एक बार बादशाह अकबर ने अपने दरबारियों से प्रशन किया, “बताओ सबसे अच्छा मोसम किस ऋतू में होता है|”

दरबारी सदेव बादशाह को प्रसन्न करके ईनाम पाने के लिए तेयार रहते थे | उनमे से एक दरबारी उठा और बोला, “ महाराज सबसे अच्छा मोसम बसंत ऋतू में होता है? इस समय मंद-मंद हवा बहती है, रंग-बिरंगे फूल खिलते है, तापमान भी कम होता है तथा ठंडा मोसम सबको प्रसन्नता देता है|”

तभी एक और दरबारी उठा और बोला, “नहीं महाराज सबसे अच्छा मोसम सर्दी का होता है | इस समय हमे कई प्रकार की सब्जिया मिलती है तथा कई प्रकार की मदिरा भी मिलती है | इस मोसम में मुंगफलिया तथा गर्म कम्बल हमे गरमाहट भी देते है|”

तभी एक अन्य देबारी ने बिच में टोकते हुए कहा, “महाराज, गर्मिया का मोसम ही सबसे अच्छा मोसम होता है | यह गर्म तो होता है परन्तु ठण्डी मदिरा और नोक विहार मन को प्रसन्नता देते है |” Read More »

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Nov
8

बरतनों की मोत

रामू बड़े मजाकिया इन्सान थे | वो हर हलात में खुश रहते थे और अपने मजाकिए स्वभाव, हाजिरजवाबी और होशारियो से सबको हंसाते रहते थे |

एक बार की बात है | रामू के एक पड़ोसी के घर घर दावत थी | पड़ोसी खाना बनाने के कुछ बरतन रामू के घर से मांग कर ले गया | दुसरे दिन वह बरतन वापिस करने आया |

उन बरतनों में से एक बरतन ऐसा था जो रामू का नहीं था | रामू ने देखा तो पड़ोसी से कहा, “करे भाई, यह तो मेरा बरतन नहीं है |”

पड़ोसी ने कहा, “ रामू भाई, बात दरसल यह है की जब आपके बरतन मेरे यहाँ रहे तो उन्ही में से किसी ने यह बच्चा दिया है | अप आपने बरतनों का बच्चा है | इसलिए आपको लोटा दिया है |”

रामू ने कोई जवाब नहीं दिया | चुपचाप सारे बरतन ले कर रख लिए | कुछ दिनों बाद रामू के यहाँ दावत का मोका आया | उन्होंने अपने पड़ोसी से कुछ बरतन उधर लिए | लेकिन कई दिन बीत गए, रामू ने पड़ोसी के बरतन वापिस नहीं किए |

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जैसा की में आप सभी के साथ रमेश की ज़िन्दगी के कुछ पल बाँट चूका हु | आज कुछ और रमेश की ज़िन्दगी के पल आप लोगो के साथ बाँट रहा हु |

जैसा की मेने कहा था की वो ज़िन्दगी जीने से डर रहा है लड़ रहा है अपने हलातो से, लड़ रहा है अपने मन में चल रहे तुफानो से | भाइयो, बहनों ऐसा लग रहा है मनो ज़िन्दगी भी रूठ गई है रमेश से | दुःख खत्म लेने का नाम ही नहीं ले रही है | एक खत्म होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है |

पिछले साल उसके पिता का देहांत हुआ था | ऐसा नहीं है की मीठे पल नहीं है रमेश की ज़िनदगी में, है पर बहुत बहुत थोड़े से और भी आते है दुखो के साथ | इसी साल उसके यहाँ एक नन्ही परी ने भी जन्म लिया पर नोकरी न होने के कारण बभौ कर्जा लेना पड़ा जो की अभी तक चूका रहा है | और अब तो उसकी नोकरी भी खतरे में है | पता नहीं है अपनी जीविका कैसे चलाए गया इतनी महगाई में |

अभी रमेश अपने पिता के जाने के सदमे से बहार निकला भी नहीं था की उसकी माँ को brain tumor हो गया | दोस्तों में कैसे कहू उसकी कहानी क्योकि मुझे भी रोना आ रहा है | मेरा मन भी द्दुख रहा है | पर मुझे तो बताना ही है |

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Oct
24

चिड़िया और हाथी

नीम के पेड़ पर चिड़िया का घोंसला था | घोसले में चिड़िया के नन्हे-नन्हे बच्चे थे | चिड़िया बच्चो की देखभाल करती थी | और चिडडा दाना चुगकर लाता था |

बच्चे जब कुछ बड़े हो गए तो चिड़िया भी दाना चुगने जाने लगी | एक दिन एक हाथी पेड़ के पास से गुजर रहा था | चिड़िया के बच्चो ने देखा तो हंस पड़े | बोले, “देखो, मोटा जा रहा है |”

यह बात सुनकर हाथी को गुस्सा आ गया | उसने सूड उठाई और घोंसले को जमीन पर पटक दिया | चिड़िया वापिस आई तो देखा की बच्चे मरे पड़े है | यह देख कर वह बहुत रोई |

चिड़िया का एक दोस्त था | उसने चिड़िया को दिलासा दिया और कहा, “हम हाथी को उसकी करनी का मजा जरुर चखाएगे | वरना हम पक्षियों के घोंसले तो उजड़ जाएगे |

चिड़िया के दोस्त ने चिड़िया और चिडडे को अपने दोस्तों के पास ले गया | उसका एक दोस्त मेंढक पास ही तालाब में रहता था | दूसरा दोस्त झाड़ी में रहता था |

उसने अपने दोस्तों को चिडडे और चिड़िया की दुखभरी कहानी सुनाई अपने दोस्तों को | मेंढक और बार्र चिड़िया की मदद करने के लिए तेयार हो गए | सबने मिलकर एक तरकीब सोची और हाथी की खोज में चल दिए |

पेड़ो के झुरमुट में हाथी आराम से लेटा था बार्रहाथी के कान के पास जाकर मीठी आवाज में गुनगुनाने लगा |मीठा गाना सुनकर हाथी को नींद आ गई | तभी चिड़िया के दोस्त ने अपनी पेनी चोंच से हाथी की दोनों आँखे खोद डाली |

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Oct
12

बारीश के रूप अनेक

आज बादल बहुत काले थे और हवा भी बहुत ठंडी – ठंडी चल रही थी | ऐसे मोसम में राघव, परमीत, रवी और अमन मैदान में खेल रहे थे | रवी के दादा जी सभी के बच्चो को खेलते हुए देख रहे थे | वो उन बच्चो को देख कर बहुत खुश हो रहे थे | बच्चो ने अभी खेलना शुरू ही किया था की अचानक बिजली चमकने लगी | और थोरी ही देर में बारीश शुरू हो गई | दादा जी ने सभी बच्चो को हाथ हिलाते हुए बुला लिया | दादा जी को हाथ हिलाते हुए देख कर अमन के कहा दादा जी बुला रहे है और इतनी ही देर में बारीश के एक बूंद राघव पर गिरी |

दादा जी जोर से बोले, अरे बच्चो जल्दी चलो | कोले पड़ रहे है | अमन, राघव, परमीत और रवी सर पर हाथ रखे रवी के घर की और दोड़ पड़े |

आज दादा जी भी बहुत खुश थे | दादा जी बच्चो से बोले, आज बहुत दिनों बाद ओले पड़े है | अच्छा हुआ तुम सब चले आए, नहीं तो सर पर टपाटप होती | बच्चे दादा जी की बात सुनते ही हंस दिए | देखते ही देखते बरामदे के आगे का खुला स्थान ओलो से भर गया |

इन बच्चो में से एक बच्चे ने दादा जी से पूछा, “ दादा जी ये ओले क्या होते है ?”

दादा जी मुस्कराके बोले, “बच्चो, वायुमंडल में विदयमान जल की बुँदे झटके से उछल कर ऊपर चली जाती है | ऊपर की हवा बहुत ठंडी होती है | ये बुँदे वही जमकर ओले का रूप धारण क्र लेती है | इसी प्रकार हवा के झोंके इन्हें और ऊपर उछाल देते है | इन ओलो के ऊपर बर्फ की और परते जम जाती है | कुछ भारी होने पर ये ओले नीचे की और गिरने लगते है | वाह: हमे तो पता ही नहीं था | सभी बच्चे बहुत खुश हुए |

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Sep
23

बीरबल का राज

एक दिन बीरबल ने जब बादशाह अकबर के दरबार में प्रवेश किया तो उसने देखा की सभी दरबारी हंस रहे है | उसने बादशाह से पूछा, “मगराज| आज सभी दरबारी इतने खुश क्यों है?

“अरे, कोई खास बात नहीं, बीरबल |” अकबर ने जवाब दिया |” हम लोगो की त्वचा के रंगो के विषय में चर्चा कर रहे थे | अधिकतर दरबारी और स्वंय में गोरे में हु | तुम हमसे काले कैसे?” हमेशा की तरह बीरबल का जवाब तेयार था | ओह: शायद आप मेरी त्वचा के रंग के रजके विषय में नहीं जानते?”

“राज ! कैसा राज |” अकबर ने पूछा |

“बहुत समय पहले भगवान ने इस संसार को पेड़-पोधो, पशु-पक्षियों आदि से भरपूर बनाया था | पर बे इस रचना से संतुष्ट नहीं थे | इसलिए उन्होंने मनुष्य की रचना की | अपनी इस नई रचना की देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए | इसलिए उन्होंने तोहफे के तोर पर रूप, दिमाग तथा धन देने का निर्णय किया | उन्होंने घोषणा की कि प्रत्येक व्यक्ति को पांच मिनट का समय दिया जायगा ताकि सभी अपनी इच्छाअनुसार कोई भी तोहफा चुन सके | मेने सारा समय बुद्धि इकट्ठा करने में लगा दिया जिससे दूसरी वस्तु चुनने का समय ही नहीं बचा | आप सभी रूप और धन इकट्ठा करने में लगे रहे और बाकि तो सब जानते ही है | “ बीरबल ने जवाब दिया | Read More »

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Sep
11

मतलबी भेड़िया

एक दिन भेड़िया मजे से मछली खा रहा था की अचानक मछली का कांटा उसके गले में अटक गया | भेड़िया दर्द के मारे चीका-चिलाया | वह इधर-उधर भागता फिरा | पर उसे चेन न मिला | उससे न खाते बनता था न पीते बनता था |

तभी उसे नदी किनारे खड़ा एक सारस दिखाई दिया | भेड़िया सारस के पास गया | भेड़िया की आँखे में आसू थे | वह गिडगिडा कर बोला, “सारस भाई, मेरे गले में कांटा अटक गया है | मेरे गले से कांटा निकल दो | में तुम्हारा अहसान कभी न भुलुगा | मुझे इस दर्द से छुटकारा दिला दो |

सारस को भेडिये पर दया आ गई | उसने अपनी लंबी चोंच भेडिये के गले में डाली और कांटा निकाल दिया | भेडिये को बड़ा चेन मिला | सारस बोला, भेडिये भाई मेने आप की मदद की है अब आप मुझे कुछ इनाम दो |

इनाम की बात सुनते ही भेडिये को गुस्सा आ गया | सारस की अपने बड़े-बड़े दांत दिखाते हुए बोला, “तुझे इनाम चाहिए? एक तो मेरे मुंह में अपनी गंदी चोंच डाली | मेने सही – सलामत निकल लेने दी | और अब इनाम मांगता है | जिंदा रहना चाहता है तो भाग जा यंहा से इनाम मांगता है |” Read More »

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Aug
31

चिंता

चिंता एक प्रकार की कायरता है और वह जीवन को विषमय बना देती है |

-    चेनिंग

चिंता एक ऐसी हथोडी है, जो मस्तिक के सूक्ष्म एवं सुकोमल सूत्रों तथा तंतुजाल को विधटित करके उसके कार्यकारिणी शक्ति को नष्ट कर देती है |

-    स्वेट मार्डन

चिंता एक काली दीवार की भांति चारो और से घेर लेती है, जिसमे से निकलने की फिर फोई गली नहीं सूझती |

प्रेमचन्द

चिंता शहद की मख्खी के समान है इसे जितना हटाओ उतना ही और चिमटती है |

सुदर्शन

प्राणियों के लिए चिंता ही ज्वर है |

स्वामी शंकराचार्य

चिंता ही से चिंता दूर होती है | इस घोखे से रोकने का प्रयास करने से परिणाम उनता होता है |

रविन्द्रनाथ ठाकुर Read More »

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Aug
22

अनोखा वरदान

विजय सिंह मान का राजा था | वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था और उनका बहुत ध्यान रखता था | एक दिन की बात है वह तूफानी रात में अपने घोड़े पर स्वर होकर एक तंग से रास्ते से जा रहा था | वह भेस बदले हुए था | मामूली कपड़े पहन कर, जनता के बीच उनके हाल चाल का पता लगाना उनकी आदत बन चुकी थी |

वह बीना किसी की चिंता किये अपना काम कर रहे थे परंतु उनके पीछे पीछे डाकू भी चल रहे थे जो उनका शानदार घोडा लेना चाहते थे |
मोका देख कर डाकुओ ने राजा को घेर लिया | राजा एक बार तो सकते में आ गया, मगर वह घबराया नहीं | वह बच निकलने की तरकीब सोच रहा था की उसके घोड़े का खुर सडक के गड्डे में फंस गया | डाकू अभी राजा पर लपकने ही वाले थे की एक और से कुछ नोजवान वहा आ पहुचे | उन्होंने देखा की एक आदमी मुसीबत में है | उन्होंने डाकुओ पर हमला कर दिया | डाकुओ यह देख कर डर गए और वहा से भाग गए |

थोड़ी देर में राजा के अंगरक्षकों का दल भी आ पहुचा | उन्होंने सभी डाकुओ की बंदी बना लिया | राजा उन नवयुवको से बड़ा प्रसन्न था क्योकि उन्होंने बिला यह जाने की वह राजा है, डाकुओ से उसकी रक्षा की | राजा ने बहुत – बहुत धन्यवाद दिया और कहा के वे उसके साथ महल तक चले |

भोर होने पर रात की घटना का समाचार सब जगह फेल गया | सारी प्रजा खुश थे की डाकू राजा का बाल भी बाका न कर सके | राज्य परिवार के लोगो, मंत्रियों, दरबारियों और सारी जनता ने नवयुवको के साहस की प्रशंशा की |

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Aug
17

चालाकी का फल

बहुत पुरानी बात है| किसी गाँव में एक व्यापारी रहता था | उसका नाम मोहन था | मोहन गाँव नहर के किनारे बसा हुआ था | वह नमक का व्यापार करता था | उसके पास एक गधा था | वह रोज एक बोरी नमक गधे पर लादकर शहर ले जाता था | रोजाना एक ही रास्ते से आने-जाने के कारण व्यापारी का गधा शहर का रास्ता पहचान गया था |

मोहन भी समझ गया था की गधा शहर का रास्ता पहचाना गया है, इसलिए अब वह गधे पर नमक लादकर उसे अकेला ही शहर भेज देता था | उस शहर का व्यापारी गधे के ऊपर लदी नमक की बोरी उतार लेता था | इसके बाद गधा वापस लोट आता था | गाँव और शहर का रास्ते में नहर पडती थी, लेकिन नहर पर कोई पुल नहीं बना था, इसलिए नहर को उसमे से चलकर ही पार करना पड़ता था | बरसात के कारण एक दिन नहर में पानी बहुत बढ़ गया | जिससे गधे पर लदी हुई नमक की बोरी भीग गई |

पानी में भीग जाने से थोडा नमक पानी में घुल गया | जिससे बोरी कुछ हलकी हो गई | इससे गधे ने यह समझा की पानी में भीगने से बोझ कम हो जाता है | अब तो गधा रोज नहर के बीच में पहुचकर पानी में थोड़ी देर बेठ जाता | इससे बोरी गीली हो जाती और गीली होने से कुछ नमक पानी में बह जाता | इधर शहर के व्यापारी ने देखा की कुछ दिनों से नमक को बोरी पानी में भीगी हुई होती है | एक दिन उसने बोरी को तोलकर देखा | यह क्या? बोरी का भार तो सचमुच बहुत कम है | व्यापारी की समझ में कुछ नहीं आया की बोरी में नमक क्यों कम होने लगा है उसने मोहन को एक कागज पर यह सब लिखकर भेजा | Read More »

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