Archive for the ‘Hindi Moral Stories’ Category

माँ की अंतिम अभिलाषा

बहुत पुरानी बात है जब मोहनगढ़ पर सेठ हरिराम का शासन हुआ करता था | उसी जगह रामू नाम का एक लड़का रहा करता था | वो बहुत ही बुद्धिमान था | बड़ा होकर उसे मोहनगढ़ का दरबारी विदूषक नियुक्त किया गया |

सेठ हरिराम की माता जी जब गंभीर रूप से बीमार पड़ी तो सेठ हरिराम को यह बात समझ आ गई की उनकी माता जी के पास ज्यादा समय नहीं है | इसलिए सेठ अपनी माताजी की हर अभिलाषा को पूरा करने की कोशिश करने लगे | एक दिन उनकी माताजी का मन आम खाने की इच्छा हुई | पुत्र ने माँ की आज्ञा का तुरंत पालन करने का आदेश दिया | मगर वे उन्हें आम खिला पते उससे पहले की उनकी माता जी का देहांत हो गया और उनकी यह इच्छा अधूरी रह गई | हरिराम हो अपनी माता जी की आखरी इच्छा पूरी न कर सकने का बहुत दुःख हुआ | वही पास खड़े एक ब्राहमण ने कहा सेठ अगर आप सोने के आम दान में देगे तो उनकी माँ की आत्मा को शांति मिल जायगी |

तभी सेठ ने सभी ब्राहमण को सोने के आम देना शुरू कर दिया | रामू यह सब देख रहा था और उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था की बार-बार ब्राहमण सेठ के घर के आस – पास चक्कर लगा रहे थे | (more…)

भगवान सब देखता है

बहुत पुरानी बात है | एक बहुत प्रसिद गुरुकुल था | दूर दूर के गाँवो से बच्चे वहा पड़ने आते थे | आश्रम में जो गुरु थे वो भी बहुत विद्वान और यशस्वी थे |

एक दिन की बात है आचर्य ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और कहा, “प्रिये शिष्यों, मेने तुम्हे आज एक विशेष कार्य ले लिए यहाँ पर बुलाया है | शिष्यों मेरे सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ पड़ी है | मेरी पुत्री विवहा योग्य हो गई है और मेरे पास उसके विवहा करने के लिए घन नहीं है | मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है की में क्या करू?”

उन सभी शिष्यों में से कुछ शिष्य धनि परिवार में से थे और वो आगे बढ़ के बोले, “गुरुदेव अगर आप की आज्ञा हो तो हम अपने घर में से ले आते है धन और फिर आप अपनी पुत्री का विवहा कर देना |

आचर्य बोले,” अरे नहीं अरे नही वत्स, ऐसा नहीं हो सकता है |”

शिष्य बोले, “गुरुदेव ऐसा क्यों नहीं हो सकता, आप उसे हमारी तरफ से गुरु दक्षिणा समझ लेना”

इस पर गुरुदेव बोल, “नहीं वस्त, तुम्हारे घर वाले सोचेगे की तुम्हारे गुरु लालची हो गए है | वो धन ले कर विध्या देते है |”

सभी शिष्यों ने पूछा,” फिर क्या किया जाए गुरुदेव, जिस से आप की पुत्री का विवहा हो सके” | गुरुदेव कुछ देर सोचने के बाद बोले, “हा एक तरीका है | ऐसा करो तुम धन ले कर तो आओ परन्तु मांग कर नहीं | इस तरह से लाओ की किसी को पता न चल सके |”

उनमे से कुछ शिष्य बोले, “गुरुदेव परन्तु हमारे माता-पिता के पास तो नहीं है |”

“कुछ भी ले कर आओ अपने घरो में से परन्तु ध्यान रहे की किसी को पता न चले वरना मेरे श्रम से मर जाऊगा |”

यह सुन कर सही शिष्य अपने अपने घर की तरफ चल पड़े | अगले दिन से ही सभी शिष्य अपने अपने घरो में से कुछ न कुछ लाना सुरु कर दिया | और कुछ ही दिनों में आश्रम में बहुत सारी सामग्री इकठी हो गई | (more…)

कैसे हार गया चीकू

बहुत पुरानी बात है| एक गाँव के पास एक घना जंगल था और उस जंगल में बहुत सारे पशु पक्षी रहते थे उसी जंगल एक तलाब था जिसमे सबी पशु पक्षी पानी पीने आते थे इसी तलाब में एक मगर भी रहा करता था

यह मगर गंदा और बहुत भयानक था | जो भी छोटे छोटे जानवर पानी पीने आते थे उन्हें पकड़ कर खा लेता था वहा पर एक हिरण भी आता था पानी पीने | बहुत दिनों से चीकू की नजर उस पर थी | वह उसे खाना चाहता था | हिरण बहुत भोला परन्तु बहुतसाथ ही साथ समझदार और चलाक भी था | इसलिए वह पानी पीने और नहाने का काम सावधानी से करता था | सवेरे – सवेरे जब चीकू सो रहा होता, वह चुप के वहा जाता और अपना काम पूरी तरह से कर लेता था |

एक दिन की बात है हिरण को दोपहर के समय बहुत प्यास लगी | वह तलाब के पास पहुचा और पानी पीने के लिए तलाब में घुसने लगा | चीकू इसी मोके की रहा में था | वह जो ही घुसा उसने हिरण की टांग पकड़ ली | हिरण बुरी तरह से डर गया था | उसने चलाकी से काम लिया और इधर उधर देखने लगा | उसे एक लकड़ी दिखाई दी और अपने मुह से उठाकर थोड़ी ही दूर पर रखा दिया और चीकू को कहा, “चीकू मामा, चीकू मामा इस लकड़ी को छोड़ कर मेरी टांग चबा लो, तुम्हे मजा भी आएगा | यह सुनते ही चीकू ने उसकी टांग छोड़ कर उस लकड़ी को पकड़ा लिया और हिरण उछल कर दूर चला गया और चीकू देखता रहा गया |

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कोआ भुला अपनी चाल

यमुना के किनारे के पेड़ था उस पेड़ पर एक कोआ रहता था | वह खुद को चालक, समझदार, और होशियार रहता था वह बहुत ज्यादा धमंडी था |

एक दिन एक हंस बहुत दूर से उड़ता हुआ उस पेड़ पर आ कर बेठ गया | वह वहा रात बिताने के लिए आया था | कोए ने सुबह उठकर हंस को देखा | वह हंस के पास आया और बोला भाई तुम कहा से आए ह, क्या तुम उड़ना आता है ? अगर नहीं आता हो में तुम्हे उड़ना सिखा सकता हु | तुम मेरे चेले बन जाओ, में तुम्हे उड़ना सिखा दुगा |

हंस चुपचाप सुनता रहा | हंस ने उसकी बात अनसुनी कर दी और कुछ देर बाद वो वह से उड़ गया | यह देखकर कुआ भी उसके पीछे पीछे उड़ गया | रास्ते में कुआ बोला, “तुम्हे सही से उड़ना नहीं आता है | तुम तो बिलकुल सीधा – सीधा उस रहे हो, मुझे देखो में तो किसी भी तरह से उड़ सकता हु | यह देखो मेरी कलाबाजी उडान, में टी नाचते हुए भी उड़ सकता हु | वह कभी दाए तो कभी बाए, तो कभी ऊपर तो कभी नीचे उड़ता | हंस अपनी उडान भरता रहा | अब दोनों के दोनों यमुना नदी के ठीक उपर आ गए | थोड़ी देर बाद कुआ थक गया और उसने बोलना भी बंद कर दिया था कुआ बहुत दूर तक आ गया था और अब वापिस जाना चाहता था | वह बहुत ज्यादा थक गया था और उसकी साँस भी फूल गई थी | हंस चुपचाप यह सब देख रहा था |

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सोने का लोभ

एक शहर में एक सेठ मायादास रहता था और वो बहुत धनी थे | उनके पास बहुत सारा सोना चांदी भी था परन्तु फिर भी उन्हें बहुत कम लगता था | वो चारो पहल सिर्फ और सिर्फ धन कमाने ले लिए सोचता रहता था | एक दिन उसके पास एक साधु आया | मायादास ने उस साधु की खूब सेवा की | यह देखकर साधु बहुत खुश हुए और बोला, “तुम क्या चाहते हो?”

मायादास ने मोका का फायदा उठाया, “उस ने झट से बोल दिया, महाराज में जिस को भी हाथ लगाऊ जो सोने की हो जाए |”

यह संकर साधु हस पड़े और बोला ठीक है, ऐसा ही होगा | और फिर साधु वहा से चले गए | साधु के जाते ही मायादास ख़ुशी से पागल हो गया | उसने लकड़ी के दरवाजे को छुआ और वह सोने का बन गया | यह देखकर मायादस बहुत खुश हो गया | फिर उसने सभी को धीरे धीरे हाथ लगाना शुरू कर दिया और सभी कुछ सोने का होने लगा | सोने की कुर्सी, सोने का मेज, सोने का पलंग, सोने के कपड़े, सोने का रथ | यहाँ तक की उसने जानवरों को भी सोने का बना दिया |

अब वह थक चूका था उसने अपने नोकर से पानी का गिलास मंगवाया, गिलास को छुते ही वह भी सोने का हो गया | मायादास अब घबरा गया | फिर उसने खाना मंगवाया, वह भी सोने का हो गया | अब वह किसी को भी छुता वह सोने का हो जाता | वह भूखा प्यासा रह गया |

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चापलूसी करने वाले सदा धोखा देते है

एक बार की बात है एक कबूतर एक पेड़ की शाखा पर बेठा, मजे से गाना गुण गुना रहा था | ठीक उसी समय वह पर लोमड़ी आ गई | कबूतर की अवाज सुन कर लोमड़ी ने पेड़ पर देखा और उसे वहा एक कबूतर नजर आया | कबूतर को देखते की उसके मुह में पानी आ गया | वह सोचने लगा की उसे कैसे खाऊ, क्या करू क्यों वो बहुत ऊंचाई पर बेठा था |

तभी उसे एक तरकीब सूझी, उसने कबूतर की चापलूसी करनी शुरू कर दी, वह बोली, “कितना मीठा स्वर है आपका | मुझे बहुत अच्छा लग रहा है |”

कबूतर या सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ, वह बोला, “इस प्रंशसा के लिए में आप का धन्यवाद करता हु |”

इस पर लोमड़ी ने कहा, आप नीचे आ जाइए, में आप से दोस्ती करना चाहता हु, कुछ समय के लिए हम दोनों बाते करेगे |

कबूतर उसकी बातो में आ गया और वह पेड़ से नीचे उतार आया और उसके आते ही लोमड़ी उसे खा गई |

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क्या रावन अभी भी जीवित है ?

बहुत पुरानी बात है एक बार दशहरे के अवसर पर राजा हरिदेव राय ने अपने सभी दरबारियों को अलग – अलग झकिया तेयार करने के लिए कहा | और एक इनाम की रकम गोषित कर दी की जिसकी भी झाकिय सबसे अच्छी होगी उसको इनाम की रकम दी जाएगी | या सुनकर दरबारियों में उत्क्स्ता बड गई और तेनाली दास और सभी साथी भी झकिया तेयार करने में जुट गई |

दशहरे का दिन आ गया | राजा ने सभी दरबारियो की झकियो का निरक्षण किया | सभी की झकिया राज्य का इतिहास और संस्कृति को दर्शा रही थी तथा कुछ झकिया राज्य के लोगो और प्रक्रतिक सोंदर्य को दर्शा रही थी | राजा को सभी की झकिया अच्छी लग रही थी सभी दरबारियों ने बहुत मेहनत की थी अपनी अपनी झकियो को अच्छा दिखने के लिए | सभी दरबारियों ने झकिया बनाई थी परन्तु राजा को तेनाली दास की झकी नहीं दिख रही थी राजा के पूछने पर किसी इ बताया की तेनाली दास दूर एक पहाड़ी पर बेठा हुआ है |

राजा उसी समय पहाड़ी की तरफ निकल पड़ा | वहा पहुच कर राजा ने तेनाली दास को एक डरावनी और कोफ्नाक मूर्ति के पास बेठा था | राजा ने उस से पूछा, “क्या यही झकी तेयार की है तुमने “

तेनाली दास ने मूर्ति से कहा, “महाराज को जवाब दो मृति, महाराज कुछ पूछ रहे है | तभी मूर्ति में से अवाज आई | हे महाराज में उसी रावन की आत्मा हु जिसको हर साल आप लोगो जलाते है | आप लोग जलाते तो है परन्तु में कभी नहीं मरता | में तो सभी के अंदर रहता हु हर वक्त | दिन प्रति दिन मेरी ताकत में वृधि हो रही है | और में अपने साथ गरीबी, भूख, दुःख, क्रोध, शोषण आदि भी लाया हु |

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सोच का परिणाम

बहुत पुरानी बात है एक बार नारदजी की प्रथ्वी – भ्रभन के दोरान अपने एक भक्त से मुकालात हुई | वह बहुत परेशान था अपनी पत्नी से इसलिए उसने नारदजी से प्राथना की उससे अपनी कर्कश-लड़ाकू पत्नी से बचा लो| उन्होंने उसको वादा किया और कहा ठीक है में तुम्हारी मदद करुगा परन्तु पहले में स्वर्ग जायेगे | नारदजी उसे अपने साथ ले गए और स्वर्ग के दरवाजे के बाहर बिठा दिया और खुद स्वर्ग के अंदर चले गए |

वह आदमी वहा पड़े के नीचे खड़ा ठंडी हवा खा रहा था की उसके मन में एक विचार आया की काश मेरे पास एक कुर्शी होती तो में यहाँ पेड़ के नीचे बेठ जाता | उसी समय उसके पास कुर्शी आ गुई क्योकि वह कल्पव्रक्ष के नीचे बेठा था पर इच्छा-पूर्ति के लिए प्रसिद था | कुछ देर बाद उसने सोचा “मेरे पास एक सोने का पंग होता जिस पर में सो सकता और अगले ही पल उसके पास पलंग आ गया और वो उस पर सो गया | अगले ही पल उसने सोचा काश यह कोई मेरे पैर दबा दे और देखते ही देखते वहा पर दो सुंदर अप्सराये आ गुई और उसके टांगे दबाने के लिए प्रकट हो गई |

थोड़ी देर बाद उसने अपनी पत्नी का स्मरण हो आया और उसने सोचा, “अगर मेरी पत्नी ने मुझे इन दो इस्त्रियो के साथ देख लिया तो मुझे मार ही डालेगी |” और उसी समय वहा उसकी पत्नी प्रकट हो गई एक मोटे डंडे के साथ | जैसे ही उसने अपनी पत्नी को देखा, वह पुरु जोर से उठ कर वहा से भागने लगा | यह देख कर उसकी पत्नी भी उसके पीछे पीछे हो ली |

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एक बार का झूठा, सो बार का झूठा

एक गाव में एक बच्चा रहता था | वह रोज अपनी भेड़ो को घाटी में ले जाया करता था | हर रोज का वह यही किया करता था | सुबह उठा और अपनी भेड़ो को घाटी में ले जाया करता था चराने के लिए | एक दिन वह बेठे बेठे ऊब गया और उसने सोचा क्यों न आज गाँव का मझक उड़ाया जाए |

और वह एज ऊँची चटान पर चड गया और जोर जोर से चिलाने लगा, शेर आया शेर आया | मेरी और मेरी भेड़ो की जान बचाओ | गाँव वालो ने उसकी अवाज सुन कर अपनी अपनी लाठी उठी और घाटी की तरह भागे उसकी जान बचाने के लिए | परन्तु जब वो लोग घाटी में पहुचे तो देख कर हेरान हो गए, वहा उन्हें कुछ न दिखा और वह बच्चा बोला, “कोई शेर नहीं आया मेने तो एक मजाक किया था “

सभी गाँव वालो को बहुत गुस्सा आया और वहा से चले गए | उस बच्चे ने यह हरकत १-२ बार फिर किया | गाँव वाले बार बार आते गुस्से में आ कर वहा से चले जाते | अब की बार सभी गाँव वालो ने निर्णय कीया की अब से इस बच्चे की बात नहीं माने गे चाहे कुछ भी हो जाए |

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मजाक उड़ाना पड़ा मंहगा

बहुत पुरानी बात है एक बार एक कछुआ तलाब में पानी पी कर जा रहा था की वहा बेठा एक खरगोश उसकी मंद गति को देख कर हसने लगा | यह देख कर कछुए को बहुत बुरा लगा और उसने खरगोश को दोड के लिए चुनोती दे डाली |

खरगोश ने ख़ुशी ख़ुशी दोड की चुनोती स्वीकार की | अगले ही दिन यह दोड होनी थी | सुबह – सुबह दोनों अपने – अपने समय पर आ गए और दोड सुरु हो गई | खरगोश आरंभ से ही बहुत आगे निकल गया था | थोरी दूर आगे जा कर वो उब गया था दोड़ते दोड़ते | उसने सोचा क्यों न थोड़ी देर आराम कर लिया, वैसे भी कछुआ बहुत पीछे रह गया है | वह सोचने लगा में तो बहुत तेज दोड़ता हु | यह सोचते हुआ सो गया क्योकि उसे कछुए की कोई चिंता न थी |

कछुआ अपनी मंद गति से चलता रहा बिना रुके,लगातार चलता रहा तथा सोए हुए खरगोश को पीछे छोड़कर चुपके से आगे निकल गया और लक्ष्य पर जा पहुचा |

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