक जंगल में एक हिरण रहता था एक दिन की बात है नदी के किनारे वह पानी पी रहा था और उसने अपने सींग की अपनी परछाई देखी | देख कर वह बहुत खुश हुआ और बोला, “कितने अच्छे है मेरे सींग है | ये तो मेरी शोभा है |”
वह थोडा सा और पानी के अंदर गया | अब उसे अपनी टांगे देखी और बोला, “हे भगवान, कैसी है मेरी टांगे | कितनी पतली – पतली है और कितनी गन्दी है | काश मेरी टांगे अच्छी होती, तो कितना मजा आता |”
वह मन ही मन अपने आप से बाते कर ही रहा था की अचानक उसे दूर से कुछ शिकारियों की आवाज सुनाई दी | उसने इधर उधर देखा तो उसे दूर से कुछ भेडिये दिखाई दिए | और वह वहा से उछलता – कूदता वहा से दूर चला गया | भेडिये अभी भी उसका पीछा कर रहे थे | भागता – भागता हिरण एक झाड़ियो के पीछे फंस गया और तभी वह भेडिये भी वहा आ पहुचे | उन्होंने उस हिरण पर हमला कर दिया |
हिरण का अब अंतिम समय आ गया और मन ही मन सोचने लगा की थोड़ी देर पहले में अपने इस सींगो की तारीफ कर रहा था और टांगो की बुराई कर रहा था | और अब में इन्ही सींगो की वजह से में इस झाड़ियो में फंस गया और मर रहा हु |
सीख: कभी भी अपने किसी भी अंग की निंदा नहीं करनी चाहिए | हमे अपने रूप की नहीं, अपितु गुणों की प्रंशसा करनी चाहिए |
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