Archive for the ‘Hindi Moral Stories’ Category

सोच का परिणाम

बहुत पुरानी बात है एक बार नारदजी की प्रथ्वी – भ्रभन के दोरान अपने एक भक्त से मुकालात हुई | वह बहुत परेशान था अपनी पत्नी से इसलिए उसने नारदजी से प्राथना की उससे अपनी कर्कश-लड़ाकू पत्नी से बचा लो| उन्होंने उसको वादा किया और कहा ठीक है में तुम्हारी मदद करुगा परन्तु पहले में स्वर्ग जायेगे | नारदजी उसे अपने साथ ले गए और स्वर्ग के दरवाजे के बाहर बिठा दिया और खुद स्वर्ग के अंदर चले गए |

वह आदमी वहा पड़े के नीचे खड़ा ठंडी हवा खा रहा था की उसके मन में एक विचार आया की काश मेरे पास एक कुर्शी होती तो में यहाँ पेड़ के नीचे बेठ जाता | उसी समय उसके पास कुर्शी आ गुई क्योकि वह कल्पव्रक्ष के नीचे बेठा था पर इच्छा-पूर्ति के लिए प्रसिद था | कुछ देर बाद उसने सोचा “मेरे पास एक सोने का पंग होता जिस पर में सो सकता और अगले ही पल उसके पास पलंग आ गया और वो उस पर सो गया | अगले ही पल उसने सोचा काश यह कोई मेरे पैर दबा दे और देखते ही देखते वहा पर दो सुंदर अप्सराये आ गुई और उसके टांगे दबाने के लिए प्रकट हो गई |

थोड़ी देर बाद उसने अपनी पत्नी का स्मरण हो आया और उसने सोचा, “अगर मेरी पत्नी ने मुझे इन दो इस्त्रियो के साथ देख लिया तो मुझे मार ही डालेगी |” और उसी समय वहा उसकी पत्नी प्रकट हो गई एक मोटे डंडे के साथ | जैसे ही उसने अपनी पत्नी को देखा, वह पुरु जोर से उठ कर वहा से भागने लगा | यह देख कर उसकी पत्नी भी उसके पीछे पीछे हो ली |

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एक बार का झूठा, सो बार का झूठा

एक गाव में एक बच्चा रहता था | वह रोज अपनी भेड़ो को घाटी में ले जाया करता था | हर रोज का वह यही किया करता था | सुबह उठा और अपनी भेड़ो को घाटी में ले जाया करता था चराने के लिए | एक दिन वह बेठे बेठे ऊब गया और उसने सोचा क्यों न आज गाँव का मझक उड़ाया जाए |

और वह एज ऊँची चटान पर चड गया और जोर जोर से चिलाने लगा, शेर आया शेर आया | मेरी और मेरी भेड़ो की जान बचाओ | गाँव वालो ने उसकी अवाज सुन कर अपनी अपनी लाठी उठी और घाटी की तरह भागे उसकी जान बचाने के लिए | परन्तु जब वो लोग घाटी में पहुचे तो देख कर हेरान हो गए, वहा उन्हें कुछ न दिखा और वह बच्चा बोला, “कोई शेर नहीं आया मेने तो एक मजाक किया था “

सभी गाँव वालो को बहुत गुस्सा आया और वहा से चले गए | उस बच्चे ने यह हरकत १-२ बार फिर किया | गाँव वाले बार बार आते गुस्से में आ कर वहा से चले जाते | अब की बार सभी गाँव वालो ने निर्णय कीया की अब से इस बच्चे की बात नहीं माने गे चाहे कुछ भी हो जाए |

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मजाक उड़ाना पड़ा मंहगा

बहुत पुरानी बात है एक बार एक कछुआ तलाब में पानी पी कर जा रहा था की वहा बेठा एक खरगोश उसकी मंद गति को देख कर हसने लगा | यह देख कर कछुए को बहुत बुरा लगा और उसने खरगोश को दोड के लिए चुनोती दे डाली |

खरगोश ने ख़ुशी ख़ुशी दोड की चुनोती स्वीकार की | अगले ही दिन यह दोड होनी थी | सुबह – सुबह दोनों अपने – अपने समय पर आ गए और दोड सुरु हो गई | खरगोश आरंभ से ही बहुत आगे निकल गया था | थोरी दूर आगे जा कर वो उब गया था दोड़ते दोड़ते | उसने सोचा क्यों न थोड़ी देर आराम कर लिया, वैसे भी कछुआ बहुत पीछे रह गया है | वह सोचने लगा में तो बहुत तेज दोड़ता हु | यह सोचते हुआ सो गया क्योकि उसे कछुए की कोई चिंता न थी |

कछुआ अपनी मंद गति से चलता रहा बिना रुके,लगातार चलता रहा तथा सोए हुए खरगोश को पीछे छोड़कर चुपके से आगे निकल गया और लक्ष्य पर जा पहुचा |

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पेड़ो को भी दर्द होता है

एक गाँव में एक सोनू नाम का एक लड़का रहता था | यह पढाई में बहुत अच्छा था परन्तु साथ ही साथ बड़ा ही लापरवाह और शरारती था | इसी कारण से अध्यापक और माता – पिता से डाट पडती रहती थी | इसके चलते वह सभी से नराज भी रहता था | पर उसे अपना गुस्सा बाहर निकालना भी अच्छी तरह आता था | वह अपने दोस्त मोनज के साथ खेतो में चले जाता और वहा पर वो अपने दोस्त के साथ गेम्स खेलता | कभी अध्यापक – अध्यापक, कभी गीली – डंडा, कभी पेड़ पोधो को मरता काटता | सभी तरीका था उसका अपने गुस्से को बाहर निकालने का | वे दोनों अँधा दुन्ध पेड़ पोधो को कटते की वो बे जुबान मर जाते थे, उनके फल फूल भी सभी नष्ट हो जाते थे |

उन दोनों के सभी मित्रो ने उनको समझया की ऐसा न किया करे परन्तु वो दोनों कहा किसी की सुनते | वे उनसे बार बार क्दते की पोधो को मारना या तोडना अपराध है | उन दोनों की शरारते बहुत ज्यादा बड चुकी थी | एक दिन सोनू ने अपने सहपाठी को सीढियों से धक्का दे दिया जिससे उसकी दोनों टांगे टूट गई और उसको उसी समय अस्पताल ले जाना पड़ा | उस दिन उसके अध्यापक पर उसके माता-पिता ने उसे खूब पिटा डंडो से | इस पिटाई के कारण उसके हाथो पर बहुत ज्यादा निशान पड़ गए और बहुत देर तक उनमे दर्द भी बोता रहा | सोनू कही घंटो तक रोता रहा और दर्द होते रहा |

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क्या है योगी का कर्तव्य

यह कहानी तब की है जब पुणे में महामारी ने अपना भीषण प्रोकोप फेला रखा था दिन प्रतिदिन बहुत से लोग मारे जा रहे थे इस बीमारी से | सभी लोग इतने डर चुके थे की कोई भी किसी की मदद नहीं कर रहे थे | यहाँ तक की अगर किसी परिवार के सदस्य को भी बीमारी हो जाती तो भी उसे मरने के लिए छोड़ देते थे |

उन्ही दिनों वहा से थोरी ही दूर पर एक ऋषि रहा करते थे जो सभी की मदद किया करते थे | और उस वक्त वो ऋषि लोगो के लिए रौशनी की एक किरण बनकर आए | वो सभी को समझाते थे की किसी को भी बिच मझधार में न छोड़े, सभी की मदद करे | यह सिद करने के लिए उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था | तथा वो जो कहते वो करते भी थे व् अपना आश्रम छोड़ कर पुणे में आ कर रहने लगे और रोगियों की मदद करने लगे | यह देख कर उनके सभी शिष्य भी उनके साथ सभी रोगियों की मदद करने लगे | स्वामी जी ने अपने सभी शिष्यों को आज्ञा दी की सभी एक – एक गाँव का भर सभाल ले ताखी हम सभी एक बीमारी को जड से ख़तम कर सके |सभी शिष्यों ने स्वामी जी की बात का पालन किया | परन्तु उन में से कुछ योगी डर रहे थे और उनके मन में कुछ संकाए भी थी | लेकिन वो डर रहे थे स्वामी जी से पूछने में| पंरतु उनमे से एक योगी ने हिमत करके स्वामी जी से पूछा, “हे स्वामी जी हम लोग योगी है हम लोगो ने एक जगत को छोड़ दिया है, फिर हम इन लोगो की मदद क्यों करे ? जबकि ये लोग अपनी मदद खुद नहीं करना चाहते |

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दान का रहस्य

एक बहुत बड़ा राजा था परंतु उस राजा के बुरे दिन आ गये थे क्योकि उसके पड़ोसी राजा ने उस पर हमला कर दिया और मजबूरी में उसने अपनी पत्नी और बच्चे सहित अपने राज्य से भागकर जंगल में शरण लेनी पड़ी | राजा बहुत ही दयालु और दानी था उसके यहाँ से कोई भी खाली हाथ नहीं जाता था और सही सोच कर राजा और रानी अपने दिन बिता रहे थे की कोई न कोई उनकी मदद करने जरुर आयगा | परन्तु स्थिथि बहुत ही जायदा ख़राब हो रही थी | यहाँ तक की उनके भूखे मरने की नोबत आ गई थी |

राजा दिन प्रति दिन शहर जाता, काम की तलश में परंतु उसे कही काम न मिला | एक दिन भाग्यवश उसे काम मिल गया | और ख़ुशी ख़ुशी कुछ राशन ले कर अपनी पत्नी और बच्चो के पास पहुचा | रानी ने सभी के लिए खाना बनाया और खाने ही लगे थे की उनके पास एक महात्मा उनके घर आ गए | जैसे की राजा और रानी बहुत दानी थे उन्होंने अपने अपने हिस्से का खाना महात्मा को दे दिया |

महात्मा के खुश हो कर राजा को एक सेठ के बारे में बताया की वो पुण्यो के बदले पैसा देता था | यह सुनकर राजा अगले ही दिन शहर चला गया अपने पुण्यो के बारे में बताने ताकि उसको कुछ पैसे मिल सके | राजा ने अपने सारे पुण्ये की एक सूची सेठ को दे दी | जब सेठ ने यह सूची तराजू के एक पलड़े में रखी तो भी दोनों पलड़े बराबर ही रहे | यह देखकर सेठ ने राजा के कहा, “लगता है तुम्हारे पुण्यो में मेहनत और बलीदान शामिल नहीं थे | किसी ऐसी वस्तु की यद् करो जिसकी तम्हे बहुत आवश्कता थी, किंतु फिर भी तुम ने उस को दान में दे दिया था |

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लालची सेठ

बहुत पुरानी बात है एक गाव में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था | वह एक दिन कही जा रहा था की अचानक उसका बटुआ गली में खो गया तो उसने पुरे गाव में घोषणा करवा दी की उसके बटुए में पांच हजार रुपे थे और जो उसे लोटा देगा, वह उसे पांच सो रुपे के इनाम में देगा |

उसी दिन संध्या के समय एक बुढिया को उस सेठ का बटुआ मिल गया और वह उसे लेकर फोरन सेठ के पास आई | लेकिन सेठ को लालच आ गया और उसने पूरा का पूरा पैसा खुद रखने की ठान ली | इसलिए उसने बुढिया से कहा की उसके बटुए में पांच हजार पांच सो रुपे थे और उसने पांच सो रूपये पहले ही रख लिये है | पर बुढिया को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी और वो सीधा राजा के पास चली गई | उस बुढिया ने राजा को सारी बात बताई और बोली, “हे महाराज अगर मुझे पैसे लेने ही होते तो में सारे पैसे रख लेती न की पांच सो रुपे रख कर बाकि वापिस करती |

बुढिया की पूरी बात सुन कर राजा को शक हुआ की सेठ बुढिया को दोखा दे रहा है | इसलिए राजा ने सेठ को एक सबक सिखाने के लिए सेठ से कहा, “में समझता हु की ये बटुआ तुम्हारा नहीं है क्योकि इसमें सिर्फ पांच हजार रुपे है ने की पांच हजार पांच सो | Continue reading “लालची सेठ” »

दया करना कभी निष्फल नहीं जाता

बहुत पुरानी बात है एक जंगल बहुत ग्रीषम ऋतू के दिन चल रहे थे | एक दिन दोपहर का समय एक शेर एक छायादार पेड़ के नीचे दो रहा था | उसी पेड़ के पास ही एक चुहिया का घर था | अचानक ही वह अपने घर से बाहर आई तो उसने शेर को वहा सोते हुए देखा |

यह देख कर उसे एक शरारत सूझी | उसने सोते हुए शेर के ऊपर कूदकर उसे जगा लेने की सोची | परन्तु हुआ बिलकुल उल्टा | शेर की नीद टूट गई और उसने उसे अपने पंजे में पकड़ लिया | वह उसे मर कर खाने की सोच ही रहा था की इसने में वह गिडगिडा कर बोली, “आप बहुत महान हो, मेरे प्राण बख्श दीजिए हुजुर | एक न एक दिन में इस दया का बदला अवश्य चूकाउगी |”

यह बात सुन कर शेर को उस चुहिया पर दया आ गई और उसने उसे छोड़ दिया | और कुछ दिनों बाद जंगल में एक शिकारी आ गया और उसने शेर को पकड़ने के लिए एक जाल बिछा दिया और दुर्भाग्य से शेर उस जाल में फस गया | शेर जोर जोर से दहाड़ने लगा मदद के लिए |

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लालच का फल

एक बार की बात है | भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी एक साथ हस्तिनापुर जा रहे थे | उनके हस्तिनापुर चले जाने के बाद अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को मणि छिनने के लिए उकसाया | शतधन्वा बड़े दुष्ट और पापी स्वभाव का मनुष्य था | दोनों के बहकाने पर उसने लोभवश सोए हुए सत्राजित को मोत के घाट उतार दिया और उसकी मणि प्राप्त करके वहा से चला गया |

अपने पिता की मरने की खबर सुन कर सत्यभामा रोने लगी | तभी उसको भगवान श्रीकृष्ण की याद आई और उसने प्रतिज्ञा ली की जब तक श्रीकृष्ण शतधन्वा का वध नहीं कर देगे तब तक वह अपने पिता का दाह संस्कार नहीं करने देगे | इसके बाद वह हस्तिनापुर गई और वहा जाकर श्रीकृष्ण को साडी बात बताई | भगवान श्रीकृष्ण उसी समय सत्यभामा और बलरामजी के साथ हस्तिनापुर से द्वारिका लोट आए | द्वारिका पहुच कर उन्होंने शतधन्वा को बंदी बनाने का आदेश दे दिया |

यह सुन कर की श्रीकृष्ण ने उन्हें बंदी बनाने का आदेश दे दिया है तो वह भयभीत होकर कृतवर्मा और अक्रूर के पास गया और उनसे सहायता की गुहार की | किंतु दोनों ने सहायता से इंकार कर दिया | तब उसने मणि अक्रूर को सोप दी और अश्व पर स्वर हो कर द्वारिका से भाग निकला | शतधन्वा की भागने की खबर श्रीकृष्ण और बलरामजी को मिल गई थी अत: उसका वध करने की लिए वे दोनों रथ पर सवार होकर उसके पीछे निकल पड़े | उन्हें अपने पीछे देख शतधन्वा अश्व से खुद गया और घने जंगलो में चल पड़ा | यह देख कर श्रीकृष्ण ने अपना सुर्दशन चक्र से उसका मस्तक धड से अलग कर दिया | इस प्रकार दुष्ट शतधन्वा का वध कर उन्होंने सत्यभामा की प्रतिज्ञा पूरी की | Continue reading “लालच का फल” »

मतलबी भेड़िया

एक दिन भेड़िया मजे से मछली खा रहा था की अचानक मछली का कांटा उसके गले में अटक गया | भेड़िया दर्द के मारे चीका-चिलाया | वह इधर-उधर भागता फिरा | पर उसे चेन न मिला | उससे न खाते बनता था न पीते बनता था |

तभी उसे नदी किनारे खड़ा एक सारस दिखाई दिया | भेड़िया सारस के पास गया | भेड़िया की आँखे में आसू थे | वह गिडगिडा कर बोला, “सारस भाई, मेरे गले में कांटा अटक गया है | मेरे गले से कांटा निकल दो | में तुम्हारा अहसान कभी न भुलुगा | मुझे इस दर्द से छुटकारा दिला दो |

सारस को भेडिये पर दया आ गई | उसने अपनी लंबी चोंच भेडिये के गले में डाली और कांटा निकाल दिया | भेडिये को बड़ा चेन मिला | सारस बोला, भेडिये भाई मेने आप की मदद की है अब आप मुझे कुछ इनाम दो |

इनाम की बात सुनते ही भेडिये को गुस्सा आ गया | सारस की अपने बड़े-बड़े दांत दिखाते हुए बोला, “तुझे इनाम चाहिए? एक तो मेरे मुंह में अपनी गंदी चोंच डाली | मेने सही – सलामत निकल लेने दी | और अब इनाम मांगता है | जिंदा रहना चाहता है तो भाग जा यंहा से इनाम मांगता है |” Continue reading “मतलबी भेड़िया” »

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