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अभागा कोन

राजा के दरबार में चापलूसों की भीड़ लगी रहती थी | राजा को अपनी तारीफ सुनना बहुत अच्छा लगता था | अत: सभी दरबारी राजा को खुश करने में लगे रहते थे | राजा को अपनी प्रजा के प्रति कोई रूचि न थी | बुद्धिमान और विवेकी मंत्रियो को कोई पूछाता तक न था |

राजा के दरबारियों में एक दरबारी जिसका नाम बलबीर सिंह था वो राजा के बहुत ही मुंह लगा हुआ था | एक बार राज्य के मुख्य पुजारी से बलबीर सिंह का झगड़ा हो गया | उसने मन-ही-मन पुजारी से शत्रुता ठान ली | वह उससे बदला लेने का अवसर तलाशने लगा और मोका मिलते ही उसने राजा के कान भर दिए, “महाराज दुर्गा मंदिर का मुख्य पुजारी बड़ा अभागा है | सुबह-सुबह उसका मुंह देख लेने से दिन भर कुछ न कुछ बुरा अबश्य होता है |

“नहीं, नहीं | ऐसा नहीं हो सकता |” राजा के स्वर में आश्चर्य था |

“आपको विश्वास न हो महाराज तो आप स्वंय इस बात को आजमा कर देख लीजिए”, बलबीर सिंह न अपनी बात पर जोर देते हुए कहा |

राजा ने दुर्गा मंदिर के मुख्य पुजारी को बुलवा भेजा और आज्ञा दी की अगले दिन सुबह सबसे पहले वह उसका मुंह देखेगे |

अगले दिन राजा ने सुबह – सुबह पुजारी का मुंह देखा | संयोग की बात की उस दिन कार्य की अधिकता और व्यस्तता के कारण राजा समय पर भोजन न कर सका | शाम होते ही राजा ने पुजारी को फांसी दे देने का हुक्म दे दिया |

पुजारी ने जब यह बात सुनी तो बह बड़ा हेरान और दुखी हुआ | उसे दरअसल समझ ही नहीं आया था | की क्यों राजा ने उसे बुलाया है और रातभर महल में रखा | सारी बात सुन और समझकर पुजारी ने राजा से फरियाद की, “महाराज, मेने क्या अपराध किया है जो आप में मुझे यह सजा सुना दी ?”

“तुम अभोग हो | यही तुम्हारा अपराध है |” राजा ने कहा |

“आप यह कैसे कह सकते है की में अभागा हु?”, पुजारी ने पूछा |

राजा ने क्रोध से कहा, “हमने आज सुबह-सुबह तुम्हारा मुंह देखा था और इसी कारण हमे दिनभर भोजन नसीब नहीं हुआ | तुम अभागे नहीं तो और क्या हो?”

“अच्छा, तो मेरा मुंह देखने से भोजन नसीब नहीं होता, इसलिए मुझे फांसी दी जा रही है , फिर तो महाराज फांसी पर केवल मुझे ही नहीं किसी दुसरे को भी लटकाया जाना चाहिए | न्याय बराबर को होना चाहिए”, पुजारी ने कहा |

“दूसरा, दूसरा कोन |” राजा ने पूछा |

“आप महाराज”, पुजारी ने बिना डरे उतर दिया |

सारा दरबार सुनकर सन्न रह गया | राजा का क्रोध के मारे आसन से उठ खड़ा हुआ | क्रोध से कांपते हुए बोला, “पुजारी तुम्हारा इतना साहस | जानते हो यह कहकर तुम हमे अभागा बता रहे हो!”

पुजारी ने हाथ जोड़कर नम्रता से कहा, “महाराज, में तो न्याय मांग रहा हु } मेरा मुंह देखने से तो आपको केवल दिन भर भोजन नहीं मिला किन्तु आपका मुंह देखने से तो मुझे फांसी पर चढ़ाया जा रहा है | आप ही कहिए की कोन बड़ा अभागा है – आप या में ?”

यह बात सुनकर राजा का क्रोध पलक झपकते ही शांत हो गया | राजा बोला, “तुमने मेरी आँखे खोल दी पुजारी | सच तो यह है की कोई मनुष्य अभगा या भाग्यवान नहीं होता बल्कि हम सब बराबर है, एक ही ईश्वर की संतान है | और उसके बाद राजा ने उस पुजारी को कुछ धन दे कर विदा किया |

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